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बुधवार, 9 अगस्त 2023
माता दुर्गे
हे माता दुर्गे हे माता अंबिके हे माता परम् ईश्वरी हे माता सृष्टि स्वरूपिणी हे माता तुलसी हम आपके सन्तान आपके चरणो में हृदय से प्रेम पूर्वक दंडवत प्रणाम और नमस्कार करते हैं । 1
हे माता ज्ञान स्वरूपिणी विद्या स्वरूपिणी प्राण स्वरूपिणी आदिशक्ति हम आपके चरणों में बार बार प्रणाम करते हैं । 2
हे माता मृदुल भाषिणी संकट मोचिनी विघ्न विनाशिनी हम आपके सन्तान आपके चरणों में शरण लेकर आपको मस्तक झुका बार बार प्रणाम करते हैं । 3
हे माता राधिके हे माता दुर्गे हे माता सरस्वती आप मुझे अपने चरणों में आश्रय और अपनी भक्ति प्रदान करो । 4
हे माता विंधेस्वरी हे माता विश्वंभरी हे ब्रजेश्वरी आप कृपा हमारे हृदय में अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर भक्ति ज्ञान करूणा पराक्रम तथा आप अपने चरणों में समर्पण प्रेम रूपी दीपक प्रज्वलित करो। 5
हे माता जगदीश्वरी हे माता माहेश्वरी हे माता परमेश्वरी आप मेरे अंतः कारण में धारण /स्थित होकर हमे आत्म स्वरूप वृति प्रदान करो । 6
हे माता लक्ष्मी हे माता उमा हे हे माता सरस्वती आप मेरे हृदय के अंतःकरण में धारण होकर सभी दोष दुर्गुण को मिटा कर हृदय को सद्गुणों से प्रकाशित कर मुझे मेरे योग्य पति प्रदान करो । 7
हे माता नारायणी हे कालीके हे माता भैरवी आप मेरी सब प्रकार से रक्षा करें तथा सभी दोष दुर्गुणों पाप से रक्षा करो। 8
हे माता पार्वती हे माता जगदम्बा स्वरूपिणी हे माता सृष्टि स्वरूपिणी आप मुझे उत्तम पति प्रदान करो । 9
हे माता त्रिपुर सुंदरी हे माता लक्ष्मी हे माता सरस्वती आप मुझे पूर्ण सम्मान और समर्पण प्रेम देने वाला पत्निव्रता पति प्रदान करों। 10
हे माता आदिशक्ति हे माता राधिका महारानी हे माता दुर्गे महारानी आप मुझ में और मेरे होने वाले पति स्वामी में दुर्गुण दोष दूर कर हृदय में सद्गुण प्रकट करो । 11
हे माता विश्वंभरी हे माता जगत स्वरूपिणी हे माता भवानी आप मुझे मन के अनुकूल चलने वाला उत्तम स्वामी पति प्रदान करों। 12
हे माता भैरवी हे महालक्ष्मी हे माता श्याम सुंदरी आप मुझे ऐसे मनमोहक पति प्रदान करे जो मेरे मन के अनुकूल हो । 13
हे माता लक्ष्मी हे माता सीता हे माता गौरी मुझे ऐसे पति प्रदान करो जो नारायण की भांति अपनी पत्नी के प्रति समर्पित हो माता पिता का आज्ञाकारी हो सभी दुर्गुणों से रहित हो जो भाई बंधुओ का प्रेमी हो जो सब का हित चाहने वाला हो । जो मंगल करने वाला हो जो इस भाव सागर से पार उतारने वाला हो। 14
हे माता इंद्राणी हे माता वैष्णवी हे माता तुलसी महारानी आप मुझे मेरे योग्य उत्तम पति प्रदान करो जिसे पा कर मेरे माता पिता दादा दादी मेरे हित चाहने वाले और मुझको अपार प्रसन्नता और संतुष्टि हो। 15
– श्रीरामभक्त (राहुल.झा वत्स) रचित स्त्रोत
संत स्तुति
।। संत स्तुति ।।
सबसे पहले हम माता सरस्वती और भगवान गणेश जी के चरणो मे प्रेम पूर्वक सिर स्पर्श कर स्वयं को समर्पित करते हुए उन्हें बार बार प्रणाम करते हैं जिनकी कृपा हृदय से मान कर संत स्तुति लिखने की कोशिश कर रहे हैं । हम अपने हृदय के भाव को सनातनी हिन्दू संतों के बीच रखना चाहते हैं वो जहां कही भी किसी भी लोक में होंगे। जहां जिस रूप में होंगे। जहां कही भी वो ज्ञान रूप में विचरण कर रहे हैं। जिन सज्जनों के बीच श्रीरामभक्त साधु, संतो, योगियों और महत्माओं की नित्य सत्य वाणियां का रसपान हो रहा है वहां से हम दीन मलिन बुद्धि , अल्पज्ञाणी अपने हृदय के भाव को आपके प्रति जो आस्था थी वो आपके चरणों में समर्पित कर रहे हैं । आप हमारे स्तुति को प्रेम पूर्वक स्वीकार करें। उसमे जो त्रुटि दिखे तो हम इस के लिए आप क्षमा कर हमारे दोषों को दूर करेंगे।
हम साधु संतो के रक्षक प्रभु श्री राम और हम दीनो की माता जानकी के चरणों में प्रणाम करते हैं।
हे विवेक धारण करने वाले रामदूत महावीर हनुमान , हे समाज को सुधारने वाले संत समाज हम आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम करते हैं । हे करुणा निधान संत महराज हम आपके चरणों में सिर रख कर हृदय से प्रणाम करते हैं। हे दुखियों का दुःख हरने वाले संत महराज हम आपके चरणों की धूल मागंते हैं । हे राम के चरणो से जोड़ने वाले रामभक्त संत आपके दया का अंत किसी कीमत पर मुझ कपटी, अल्पज्ञानी, अल्प बुद्धि से नही लिखे जा सकते। आप ही आपने ज्ञान और बुद्धि से भक्तों में संतुष्टि और परम आनन्द प्रदान कराते हैं । हे भारत के संत समाज आप ही महात्मा बुद्ध रूप नस्तिको पर भी दया करके उसे "अपना दीपक स्वयं बणों" का उपदेश देते हैं आप रैदास ,नानक और कबीर रूप में अपने ज्ञान और प्रभाव से कलयुग के घोर अन्धकार में दया, क्षमा, करुणा, ज्ञान, भक्ति और प्रेम रूपी प्रकाश जलाते है । हे भारत के संत गुरु महराज आप ही गुरु तेग बहादुर , गुरु गोबिंद सिंह और बंदा सिंह वैरागी के रुप में सनातन धर्म और भारतीय समाज के लिए परिवार सहित अपना बलीदान देकर अपने मृतभूमि और यहां की सनातन संस्कृति की रक्षा करते हैं । हे संत समाज गोबिंद में आप और आपमें गोबिंद निवास करता है ऐसा जानकर और मानकर कर हम आपके चरणों की धूल की अपने सिर पर लगाना चाहते हैं । हे हठी दुष्टों का दमन करने वाले धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने वाले अवध, वीर साधु महराज हम आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम करते हैं। आप ही दया दृष्टि से पीढ़ी दर पीढ़ी सत्य सनातन ज्ञान का आदान प्रदान होता है। हे साधु महराज मैं छोटी बुध्दि से आपके वैराग ,विवेक और सैयम का गुणगान करने में असमर्थ हूं। समाज को अपनी आत्मा मान कर उन्हे अपने विचारो से पवित्र करने वाले हे साधु महराज आपके ही तपो बल से पृथ्वी मैया गंगा मैया को पाकर पवित्र हुई । हे साधु महराज आपके ही तप से प्रसन्न होकर स्वयं आदि नारायण पृथ्वि पर आकर हम पापियों का पाप धोते हैं। हे साधु महराज आपके ही दया के पात्र श्री हरि जी को जान पाते हैं । हे साधु महराज आपके मुख से निकला एक अक्षर यदि चंडाल के कान में पड़ जाए तो वो भी मधुर वाणी का उत्तम वक्ता बन जाता है। हे साधु महराज आप स्वयं भूखे रहकर इस घोर कलियुग में अल्पज्ञानियो द्वारा तिरस्कृत होकर भी हमेशा हरि के जनो का कल्याण ही करते हैं । हे साधु महराज आपके ही तपो बल से आपके चिन्मय शरीर का सपर्श पाकर पापी मनुष्य पवित्र हो । जाते हैं । हे साधु महराज आपके चिन्मय शरीर से ही देवता लोग वज्र बनाके आशुरो का नाश करने में समर्थ होते हैं ...हे साधु महराज दुष्टों द्वारा इस घोर कलयुग में आपके शरीर की हत्या की जाती है फिर भी आप दया स्वभाव वश उन्हे क्षमा कर देते हैं पर एक बात है आप तो उन्हे परमात्मा अंश या प्रारब्ध कारण मान कर उन्हे क्षमा कर देते हैं ।
हे साधु महराज हम आपसे कुछ प्रश्न करते हैं यदि आपकी कृपा हो तो हमे अवश्य उत्तर देंगे ।
क्या कलयुग की अंधेरी रात हमेशा के लिए मिटना भगवान के वश की बात नही है ?
कलयुग के संतान गोविन्द को गालियां बकते हैं। उन्हे तो कष्ट नही होता किंतु ये सब देखकर मुझ भक्त को आत्म हत्या करने को जी करता है ताकि इन आंखों से गोविंद का अपमान नही देखा जाता।
क्या कलयुग में कन्या की रक्षा द्रोपदी मां की भांति गोविंद नही कर सकते।
क्या कलयुग में गोविंद ने गौ माता से सम्बन्ध तोड़ लिया क्योंकि जब उसकी दुर्गति देखता हूं ऐसा लगता है किसी ने मेरी आत्मा को जूते से मसल दिया।
क्या कलयुग को बनाना जरूरी था?
कलयुग में ईश्वर को पुकारने पर वो आते क्यो नही है जब की वो सर्व्यापी अन्तर्यामी है वो जड़ चेतन रूप में है उसके सिवाय कुछ यहां वहां कुछ नही है। वो ही वासुदेव सर्वम, शिवमय, देवीमय एक अदृश्य कण से अनंत दृश्य अदृश्य जगत में व्याप्त हैं ।
कलयुग में भक्तों की दुर्गति होना अनिवार्य है ?
कलयुग में जब गोविंद शिव और माता आदिशक्ति का अश्लील तरीके से अपमान होना था तब गोविंद मुझे ये सब देखने से पहले मृत्यु क्यो नही देता।
जब भी ईश्वर से इन सवाल का उत्तर मांगता हूं तो अद्वैत ज्ञान कही न कहीं से आ जाता है किंतु साक्षात आकर उत्तर क्यो नही देता है ?
यदि आपके पास उत्तर है तो जवाब दे नही तो गोविन्द गौ से अपना प्रेम हमेशा के लिए हटा लूंगा ताकि उसका अपमान भी हो तो मुझे घोर दुःख न हो ।
मुझे पता है आप उत्तर नही दोगे कहां आप ज्ञानी संत स्वभाव के पुरुष .... कहां मैं तुच्छ पापी अभागा जो अपने ईष्ट का अपमान देखने वाला और जानवरो से लड़ते लड़ते जानवर पुरुष बनने वाला ।
मुझे पता है आप उत्तर नही देंगे । क्योंकि आप जेसे संतो की शक्ति मुझ जैसे पापी की शब्दो को देखकर कही क्षिण जो हो जायेगा ।
हे दुष्टों का नाश करने वाले भगवान कल्कि महराज , हे दुष्टों का नाश करने भगवान परशुराम , हे दुष्टों का नाश करने वाले रामभक्त हनुमान , हे संघार करने वाले देवाधिदेव महाकाल अपना विराट मुख खोलो और
या तो मुझे मिटा दे या तो कलि पुरुष को हमेशा के लिए मिटा दे।
इस पृथ्वी पर या तो अपने भक्तो को रखो या तो कलयुग को रखो परंतु दोनों में से कोई एक को रखो ।
– श्रीरामभक्त राहुल झा वत्स
🙏🙏🙏
पर हम श्रीरामभक्त रा.झा वत्स उन्हें कभी क्षमा नही कर सकते। हमे क्षमा किजिएगा क्योंकी हे साधु महराज किसी को तो इन साधु हत्याओं को रोकने के लिए आगे आना होगा । जब जब साधुओं को खून से लत पथ देखता हूं तब मेरी आत्मा रो देती है इन हत्याओं के कारण हृदय में जो क्रोध की वेग उठती है उसे रोकने में असमर्थ हो जाता हूं । यदि ऐसे हत्यारे हाथ में आ जाएं तो शकाहारी होते हुए भी मांसाहारी बन जाऊ । वासुदेव सर्वम अनुभव करने वाले हे दुर्लभ महात्मा आप ही बताइए हम उन्हे परमात्मा के अंश कैसे माने जो गौ ब्रह्मण स्त्री निर्दोष साधुओं और निर्दोष पशु पक्षियों की निर्मम हत्या करते हैं ? हम उन्हे परमात्मा का अंश कैसे माने जो अभिमान के वशीभूत मेरे प्यारे गोबिंद को गालियां तक दे देते हैं क्या यही सब दिखाने हरि जी ने मुझे भेजा था। हे साधु महराज ये सब देखने से पहले मेरी मृत्यु क्यों नही हुई।
माताओं को राम तक पहुंचाने का प्रयास
मेरा मन अपनी माताओं को संदेश देता है पर स्वयं राम को भुलाए बैठा है । 👇👇👇
꧁༺🙏❤️🌷|| राम ||🌷❤️🙏༻꧂
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हे मां आप कुछ नही है आप और आपकी दृष्टि में एकमात्र राम(राममय, वसुदेव सर्वम, या राधा मई ) है उसके सिवाय कुछ नही है आप राम (बिहारी जी )से अटूट प्रेम करो क्योंकि राम मार्ग है राम ही नित्य घर है राम ही आपका लक्ष्य है आपकी वाणी भी राम है तेरे विचार भी राम हैं । राम ही तेरा प्रिय है । राम आपके हृदय से अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त हैं । राम ही समस्त जगत है राम ही तीनो काल है। आपका सब कुछ राम है उसके सिवाय कुछ नही है। हे माता आप दुर्गति का भय त्याग दे । आपने राम की प्रेरणा से मुझे प्रेम से बेटा कहा है और मैं राम की प्रेरणा से आपको मां कहा है तो मेरा स्वामी मालिक मेरा गुरु राम का इतना भी धर्म नही की आपको अपनी शरण ले । आप शोक दुःख भय का सर्वथा त्याग कर दे । आप राम को इस स्वप्न संसार में नित्य अपने लिए और दूसरो में स्थित अच्छे गुण के लिए प्रार्थना और धन्यवाद रूपी नमस्कार किया करों। आप राम के लिए नही रो सकती तो राम से कहो की वो आपके भीतर ऐसी प्रेमभक्ति आग प्रकट हो की आपके जीते जी आपको राम मिल जाए और उनके चरणो में फूट फूट कर रो लो और खुशी की आंसू उसके चरणो में बहा दो । राम ही आपका ईश्वर है । राम ही आपके प्राण है । राम ही आपके तन मन में स्वस्थ रूप में स्थित हैं। राम ही आपके आनंद हैं । राम ही आपकी आत्मा का विराट रूप परमात्मा है । अर्थात् राम ही आप में आत्मा है ।
आप दुःख से मत घबराओ क्योंकि राम के इतने दुःख आपने नही झेला फिर भी देखो वो अपने दुखों का नाश के साथ अपने भक्तो के भी कर डालते हैं। राम परम् आनन्द स्वरुप हैं उन्हें दुख छू भी नहीं सकता वो मनुष्य रुप अवतार लेकर हमलोग को शिक्षा देते हैं सुख दुःख आत्मा के नही शरीर के होते हैं । पाप– पुन्य अपना– पराया आत्मा के नही है शरीर के होते हैं । माता जी आप वही आत्म स्वरूप है उसी प्रकार आपको भी स्वयं के साथ सभी के कल्याण के लिए अपने हृदय में राम को मनाना चाहिए। माता जी आप मृत्यू के भी मृत्यु हैं आप अविनाशी हैं ईश्वरी हैं आप पर ब्रह्म स्वरूप हैं क्योंकी राम से भिन्न नहीं है । आप शरीर का पर्दा हटा कर देखे तो सर्व्यप्त राम ही दिखेंगे आप भी राम से बने तो आप राम से भिन्न नहीं है महात्मा अर्जुन महराज ने कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप में स्वयं को भी देखे थे।
आप राम रूपी महासागर में बूंद रूप में हैं और आप बूंद में राम रूपी महासागर स्थित हैं । इसका अनुभव किजिए आनंद में मगन हो जाइए। आप परम् आनंद स्वरूप है । आपको प्रेम भक्ति चाहिए तो आप गोपी मईया के लिए धन्यवाद और प्रणाम करें क्योंकि उन्होंने कृष्ण रूप में गोपियों को प्रेम भक्ति देकर दर्शन दिए।
किन्ही महापुरुष को भगवत प्राप्ति हुई है तो उनके लिए राम को धन्यवाद करो । कोई भगवत प्राप्ति की चेष्टा कर रहा है तो उसके लिए राम को धन्यवाद किजिए। किसी को धन दौलत और अच्छे पुत्र पति पत्नि मिली है तो उसके लिए धन्यवाद नमस्कार करो । यदि आपको राम चाहिए तो सबसे पहले उनके लिए राम को धन्यवाद करो जिसने राम को पाया । कोई राम को प्राप्त कर रहा है तो उसके लिए राम को धन्यवाद करो । फिर देखो राम क्यो नही मिलेंगे । राम आपके हर एक बात को सुनते है राम आपके हर एक प्रार्थना को सुनते हैं आप जो व्यथा लिखते है वो आपके भीतर और मेरे भीतर या हमलोग से पड़े में स्थित होकर राम पढ़ते है माता सीता और राम आपके हर एक भाव को समझते हैं। आप प्रसन्नता पूर्वक राम का नाम लिया कर महावीर बजरंगी के चरण कमल को अपने हृदय में धारण कर ले । सीता मैया की कृपा से जब जब हम "राम" नाम लिखते हैं तो उसमे आप अपने बिहारी जी को देखिए । क्योंकि राम ही बिहारी रूप में हैं राम ही तो वृंदावन और अयोध्या में हैं ।
और श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31 में भगवान वासुदेव श्री कृष्ण भी अर्जुन जी को कहते हैं। मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगा हूँ।
श्रीरामभक्त इस राहुल नामक शरीर से आपके साथ आपके हृदय में माता जानकी प्रभु श्री राम जी को दंडवत प्रणाम करता है। 🙏🌷❤️
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जय सिया राम जय राम जय राम जय जय राम
जय सिया राम जय राम जय राम जय जय राम
हर हर शंकर हर हर महादेव जय हनुमान ≪━─━─━─━─◈─━─━─━─━≫
मेरा राम और मेरा कृष्ण
हे राम अब मैं तेरे भक्तों को चिंतित देख कर मैं भी चिंतित हो गया हूं । मैं स्वाभाव से नटखट चंचल अवश्य हूं पर मैं तेरा बेटा हूं ये मां भी तेरी ही सनातन पुत्री है । मैं सभी ज्ञान से अधिक तेरे उपर ही पूरा भरोसा किया है । मेरे प्यारी माता जानकी इस मां के बदले मुझे बांध दो पर इस मां की उद्धार के लिए तेरे चरणों का आश्रय लिया है। माता यदि इन माताओं पर दया दृष्टि नही दिखाएगी तो मैं किनकी शरण जाऊंगा । माता सीता मैं ने स्वयं से अधिक तेरे उपर ही भरोसा किया है । माता राधिके तुम तो अपने पुत्र पर दया और प्रेम बरसाने वाली हो तू सभी मैया के हृदय में अपने चरण भक्ति बढ़ा कर उन पर कृपा करो । तथा मेरे हृदय की चिंता को मिटा दो । मेरी प्यारी मां ब्रिजेस्वरी मुझे तो सबसे अधिक तेरे उपर ही पूरा विश्वास है। मेरे हृदय की चिंता को दूर कर दो । मां दुर्गा महारानी मुझे तुम से बहुत डर भी लगता है कही तू मुझ से रूठ गई तो मैं अनाथ किनकी शरण जाऊंगा । मेरी मां दुर्गे मैं ने कभी तुम्हे कृतज्ञता पूर्वक तेरी पूजा नही की ... फिर तू मुझ पर दया कर क्षमा कर देती हैं । माता दुर्गे मैं ने स्त्रियों का संग किया पर तेरी अंशरूपा जानकार इस माता से मूंह न मोर पाया। मैया कृष्ण स्वरूपिणी श्यामा मैया मैं तुम से मिलने को इतना बैचेन हो गया की मुझे किसी बात की कोई परवाह नही रही तेरे भक्त से उतपटांग प्रश्न कर बैठा उसके उपरान्त फिर इन लोगो के पास पहुंच गया। मैया जगद्मबिके माता तू अब कब तक मुझे भटकाती रहेगी । मुझ पर एक कृपा कर दे अपने पास बुला मणि द्वीप ले तू इन माताओं को मेरे दोष दुर्गुणों से बचा कर इन्हे सारे प्रपंच बचा लो और अपने चरणो की भक्ति दान करों। मैया मैं तो अकेला असंग हूं । मेरी पराजय और विजय तू ही है । मेरी मां राधिका मैं ने तुम्हे कभी वैसे स्मरण नही किया जैसे संत जन और भक्त जन करते हैं मेरी मां मुझ पर दया करो मेरे अपराध को क्षमा करो और अब मेरी कोई ठीक नही कब हू कब हूं कब नही हूं । जन्म लेते जन्मदाता मैया को कष्ट दिया। माता दुर्गे माता पार्वती माता लक्ष्मी माता परम ब्रह्म स्वरूपिणी यदि भूल से भी मेरी काली दृष्टी इन माताओं के उपर पड़ी है तो ढाल बनकर इनकी रक्षा करो। माता मैं तो तुम्हे ढूढते ढूढते यात्रियों की भांति आपके भक्तो के पास पहुंच गया। यदि इसमें अपराध हुई है तो सजा या क्षमा देदो । माता मैं ने किसी को ठगने के उद्देश्य कभी किन्ही भक्त के पूछने पर मार्गदर्शन नही दिया है। मेरे हृदय में स्थित ज्ञान तेरा ही रूप है मेरी बुद्धि की मालकिन तू ही है । फिर यदि मुझ से कोई गलती होती है तो मैं किस पर प्रश्न करू ? मेरे हृदय की बात को तुम भली भांति जानती हो।
सब का कल्याण हो । सब का मंगलमय हो सम्पूर्ण पृथ्वी पर सनातन धर्म से सजी रहे । पृथ्वी पर सभी हीन भावना से दूर भीतर से हिन्दू हो। सूर्य की भांति विश्वगुरु भारत चमकता रहे। सच्चे साधू संतो से मेरी भारत माता और पृथ्वी मां सजी सजी रहे । मां दुर्गे सभी तेरे कृपापत्र का अधकारी हो । गौ माता की रक्षा हो । इसके सिवाय और मुझे इस पृथ्वी पर कुछ नही चाहिए ।
वृंदावन और बरसाना की महारानी मां राधिके मैं तेरी शरण आया हूं। तुम अब कृपा करेगी । राधा मैया तू मेरी मां है और मैं तेरा बेटा हूं बस इतना ही मंत्र जानता हूं ।
मेरे प्यारे गोबिंद काश मैं तेरे माखन चोरी का आरोप अपने सर लेता ।
मेरे प्यारे गोविंद काश मै तेरे बदले यशोदा मैया की थप्पड़ खाता
मेरे प्यारे गोविंद काश मै तेरे साथ गेंद खेलता
मेरे प्यारे गोविंद काश मै भी तेरे साथ गौ चराता
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे साथ मथुरा में होता
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे बचपन का यार होता
मेरे गोबिंद काश मै भी मैया को ठगने में माहिर होता
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे साथ राक्षसों का वध करता
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे साथ सोता जागता खेलता रोता और गुरुकुल में शिक्षा लेता ।
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी उस घने जंगल में बुढ़िया की दी हुई चने खाता ।
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे सीने से लिपटा होता ।
मेरे प्यारे गोबिंद काश मै भी तेरे साथ बार बार जन्मता और शरीर त्यागता ।
मेरे प्यारे गोबिंद ये भाव विचार कहां से और क्यो लिख रहा मुझे पता नही मैं तो बस तेरे प्रेम में तेरे साथ जीना मरना चाहता ।
मेरे प्यारे गोबिंद माना तो था तेरा अर्जुन हूं पर धीरे धीरे मेरा मन इतना बढ़ गया पता नही तेरे सखा क्यों बनना चाहता ।
मेरे प्यारे गोबिंद मेरे को मुक्ति ब्रह्म ज्ञान और न बंधन चाहता मैं तो बस तेरे साथ हंसना रोना चाहता ।
भक्ति
तेरी हर एक वाणी दिव्य है माता तेरी हर एक लीला दिव्य है।
जो किसी को समझ न आए तेरे चरण प्रेम का वो आनंद भी दिव्य है तेरे हाथ में जो त्रिशूल है वो भी दिव्य है तेरे हाथ में जो तलवार है वो भी दिव्य है तेरे मस्तक पर अर्धचंद्रमा भी दिव्य है । तेरे हाथ में गदा सुदर्शन धनुष बाण शंख हैं वो भी दिव्य है। तेरे हाथ में तो अनंत अभय आशिर्वाद और वरदान है माता । तेरे गले की हार और तेरे मस्तक पर सुंदर मुकुट हैं वो भी दिव्य है माता है । तेरे स्नेह और प्रेम भरी नेत्र हैं वो भी दिव्य है माता । तेरे सुंदर मुखड़े के आगे तो करोड़ो सुंदरियों फीकी पड़ जाए । तेरे हाथ की चूड़ियां और तेरे श्रृंगार की सुंदरता तो करोड़ो मुखों से भी वर्णन नही किया जा सकता । तेरे सिंह को देख काल भी दूर दूर तक नजर नहीं आते । वो तो साक्षात् मृत्यु का भी मृत्यु है । तेरे भाग को देख साक्षात् यमदूत भी डर से थर थर कांपते हैं । मैं तेरी दिव्य कथा कहां से प्रारंभ करू कहां अंत करू माता तू अनादि अनंत स्वरूप और गुणों को जननी है माता ।
माता तेरी सदा जय जय कार है तेरे चरणो में अन्नत कोटि दंडवत प्रणाम है माता .... तुम्हे हर दिशा हर ओर से नमस्कार है माता ...... माता तुम्हे हर रूप में दंडवत प्रणाम है।
– श्रीरामभक्त वत्स 🙏♥️🙏
मैया तू मुझे इतना वरदान दे ।
कैसा भी भक्त हो किसी के लिए मन में कोई मतभेद न हो
मुझे सभी सम्प्रदाय सभी मत पंथ के भक्त गुरुजन और संत प्यारे लगे ।
तू सब की माता है तू सब की जननी है तू सब की स्वामिनी है।
तू सब की ईश्वरी है तू सब की प्यारी है तू मुक्त स्वरूपिणी है तू कैव्यलय प्रदान करने वाली है तू आत्म स्वरूप देने वाली है किसी भक्त और उसके संग में कोई दोष न दिखे सभी मुझे प्यारे लगे । जहां जाऊ सब को प्रेम दू जहां जाऊ सब को आदर सम्मान दू।
जय मां वैष्णो महारानी 🙏
वैष्णो महारानी जी का परिवार
ए मेरे आत्मा के खुदा आदिगुरु महादेव तू सबसे बड़ा है। हे विकारों को नाश करने वाला है तू सब पे मेहर करने वाला है । हे जगत के मालिक पार ब्रह्म तू करोड़ो सूर्य को अपनी प्रकाश देता है तू करोड़ो चंद्र को अपनी प्रकाश देकर उसे आजमाता है तू ही सारें जगत को अपने में लीन करता है। एक तू ही विकारों से मुक्त है एक तू जगत का आश्रय है । ये उसी में खो जाता है ये विकार भरी मन किसे नहीं छला। जिसने तेरा नाम लेकर अपना उद्धार न किया उसका ये मानव शरीर बर्बाद है । हे मेरे स्वामी हे निरंकार तू ही वेदों को रचा कर वैदिक धर्म की स्थापना करता है । तू ही सारे सत्य शास्त्रों को बनाया है । तू ही उसकी रक्षा करता है तू सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाला है। तू सारे जीवो प्राण देकर जीवित रखता है । तू ही संपूर्ण जगत को अपने अधीन में रखने वाला है । हे मधुसूदन हे वासुदेव श्री कृष्ण हे अंतर्यामी तू ही मन में गंगा की नदी बहाकर मन को निर्मल बनाता है ।
हे जगत का पालन करने वाले हरि हे वेदों में पुरुषुत्तम कहलाने वाले हरि तू ही जीवो को बुध्दि विवेक देकर आजमाता है तू ही अच्छे बुरे राह पे लगाता तू सबकुछ जानने वाला है । ये दास तेरा ही गुणगान करता हैं ।
जय मां भगवती दुर्गा भवानी
सत वाहेगुरू हरि नाम
🙏🙏🌷 हरि ॐ तत् सत् 🌷🙏🙏
–श्रीरामभक वत्स
हे मेरे भीतर के आत्म देव तू बादशाहो का बादशाह और राजाओं का राजा है तू सम्राटो का सम्राट है । तुझे कोई माया नही क्षल तू सभी प्रपंचों से मुक्त है तू सभी विकारों से मुक्त है । तू प्रकृति से पड़े है। तू जीवन मुक्त है तू आदि अंत से रहित है तू अनेकों माया रचता है तू अनेकों माया को अपने लीन करने वाला है । तू साक्षात प्रेम का मूरत है । इस शरीर को प्राण तू ही देता है इस शरीर में चेतना तू ही डालता है । इस शरीर को तू ही त्यागता है तू रस रूप गंध स्पर्श से सदा मुक्त है । तू न सोता है न जागता है तू न कही जाता है तू न कही आता है तू वैरागों का महासगर है। तू सारे से निर्लिप्त है। तू अपनी मां दुर्गा को याद कर वो तुम्हे सदा याद करती रहती है। तू अपनी मैया राधा को याद कर वो तुम्हे सदा याद किया करती है । तेरी मां सावर्याप्त है । वो कही नही गई है वो सदा तेरे साथ है। तू सभी भय को नाश करने वाला है तू अमृत स्वरुप है। तू सब के हृदय में बसता है।
निर्गुण स्वरुप सगुण स्वरुप त्रिमूर्त स्वरूप अमूर्त स्वरूप दुर्गति नाशक कल्याण स्वरुप कैवल्य स्वरूप प्राण स्वरूप निर्विकार स्वरूप मुक्त स्वरूप आनन्द स्वरुप आदी अनादि स्वरूप परब्रह्म स्वरूप अविनाशी स्वरूप महेश्वर स्वामी आपकी जय हो । आपकी जय हो आपकी जय हो। आपको बार बार प्रणाम है आपको बार बार दंडवत प्रणाम हैं। आदिगुरु विशेश्वर आपके चरणो में दंडवत प्रणाम । 🙏
[24/07, 4:11 pm] श्रीरामभक्त: प्रेम स्वरूप कृष्ण करुणा स्वरूप कृष्ण दया स्वरूप कृष्ण क्षमा स्वरुप कृष्ण सरल स्वरूप कृष्ण संतोष स्वरूप कृष्ण सत्य स्वरूप कृष्ण ।
🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️
[24/07, 4:11 pm] श्रीरामभक्त: भूमि स्वरूप कृष्ण जल स्वरूप कृष्ण अग्नि स्वरूप कृष्ण वायु स्वरूप कृष्ण आत्मा स्वरूप कृष्ण पीपल रूप कृष्ण ।
🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️
[24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: भक्त जैसा भी हो सब भगवान के प्यारे हैं।
हरे राम हरे हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
🙏मैं भगवान में हूं। 🙏
[24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है ।
हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏
[24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: भगवान दया और क्षमा के मूरत हैं । वो सब पर कृपा करते हैं भगवान सब के स्वामी हैं। अपमान करने वाले सम्मान करने वाले सुख दुख देने वाले सब में भगवान है भगवान में सब है। उनसे पड़े कुछ नही है।
[24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है ।
हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏
[24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे ।
हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है ।
[24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे ।
हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है ।
[24/07, 9:13 pm] श्रीरामभक्त: विकार अविकार से पार निर्विकार , गति दुर्गति से पार अविगत , ब्रम्ह आदि ब्रम्ह से पार ब्रम्हतीत , आदि अंत से पार आनादि , जन्म मरण से पार अजन्मा ( विदेह) , व्यापी अव्यापी से पार सर्वव्यापी सनातन परमात्मा🙏
[24/07, 9:13 pm] श्रीरामभक्त: हरि स्वयं अपनी इक्षा से संसार चला रहा है वो हर स्थान में है ।
हरि सभी में है सब कोई हरि में है। हरि के सिवाय कुछ नही है ।
ऐसे हरि को सभी रूपो में प्रणाम 🙏
[20/07, 10:48 am] श्रीरामभक्त: प्रेम बहुत अनमोल रत्न है।
इसे किसी धन से खरीदा या नहीं बेचा जा सकता ।
प्रेम कोई कमजोर या नाजुक नही वस्तु नहीं है ।
प्रेम कोई व्यापार नही है प्रेम में कोई शुद्र पंडित नही है।
प्रेम की यही
[20/07, 6:57 pm] श्रीरामभक्त: हे राम मैं ने तेरी कभी सेवा नही मैं ने कभी तेरा ध्यान नहीं किया मैं ने कभी मन से तेरा सम्मान नही किया हे हरि अब तू ही मेरा गुरु रूप में आजा तू ही मुझे स्वयं को पहचानने की शक्ति दे ।
[20/07, 7:00 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि तू अपने चरण की प्रेम भक्ति दे मै सदा तेरा ही चिंतन में डूबा रहूं। मेरे पापो का नाश कर मैं तेरे पास आने का अधिकारी हूं तू सब के हृदय में रहता है तू सब का स्वामी है ।
[20/07, 7:00 pm] श्रीरामभक्त: रे मन तू बड़ा बहरूपिया है तू बार बार रंग बदलता है तू बार बार संग बदलता है तू एक हरि नाम को गुरु बना ले हरि स्वयं तेरे सारे दुखों का नाश करेगा । तू जब जब हरि का ध्यान करेगा तब तब हरि तेरा ध्यान करेगा ।
[20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे त्रिपुरांत कारी हे त्रिलोचन हे महाकाल हे हरि हे कृष्ण हे श्याम सुंदर मैं अपनी हाथ तेरी ओर बढ़ा रहा हूं मेरा हाथ थाम ले मुझे इस जगत में चलने नही आती। अब मैं स्वयं को संभालने में असमर्थ हूं ।
[20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे नागेंद्र हे विशेश्वर हे दया के महान सागर आदिगुरु महादेव हे जटाधारी हे भास्मधारी हे त्रिशूल धारण करने वाले तुम मुझ बालक को गोद लेलो । मैं सदा तेरे चरणो का दास बना रहूं मैं अपनी शक्ति से तुम्हे नही पहचान सकता ।
[20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे जगत के सिरजन हार हे सगुण रूप में प्रकट होने वाले देवकी नंदन हे यशोदा नंदन मैं तेरे चरणों की धूल अपने सर पर धारण करता हूं जब मैं ने स्वयं को तेरे आगे सौप दिया फिर क्यों चिंता करू।
[20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे भगवती मां दुर्गे हे भगवती मां राधे हे जगत के स्वामिन तेरे बनाए जगत में स्वयं कर्तार ने घोर दुःख को पाया है । मैं किस खेत का मूली हूं। श्रीराम जानकी के दुख के आगे मेरा दुःख कुछ भी नही है। मुझे इतना ही वरदान दे मै सब प्रेम दू
[20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे तुलसी माता हे गंगा माता हे श्री राधिका माता मैं तेरा बालक हूं । मेरे विचारो को तू ही पवित्र करती है मेरे क्रोध को तू ही अपने वश में रखती है मेरी प्यारी मां मैं तुम्हे कभी न भूलूं मैं तेरे एहसान को कभी न भूलूं। मैं तेरा लाल हूं
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे प्यारे गोविंद हे मलिक हे मधुसूदन जितना मैं स्वयं को नही जानता उससे अधिक तू मेरे हृदय को जानता है । मैं तेरे शरण हूं मैं तेरे वश में हूं हे प्यारे मैं तेरे निगरानी से बाहर कभी न जाऊ।
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि सभी जीवो को जीवनशक्ति भी तू ही है प्राण शक्ति भी तू ही अपने प्रेमियों में भी आनंद तू ही प्रकट करता है तेरी वश के बाहर कुछ नही है जन्मों जन्मों साथ तू ही निभाता है। तेरा एहसान मैं कभी नही भूलूं।
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे राम विकार भरी उपदेशों से तू ही मुझे बचाता है हे गोविन्द मोह रूपी नींद से तू ही मुझ दास को जगाता है हृदय को पवित्र कर उसमे प्रेम भी तू ही डालता है मन को निर्मल बना तू ही उसमे निवास करता है।
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि तूने ही ये सृष्टि रची है चार वेद पुराण भी तू ने ही बनाया है जीवो को सुख दुःख भी तू ही देता है माया विष का मोह और प्रेम भी तू ने ही बनाया है । सारे जगत का विस्तार और जगत का स्वयं में लीन भी तू ही करता है।
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हरि ने इस इस जगत को स्वयं रचा है। वो अपनी रचना का स्वयं ही ध्यान रखता है । हरि ने पार्थ को घोर दुख में डाला तो उसका साथ भी नही छोड़ा । मेरा स्वामी जानता है। ये पार्थ ने स्वयं के झोली में प्रिय भक्तो का दुःख मांगा था।
[20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे अनंत स्वरूप वाले आदिगुरु महादेव हे अनंत ज्ञान वाले सदाशिव हे अनंत नेत्र वाले त्रिकालशर्शी हे जगत के स्वामी हे अनंत ब्रह्मांड को अपने एक अंश में धारण करने वाले तू मुझे अपने चरणो की प्रेमभक्ति दे । मैं तेरे शरण आया हूं ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे सच्चा प्यार तो केवल तुमने किया जगत के मोह में मै तो सदा ठगा गया। तू सब में रहने वाली है तू स्वयं नाम दीक्षा देने वाली है मैं तो करोड़ो मुखों से भी तेरे गुणों को बया नही कर सकता । 🙏♥️🙏
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे जगत के सारे जीव तेरे बच्चे हैं मैं भी तेरा हूं तू ही परब्रह्म स्वरूपिणी है तू मेरी बुद्धि की मालकिन है तू पतितो को पवित्र करने वाली है हे मेरी बुद्धि को पवित्र कर अपने चरणो में लगा ले ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे हे प्रचंड शक्ति धारण करने वाली हे अनंत गुणों वाली हे अनंत रूपो वाली मैं अपनी शक्ति से तेरे पास नही आ सकता अब तू स्वयं मुझे अपनी ओर खींच ले ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे हे महामाई हे महामाता हे महान पराक्रम की स्वामिनी हे कृष्ण स्वरुपिणी हे राधा स्वरूपिणी अब देर न करो । मुझ पर दया करो मैं अपार शोक में हूं न जाने तुम्हे कहां कहां ढूंढा अब तू स्वयं चाहेगी तभी मिलेगी ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मधुसूदन हे अंतर्यामी प्रभु हे अयोध्या पति रामचंद्र हे महावीर हनुमान तू मुझे अपने चरणो की प्रेम भक्ति दे ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे आदि गुरु महेश्वर हे आदिमाता माहेश्वरी हे आदि गणेश मुझे आप से कुछ नही चाहिए आप मुझको मेरी मैया राधा और मां दुर्गा के चरणो की प्रेमभक्ति दे दे ।
[20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे कृष्ण तू योगियों का योगी योगेश्वर है तू अपने प्रेमी को सच्चा आनन्द देने वाला है तू अन्नत आनन्द वाला है तू संसार सागर से पार लगाने वाला तू सभी दुष्टों का नाश करने वाला है तू ही अर्जुन है तू ही पार्थ अर्जुन का सारथी है ।
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि करोड़ो सूर्य की भांति जो तेरा तेज है उसे देख कर भी मुझे संतुष्टि नहीं मिली मुझे तो तेरा वो सगुण रूप ही प्रिय है जो काक और ध्रुव जी को प्रिय लगता था । मुझे तेरा वही रूप अच्छा लगता है ।
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: रे मन जैसे जल से जल अलग नही होता वैसे आत्मा परमात्मा से अलग नही होता जिसे हरि स्वयं में लीन कर लिया उसे ये ज्ञान हो जाता है सब कुछ वासुदेव ही है । हरि स्वयं का ही स्वयं स्मरण कर रहा है । वो आत्मिक आनंद से डोलता रहता है
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे मन परमात्मा को जो अच्छा लगता है वही करता वो जिसे भक्ति देता है वही उसके गुण नाम और कीर्तन गाता है वो एक रूप है वो संतो से अलग नही है वो तेरे से अलग नही है तू अपने को पहचान तू कौन है तेरा स्वामी कौन है ।
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: मैं गोपी मैया पर सदा कुर्बान हूं जिन्होंने हरि का साक्षात् दर्शन किया मैं उस सुदामा जी पर सदा कुर्बान हूं जिन्होंने हरि का साक्षात् दर्शन किया मैं उस महत्मा अर्जुन पर सदा कुर्बान हूं जिन्होने हरि को अपना सारथी बनाया ।
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: रे मन जो हरि के स्मरण नही करता वो माया के प्रपंच से कभी अनंत काल तक नही छूट सकता । हरि सब का कल्याण करने वाला तेरा भी कल्याण करेगा तू शोक मत कर ।
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि मुझे तो बस तुम्हे पुकारने आता है तेरा नाम रटने आता है तेरे से प्रेम करने आता है तू मेरा स्वामी है तू ही मेरा गुरु है तेरे सिवाय अब और कुछ न भाए मुझ पर मेहर कर। 🙏
[20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि मेरे प्रेम को तू ही जानता है तू मेरे हृदय में रहता है तू सब का स्वामी है सब रूप में अलेके व्याप्त है तू वासुदेव सर्वम है सब कुछ तुझ से उतपन्न हुवा है सब तेरे में लीन हो जाएंगे। पर मैं तो तेरे सदके जावा।
प्यारे गोबिंद
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: प्रेम स्वरूप कृष्ण करुणा स्वरूप कृष्ण दया स्वरूप कृष्ण क्षमा स्वरुप कृष्ण सरल स्वरूप कृष्ण संतोष स्वरूप कृष्ण सत्य स्वरूप कृष्ण ।
🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भूमि स्वरूप कृष्ण जल स्वरूप कृष्ण अग्नि स्वरूप कृष्ण वायु स्वरूप कृष्ण आत्मा स्वरूप कृष्ण पीपल रूप कृष्ण ।
🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भक्त जैसा भी हो सब भगवान के प्यारे हैं।
हरे राम हरे हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
🙏मैं भगवान में हूं। 🙏
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है ।
हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भगवान दया और क्षमा के मूरत हैं । वो सब पर कृपा करते हैं भगवान सब के स्वामी हैं। अपमान करने वाले सम्मान करने वाले सुख दुख देने वाले सब में भगवान है भगवान में सब है। उनसे पड़े कुछ नही है।
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है ।
हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे ।
हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है ।
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: विकार अविकार से पार निर्विकार , गति दुर्गति से पार अविगत , ब्रम्ह आदि ब्रम्ह से पार ब्रम्हतीत , आदि अंत से पार आनादि , जन्म मरण से पार अजन्मा ( विदेह) , व्यापी अव्यापी से पार सर्वव्यापी सनातन परमात्मा🙏
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे ।
हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है ।
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि स्वयं अपनी इक्षा से संसार चला रहा है वो हर स्थान में है ।
हरि सभी में है सब कोई हरि में है। हरि के सिवाय कुछ नही है ।
ऐसे हरि को सभी रूपो में प्रणाम 🙏
[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हे अनादि अंत से रहित हे सब के स्वामी गोबिंद हे अंतर्यामी करोड़ो जीभ से भी तेरा नाम लिया जाए करोड़ो बार नाम लिया जाय और सोचे मैं इतनी बार जप कर लूंगा तो तेरी प्राप्ति हो जाएगी । मैं अपनी मेहनत से भगवान की प्राप्ति कर लूंगा ये जीवो का झूठा अहंकार है इस अहंकार से तुम्हारा कोई अता पता भी नही लगा सकता ....जब तक तू स्वयं नही दया करता तब तुम्हे कोई प्राप्त नही कर सकता। कई योगी ध्यान लगा कर तेरा पता लगा रहे हैं कई संत बनकर मन में विकार लिए प्रवचन दे रहें कोई पंथ की माया जाल में तेरी महिमा गाकर दूसरे पंथ की निंदा कर रहे हैं कोई जोड़ जोड़ से चिल्ला कर तेरे नाम का नमाज अदा कर रहे हैं कोई समाधि लगा बैठा है । हे जगत पालक यदि मन यही अहंकार लिए मैं तेरी वंदना करू तो तू भी मेरी नही सुनेगा । मैं सदा तेरे आश्रय लिया है मैं हे माधव रघुनंदन तू जैसे नचाता है मैं वैसे नाचता हूं । मुझ से तेरी शक्ति के बीना कुछ भी नही हो सकता । इस संसार में छोटा बड़ा श्रेष्ठ सर्व श्रेष्ठ की फैसला तेरे दरबार में ही होता है । तू सभी के हृदय में स्थित जानने वाला है।
मां दुर्गा और मां राधा स्तुति
हे करूणा मय जगदंब मंगल स्वरुप दुर्गे कैवल्य स्वरूप मुक्त स्वरूप आनन्द स्वरुप माता अंबिके जिसका मन तेरे नाम तेरे लीन हो गया .. उस मनुष्य का धर्म के साथ सीधा संबंध बन जाता है, वह फिर दुनिया के विभिन्न पंथ मत रास्तों पे नहीं चलता उसके अंतःकरण में ये द्वंद नहीं रहता कि ये मार्ग ठीक है और ये गलत है ।
हे मधुर स्वरूपिणी वैष्णवी तेरा नाम जो माया के प्रभाव से परे है वो इतना ऊंचा है कि इस में जुड़ने वाला भी उच्च आत्मिक अवस्था वाला हो जाता है पर ये बात तभी समझ में आती है जब कोई मनुष्य अपने मन में "मां काली दुर्गे राधे श्याम गौरी शंकर सीता राम वाहेगुरु" आदि किसी एक नाम में भी सच्ची श्रद्धा जाग जाए ।
हे निराकार साकार ओंकार निर्विकार जगत के पालनहार तारणहार भव सागर से पार माया से पार प्रपंचों से पार यदि मैं दुनिया में बहुत बड़ी हस्ती बना लू ऊंची नाम बना लू दुनिया की सारी संपदा प्राप्त कर लू..पूरी दुनिया से अपनी गुणगान बड़ाई कराऊं... माता माहेश्वरी यदि तेरी दृष्टि मुझ पर न पड़ी तो मैं तेरे आगे सूक्ष्म कीड़ा ही हूं।
माता सर्वेश्वरी काल के भी काल महाकालेश्वरी मृत्यू की भी मृत्यु रूद्राणी यदि मैं तेरे नाम से विमुख होकर अपनी नाम कमा लूं अपनी मान कमा लूं दान – पुण्य कमा लूं तप करके सैकड़ो इंद्र के समान शक्तियां प्राप्त कर लू कुछ समय के लिए त्रिलोक पर शासन जमा लू सैकड़ों सूर्य चंद्र को अपने अधीन कर लू तो भी मैं तेरे यमदूत के आगे कीड़ा ही हूं । मेरी बुद्धि एक कीड़ा के समान ही है ।
अन्नत स्वरूपिणी माता दुर्गे प्राण स्वरूप माता राधिके आत्मा स्वरूप माता सर्वात्मन है अनंत शक्तियों की जननी आद्याशक्ति अनंता यदि मैं ऊंची अवस्था प्राप्त कर लू ऊंचे पद प्राप्त कर लू कई सिद्धियां प्राप्त कर लू बड़े बड़े ज्ञान प्राप्त कर लू यदि मैं तेरे नाम के आगे न झुकूं तो मैं तेरे बनाए संसार का मूर्ख अहंकारी जीव ही हूं।
माता देवकी तुमने अनंत ब्रह्मांड को ही अपने गर्भ में आश्रय दिया है। माता यशोदा तुमने अनंत जगत को ही अपने हाथो से माखन खिला कर कृतार्थ कर दिया है माता अंबिके जो तेरे आगे नहीं झुकते वो तो कलयुगी जीव तेरे ओखल में पड़े धान के समान ही है जिसके कूटने के बाद उसमें तेरी भक्ति बन जाती है।
– श्रीराम सेवक 🙏♥️🌷
हरि जी प्रेम भक्ति
हरि जी तुम्हे बार बार नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो को अपने चरणो को प्रेमभक्ति प्रदान किया ।
मां वृजेश्वरी श्री राधिके तुम्हे अन्नत कोटि नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमीजनों को अपने चरणो की भक्ति प्रदान की....
मां भगवती दुर्गा तुम्हे बार बार अन्नत कोटि दंडवत नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो की कलयुगी प्रांपचो से रक्षा की ....
माता कृष्ण माता राधिके माता दुर्गे माता गोपी तुम्हे आगे से नमस्कार तुम्हे पीछे से नमस्कार तुम्हे सब रूप में नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो को अपने चरणो की भक्ति प्रदान की...
माता तुम ही सर्वात्मा सव्रेश्वरी तुम शिवा हो तुम शिव हो तुम ही आदि अनादि और मध्य हो तुम ही आदि अंत से रहित अन्नता हो।
माता तुम ही जगत का संचालन करने वाली हो तुम ही अनंत सृष्टि को धारण करने वाली हो ।
माता तुम ही सभी जीवो रूप में स्थित हो तुम गौरी लक्ष्मी माता सरस्वती गंगा गोदावरी यमुना तथा सर्वदेव सर्वदेवी महादेव महादेवी हो ।
माता मैं तेरा गुणानग कहां से प्रारम्भ करू तुम ही वासुदेव सर्वम हो तुम ही राधा सर्वम और दुर्गा सर्वम हो ।
माता मुझे हर स्वांस से वायु के स्थान पर तेरा नाम ही नाम निकले माता मैं हर जन्म तेरा रहू। माता मुझ पर बस तेरा अधिकार हो माता मेरी श्रद्धा बस तेरे चरणो में रहे । माता मुझे मणिद्वीप गोलोक वैकुंठ लोक कुछ नही चाहिए मैं तो तेरे चरणो के प्रेम का प्यासा हूं माता मुझे अपने चरणो की प्रेम भक्ति दो । माता मुझे ज्ञान विज्ञान प्राण कुछ नही चाहिए । मुझे तो बस तेरे साथ रहने का वरदान चाहिए । माता मुझे मुक्ति शक्ति सिद्धी आदि कुछ नही चाहिए मुझे तो बस तेरे भक्तो का दुःख संकट विपत्ति अपने सर पे चाहिए । माता तुम ही अपने भक्तो रूप में स्थित है मैं तो तेरा उदंड बालक हूं । सब को परेसान करने वाला हूं संतो झगड़ने वाला हूं । पर जैसा भी हूं तेरा हूं भीतर से संतो और तेरे भक्तो के चरणो का दास हूं । माता मुझे कुछ नही चाहिए । मुझे तो बस तुम्हारे भक्तो को आदर सम्मान प्रेम देने वाली बुद्धि चाहिए ।
माता तुम जहां कही भी हो तुम्हे हर हृदय में पुकार पुकार कर तुझे बुला लूंगा । अब तुम मुझ से आंख मिचोलिया खेलना बंद करो मेरा हाल अब तेरे बिना बेहाल है । माता तू ही दरिद्र सुदामा का कृष्ण हो तुम ही हनुमान के रामचंद्र जानकी हो तुम ही मेरे गोबिंद श्री राधा आदिगुरु महादेव हो । माता तुम ही जल अग्नि चंद्र सूर्य गगन पशु पक्षी असुर सुर देव दानव और इन सबसे पड़े परब्रह्म स्वरूप हो ।
हे सर्वेशरी जगतीश्वरी परमेश्वरी भक्तवत्सला मैं जन्मों जन्मों तुम्हे ध्याऊंगा फिर तू मेरी इक्षा के अनुसार नही मिलने वाली है जब तेरी इक्षा होगी तभी मिलने वाली है अर्थात मैं तेरा पुत्र होकर भी अनाथ ही सिद्ध हुवा । माता तुम तो मैया द्रोपदी के बुलाने पा आ गई थी तुम तो गजराज को बुलाने पर आ गई थी ध्रुव प्रह्लाद के बुलाने पर आ गई थी पर मेरे नैन तेरा दर्शन कब करे तू ही जाने ....
हे हरि मैं तो तेरा नाम ही जानता हूं। मैं तुम्हे ही माता पिता भाई बहन मित्र गुरु साधु संत और जगत स्वरूप में जनता हूं मैं पूजा पाठ तीर्थ स्नान कर्म काण्ड यज्ञ आदि करना कुछ नही जानता बस तेरे प्रेम और दुलार रस का भूखा हूं ।
करुणा माइ गोबिंद दया करो माता कृपा करो माता मुझे इस दुर्गम संसार में तेरे सिवाय और कौन समझ सकते हैं । माता इस दुर्गम संसार से पार तेरे साथ ही जाना चाहता हूं तेरे साथ ही रहना चाहता हूं । माता तुम जहां कही भी छुपी हो आने की कृपा करो ।
❤️🙏🌷
– श्री राम भक्त राहुल झा
मां काली स्त्रोत्र
दिव्य स्वरूपिणी मां काली आपकी जय हो आपकी जय हो
रक्तबीज सहारिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार है आपको बार बार नमस्कार है आपको बार बार नमस्कार है
दुष्ट विनाशीनी मां काली आपके चरणो में बार बार नमस्कार है माता जगद्मबीक आपको हर दिशा से हर दिव्य रूप में आपको नमस्कार है ।
जगत स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार बार नमस्कार बार नमस्कार है ।
परब्रह्म स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार प्रणाम आपको बार प्रणाम आपको बार बार प्रणाम है ।
आत्म स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार नमस्कार बार बार नमस्कार बार नमस्कार।
विराट स्वरुपिणी मां काली आपको हर रूप में नमस्कार आपको हर दिशा से नमस्कार आपको अनंत बार नमस्कार है
विक्राल स्वरूपिणी मां काली आपकी जय आपकी जय हो ।
नर मुंडो की माला धारण करने वाली माता आपकी जय हो
मृत्यु को भी मार भगाने वाली माता आपकी जय हो आपकी सदा जय हो
नारियों की रक्षा करने वाली माता आपकी जय ही आपकी जय हो ।
अपने खंडा से सम्पूर्ण जगत के संकटों का नाश करने वाली माता आपकी जय आपकी जय हो आपकी जय हो ।
स्त्रियों में पतिव्रता स्वरुप में स्थित रहने वाली माता काली आपकी जय हो आपकी जय हो आपकी जय हो ।
महाविद्या ब्रह्म विद्या आत्म विद्या स्वरूपिणी माता आपकी जय हो आपकी जय हो आपकी सदा जय हो आपके चरणो मे बार बार नमस्कार माता चंडीके आपको बार बार प्रणाम ।
– श्रीराम सेवक 🙏🙏🙏
🙏🌷♥️🙏♥️🌷🙏🌷🙏♥️🌷🙏♥️🌷
शुक्रवार, 26 मई 2023
हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक स्तुति
हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक गुणगान
हे हरि एक तू ही इस दास का सहारा है हे हरि एक मात्र तू ही सब का दिशा है तू ही माया और माया से परे है । हे गुरुदेव मैं ने सदा तेरा तिरस्कार किया । मैं ने कभी तुझे अपने सर से नही नवाया । हे गोबिंद एक तू इस अर्जुन का सारथी है । अपने अंतः कारण में मैं ने कभी तेरी आवाज न सुनी । बाहर सदा माया के द्वारा ठगा गया । माया के वशीभूत होकर मैं ने तुझे कभी नही पढ़ा । तू माया है तू ही माया से पड़े है। हे श्रीराम हे गोबिंद तू मुझ में स्थित होकर मेरे मैले मन को निर्मल बना । तू सब को जीवन दान देता है । तू ही सब की रक्षा करता है । मैं ने तुझे कभी नही धयाया। सदा मैं झूठे संसार को अपना सहारा समझता रहा । तू ही अंतः करण में स्थित होकर जीवो को अपने माया के द्वारा नचाता है । मैं तो तेरे चरणो का ऋणी हूं । तेरा सब कुछ तुझे अर्पण कर निश्चिंत हूं । तुझे जैसे अच्छा लगता है वैसा कर । हे विष्णो हे एक तू ही मुझ हारे हुए के हरि है । तू ही इस अर्जुन के अंतः स्थित कलयुग रूपी सेना का नाश करने में समर्थ है । जीवन के जुवा में तू ही हार और जीत है । ये अर्जुन तेरा मुख देख कर जीता है तेरी दया के भीख से ही तुझे सब रूपो में व्याप्त स्मरण करने में समर्थ हुआ है । तुझे अपने अंतः करण से लेकर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित बार बार नमस्कार करता हूं। तुझे जैसा अच्छा लगे वैसा कर । मैं ने स्वयं को तुम्हे सौप दिया। मैं ने स्वयं को तुझ अनंत संसार में बहुत ढूंढा पर उसकी कोई थाह पता न लगी।। । अब ये तेरा दास हार मान तेरे दिव्य कर्मो को भांपने में असमर्थ है । इस दास के अंतः कारण में स्थित होकर भीतर जमे मैल को अपनी शक्ति से साफ कर हृदय और मन को पवित्र बना दे । जहां जाऊ तो वहां गंगाजल जैसी पवित्रता हो । जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास दोष को प्रेम की सरोवर में नहलाता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा पति हे गोपी मैया के प्रीतम हे मीरा माई के प्रभु मैं भी तेरे प्रेम में बावड़ा हो गया हूं ।
ये दुनिया अब कुछ भी उसकी फरवाह न रही।
हे अंतर्यामी हे लक्ष्मी पति आदि नारायण हे श्याम सुंदर जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास को प्रेम की सरोवर में नहलाता है। तू ही मुझ पतित को प्रेम रस का अमृत पान करा पवित्र करता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा मैया के कान्हा , हे गोपी मैया के प्रीतम नटनागर हे मीरा मैया गिरधर गोपाल हे सूरदास के हृदय कमल हे नानक के स्वामी मैं कुछ नही करता जो करता है तू ही करता है। मुझे तेरे उपर पुरा भरोसा है तू हमेशा पाप से बचाता है । ये जीव माया के वशीभूत कर अपना छोटा संसार में फसा है । वो अपने परिवार में तुझे अंतर्यामी को न देखकर भूल कर बैठता है तू तो सर्व्यपत है। मैं ने तेरी कृपा से कर्म काण्ड भी देखे । जब तक मन के मैल न जाएं । तब तक मन के भूमि में पाप रूपी विचार , विकार , भाव ,स्वभाव नहीं मिटाए जा सकते । न ही कोई निर्मल मन बीना (कृतज्ञता पूर्वक , अभिमान रहित होकर पूजा पाठ तीर्थ हवन के क्रियाओं आदी में कृतज्ञ भाव) हे दीन दयाल प्रभु मेरे अहम का नाश करो । मुझे तेरे सिवाय और कुछ नही पता । तू ही जल रूप में प्राणियों का प्यास बुझाता है तू ही भोजन रूप में प्राणियों का पालन करता है तू ही जल बरसाता है तू बिजली चमकाता है । तू ही पृथ्वि को निमित्त बना कर अन्न उत्पन करता है । मैं ने तुझे इस रूप में कभी नही याद किया । तू खरबों सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र और संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में धारण कर स्थित है । मेरी क्या औकाद तुझे अपनी छोटी बुद्धि से तेरे थाह पता का विचार करू। मैं तो सदा तेरा ऋणी रहूंगा । तू ही मुझ में प्राण अपान और समान वायु है । तू ही परब्रह्म है तू ही आदि वैष्णव आदि गुरु महादेव का स्वामि है । तू स्वयं आदि गुरु सदा शिव के रूप में स्थित हैं । तू ही विद्वानों के हृदय में विज्ञान और ज्ञान स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । हे मुरली मनोहर तू ही हजार महाकाल को अपने जीभा से चाटता है । तू सभी विकारों से रहित है तू अनंत गुणों और सभी कालाओ से संपन्न है। एक तू ही त्रिदेवो और उनकी शक्तियों के रूप में स्थित होकर जीवो को उत्पन्न ,पालन पोषण और संहार करता हैं । हे माधव तू ने जितना समर्थ दिया तेरा ये दास उतने से ही तुझे ध्याता है । मेरी ये भौतिक नेत्र तेरे तेज को संभालने में असमर्थ है । मेरी अपनी कोई दिव्य शक्ति नही है । मेरी अपनी कोई भी चमत्कारिक शक्ति नही । न तेरे द्वारा दिया हूवा कोई सिद्धि कोई चाहता है तू ने इस दास को जितना दिया है ये दास सदा इतने में ही संतुष्ट है । ये दास तेरे करुणा मय प्रेम सागर में डूब कर तेरे चरण का आश्रय लिया है । हे प्यारे मोहन तू मैं तेरा ही लाल हूं । तू सदा सब की देखभाल करने वाला है । ये दास तुझे बार बार प्रणाम करता हैं ।
– श्रीरामभक्त (वत्स)
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