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बुधवार, 9 अगस्त 2023

भक्ति

तेरी हर एक वाणी दिव्य है माता तेरी हर एक लीला दिव्य है। जो किसी को समझ न आए तेरे चरण प्रेम का वो आनंद भी दिव्य है तेरे हाथ में जो त्रिशूल है वो भी दिव्य है तेरे हाथ में जो तलवार है वो भी दिव्य है तेरे मस्तक पर अर्धचंद्रमा भी दिव्य है । तेरे हाथ में गदा सुदर्शन धनुष बाण शंख हैं वो भी दिव्य है। तेरे हाथ में तो अनंत अभय आशिर्वाद और वरदान है माता । तेरे गले की हार और तेरे मस्तक पर सुंदर मुकुट हैं वो भी दिव्य है माता है । तेरे स्नेह और प्रेम भरी नेत्र हैं वो भी दिव्य है माता । तेरे सुंदर मुखड़े के आगे तो करोड़ो सुंदरियों फीकी पड़ जाए । तेरे हाथ की चूड़ियां और तेरे श्रृंगार की सुंदरता तो करोड़ो मुखों से भी वर्णन नही किया जा सकता । तेरे सिंह को देख काल भी दूर दूर तक नजर नहीं आते । वो तो साक्षात् मृत्यु का भी मृत्यु है । तेरे भाग को देख साक्षात् यमदूत भी डर से थर थर कांपते हैं । मैं तेरी दिव्य कथा कहां से प्रारंभ करू कहां अंत करू माता तू अनादि अनंत स्वरूप और गुणों को जननी है माता । माता तेरी सदा जय जय कार है तेरे चरणो में अन्नत कोटि दंडवत प्रणाम है माता .... तुम्हे हर दिशा हर ओर से नमस्कार है माता ...... माता तुम्हे हर रूप में दंडवत प्रणाम है। – श्रीरामभक्त वत्स 🙏♥️🙏 मैया तू मुझे इतना वरदान दे । कैसा भी भक्त हो किसी के लिए मन में कोई मतभेद न हो मुझे सभी सम्प्रदाय सभी मत पंथ के भक्त गुरुजन और संत प्यारे लगे । तू सब की माता है तू सब की जननी है तू सब की स्वामिनी है। तू सब की ईश्वरी है तू सब की प्यारी है तू मुक्त स्वरूपिणी है तू कैव्यलय प्रदान करने वाली है तू आत्म स्वरूप देने वाली है किसी भक्त और उसके संग में कोई दोष न दिखे सभी मुझे प्यारे लगे । जहां जाऊ सब को प्रेम दू जहां जाऊ सब को आदर सम्मान दू। जय मां वैष्णो महारानी 🙏 वैष्णो महारानी जी का परिवार ए मेरे आत्मा के खुदा आदिगुरु महादेव तू सबसे बड़ा है। हे विकारों को नाश करने वाला है तू सब पे मेहर करने वाला है । हे जगत के मालिक पार ब्रह्म तू करोड़ो सूर्य को अपनी प्रकाश देता है तू करोड़ो चंद्र को अपनी प्रकाश देकर उसे आजमाता है तू ही सारें जगत को अपने में लीन करता है। एक तू ही विकारों से मुक्त है एक तू जगत का आश्रय है । ये उसी में खो जाता है ये विकार भरी मन किसे नहीं छला। जिसने तेरा नाम लेकर अपना उद्धार न किया उसका ये मानव शरीर बर्बाद है । हे मेरे स्वामी हे निरंकार तू ही वेदों को रचा कर वैदिक धर्म की स्थापना करता है । तू ही सारे सत्य शास्त्रों को बनाया है । तू ही उसकी रक्षा करता है तू सभी प्राणियों के हृदय में निवास करने वाला है। तू सारे जीवो प्राण देकर जीवित रखता है । तू ही संपूर्ण जगत को अपने अधीन में रखने वाला है । हे मधुसूदन हे वासुदेव श्री कृष्ण हे अंतर्यामी तू ही मन में गंगा की नदी बहाकर मन को निर्मल बनाता है । हे जगत का पालन करने वाले हरि हे वेदों में पुरुषुत्तम कहलाने वाले हरि तू ही जीवो को बुध्दि विवेक देकर आजमाता है तू ही अच्छे बुरे राह पे लगाता तू सबकुछ जानने वाला है । ये दास तेरा ही गुणगान करता हैं । जय मां भगवती दुर्गा भवानी सत वाहेगुरू हरि नाम 🙏🙏🌷 हरि ॐ तत् सत् 🌷🙏🙏 –श्रीरामभक वत्स हे मेरे भीतर के आत्म देव तू बादशाहो का बादशाह और राजाओं का राजा है तू सम्राटो का सम्राट है । तुझे कोई माया नही क्षल तू सभी प्रपंचों से मुक्त है तू सभी विकारों से मुक्त है । तू प्रकृति से पड़े है। तू जीवन मुक्त है तू आदि अंत से रहित है तू अनेकों माया रचता है तू अनेकों माया को अपने लीन करने वाला है । तू साक्षात प्रेम का मूरत है । इस शरीर को प्राण तू ही देता है इस शरीर में चेतना तू ही डालता है । इस शरीर को तू ही त्यागता है तू रस रूप गंध स्पर्श से सदा मुक्त है । तू न सोता है न जागता है तू न कही जाता है तू न कही आता है तू वैरागों का महासगर है। तू सारे से निर्लिप्त है। तू अपनी मां दुर्गा को याद कर वो तुम्हे सदा याद करती रहती है। तू अपनी मैया राधा को याद कर वो तुम्हे सदा याद किया करती है । तेरी मां सावर्याप्त है । वो कही नही गई है वो सदा तेरे साथ है। तू सभी भय को नाश करने वाला है तू अमृत स्वरुप है। तू सब के हृदय में बसता है। निर्गुण स्वरुप सगुण स्वरुप त्रिमूर्त स्वरूप अमूर्त स्वरूप दुर्गति नाशक कल्याण स्वरुप कैवल्य स्वरूप प्राण स्वरूप निर्विकार स्वरूप मुक्त स्वरूप आनन्द स्वरुप आदी अनादि स्वरूप परब्रह्म स्वरूप अविनाशी स्वरूप महेश्वर स्वामी आपकी जय हो । आपकी जय हो आपकी जय हो। आपको बार बार प्रणाम है आपको बार बार दंडवत प्रणाम हैं। आदिगुरु विशेश्वर आपके चरणो में दंडवत प्रणाम । 🙏 [24/07, 4:11 pm] श्रीरामभक्त: प्रेम स्वरूप कृष्ण करुणा स्वरूप कृष्ण दया स्वरूप कृष्ण क्षमा स्वरुप कृष्ण सरल स्वरूप कृष्ण संतोष स्वरूप कृष्ण सत्य स्वरूप कृष्ण । 🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️ [24/07, 4:11 pm] श्रीरामभक्त: भूमि स्वरूप कृष्ण जल स्वरूप कृष्ण अग्नि स्वरूप कृष्ण वायु स्वरूप कृष्ण आत्मा स्वरूप कृष्ण पीपल रूप कृष्ण । 🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️ [24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: भक्त जैसा भी हो सब भगवान के प्यारे हैं। हरे राम हरे हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। 🙏मैं भगवान में हूं। 🙏 [24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है । हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏 [24/07, 9:11 pm] श्रीरामभक्त: भगवान दया और क्षमा के मूरत हैं । वो सब पर कृपा करते हैं भगवान सब के स्वामी हैं। अपमान करने वाले सम्मान करने वाले सुख दुख देने वाले सब में भगवान है भगवान में सब है। उनसे पड़े कुछ नही है। [24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है । हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏 [24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे । हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है । [24/07, 9:12 pm] श्रीरामभक्त: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे । हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है । [24/07, 9:13 pm] श्रीरामभक्त: विकार अविकार से पार निर्विकार , गति दुर्गति से पार अविगत , ब्रम्ह आदि ब्रम्ह से पार ब्रम्हतीत , आदि अंत से पार आनादि , जन्म मरण से पार अजन्मा ( विदेह) , व्यापी अव्यापी से पार सर्वव्यापी सनातन परमात्मा🙏 [24/07, 9:13 pm] श्रीरामभक्त: हरि स्वयं अपनी इक्षा से संसार चला रहा है वो हर स्थान में है । हरि सभी में है सब कोई हरि में है। हरि के सिवाय कुछ नही है । ऐसे हरि को सभी रूपो में प्रणाम 🙏 [20/07, 10:48 am] श्रीरामभक्त: प्रेम बहुत अनमोल रत्न है। इसे किसी धन से खरीदा या नहीं बेचा जा सकता । प्रेम कोई कमजोर या नाजुक नही वस्तु नहीं है । प्रेम कोई व्यापार नही है प्रेम में कोई शुद्र पंडित नही है। प्रेम की यही [20/07, 6:57 pm] श्रीरामभक्त: हे राम मैं ने तेरी कभी सेवा नही मैं ने कभी तेरा ध्यान नहीं किया मैं ने कभी मन से तेरा सम्मान नही किया हे हरि अब तू ही मेरा गुरु रूप में आजा तू ही मुझे स्वयं को पहचानने की शक्ति दे । [20/07, 7:00 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि तू अपने चरण की प्रेम भक्ति दे मै सदा तेरा ही चिंतन में डूबा रहूं। मेरे पापो का नाश कर मैं तेरे पास आने का अधिकारी हूं तू सब के हृदय में रहता है तू सब का स्वामी है । [20/07, 7:00 pm] श्रीरामभक्त: रे मन तू बड़ा बहरूपिया है तू बार बार रंग बदलता है तू बार बार संग बदलता है तू एक हरि नाम को गुरु बना ले हरि स्वयं तेरे सारे दुखों का नाश करेगा । तू जब जब हरि का ध्यान करेगा तब तब हरि तेरा ध्यान करेगा । [20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे त्रिपुरांत कारी हे त्रिलोचन हे महाकाल हे हरि हे कृष्ण हे श्याम सुंदर मैं अपनी हाथ तेरी ओर बढ़ा रहा हूं मेरा हाथ थाम ले मुझे इस जगत में चलने नही आती। अब मैं स्वयं को संभालने में असमर्थ हूं । [20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे नागेंद्र हे विशेश्वर हे दया के महान सागर आदिगुरु महादेव हे जटाधारी हे भास्मधारी हे त्रिशूल धारण करने वाले तुम मुझ बालक को गोद लेलो । मैं सदा तेरे चरणो का दास बना रहूं मैं अपनी शक्ति से तुम्हे नही पहचान सकता । [20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे जगत के सिरजन हार हे सगुण रूप में प्रकट होने वाले देवकी नंदन हे यशोदा नंदन मैं तेरे चरणों की धूल अपने सर पर धारण करता हूं जब मैं ने स्वयं को तेरे आगे सौप दिया फिर क्यों चिंता करू। [20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे भगवती मां दुर्गे हे भगवती मां राधे हे जगत के स्वामिन तेरे बनाए जगत में स्वयं कर्तार ने घोर दुःख को पाया है । मैं किस खेत का मूली हूं। श्रीराम जानकी के दुख के आगे मेरा दुःख कुछ भी नही है। मुझे इतना ही वरदान दे मै सब प्रेम दू [20/07, 7:01 pm] श्रीरामभक्त: हे तुलसी माता हे गंगा माता हे श्री राधिका माता मैं तेरा बालक हूं । मेरे विचारो को तू ही पवित्र करती है मेरे क्रोध को तू ही अपने वश में रखती है मेरी प्यारी मां मैं तुम्हे कभी न भूलूं मैं तेरे एहसान को कभी न भूलूं। मैं तेरा लाल हूं [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे प्यारे गोविंद हे मलिक हे मधुसूदन जितना मैं स्वयं को नही जानता उससे अधिक तू मेरे हृदय को जानता है । मैं तेरे शरण हूं मैं तेरे वश में हूं हे प्यारे मैं तेरे निगरानी से बाहर कभी न जाऊ। [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि सभी जीवो को जीवनशक्ति भी तू ही है प्राण शक्ति भी तू ही अपने प्रेमियों में भी आनंद तू ही प्रकट करता है तेरी वश के बाहर कुछ नही है जन्मों जन्मों साथ तू ही निभाता है। तेरा एहसान मैं कभी नही भूलूं। [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे राम विकार भरी उपदेशों से तू ही मुझे बचाता है हे गोविन्द मोह रूपी नींद से तू ही मुझ दास को जगाता है हृदय को पवित्र कर उसमे प्रेम भी तू ही डालता है मन को निर्मल बना तू ही उसमे निवास करता है। [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि तूने ही ये सृष्टि रची है चार वेद पुराण भी तू ने ही बनाया है जीवो को सुख दुःख भी तू ही देता है माया विष का मोह और प्रेम भी तू ने ही बनाया है । सारे जगत का विस्तार और जगत का स्वयं में लीन भी तू ही करता है। [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हरि ने इस इस जगत को स्वयं रचा है। वो अपनी रचना का स्वयं ही ध्यान रखता है । हरि ने पार्थ को घोर दुख में डाला तो उसका साथ भी नही छोड़ा । मेरा स्वामी जानता है। ये पार्थ ने स्वयं के झोली में प्रिय भक्तो का दुःख मांगा था। [20/07, 7:02 pm] श्रीरामभक्त: हे अनंत स्वरूप वाले आदिगुरु महादेव हे अनंत ज्ञान वाले सदाशिव हे अनंत नेत्र वाले त्रिकालशर्शी हे जगत के स्वामी हे अनंत ब्रह्मांड को अपने एक अंश में धारण करने वाले तू मुझे अपने चरणो की प्रेमभक्ति दे । मैं तेरे शरण आया हूं । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे सच्चा प्यार तो केवल तुमने किया जगत के मोह में मै तो सदा ठगा गया। तू सब में रहने वाली है तू स्वयं नाम दीक्षा देने वाली है मैं तो करोड़ो मुखों से भी तेरे गुणों को बया नही कर सकता । 🙏♥️🙏 [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे जगत के सारे जीव तेरे बच्चे हैं मैं भी तेरा हूं तू ही परब्रह्म स्वरूपिणी है तू मेरी बुद्धि की मालकिन है तू पतितो को पवित्र करने वाली है हे मेरी बुद्धि को पवित्र कर अपने चरणो में लगा ले । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे हे प्रचंड शक्ति धारण करने वाली हे अनंत गुणों वाली हे अनंत रूपो वाली मैं अपनी शक्ति से तेरे पास नही आ सकता अब तू स्वयं मुझे अपनी ओर खींच ले । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मां दुर्गे हे महामाई हे महामाता हे महान पराक्रम की स्वामिनी हे कृष्ण स्वरुपिणी हे राधा स्वरूपिणी अब देर न करो । मुझ पर दया करो मैं अपार शोक में हूं न जाने तुम्हे कहां कहां ढूंढा अब तू स्वयं चाहेगी तभी मिलेगी । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे मधुसूदन हे अंतर्यामी प्रभु हे अयोध्या पति रामचंद्र हे महावीर हनुमान तू मुझे अपने चरणो की प्रेम भक्ति दे । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे आदि गुरु महेश्वर हे आदिमाता माहेश्वरी हे आदि गणेश मुझे आप से कुछ नही चाहिए आप मुझको मेरी मैया राधा और मां दुर्गा के चरणो की प्रेमभक्ति दे दे । [20/07, 7:03 pm] श्रीरामभक्त: हे कृष्ण तू योगियों का योगी योगेश्वर है तू अपने प्रेमी को सच्चा आनन्द देने वाला है तू अन्नत आनन्द वाला है तू संसार सागर से पार लगाने वाला तू सभी दुष्टों का नाश करने वाला है तू ही अर्जुन है तू ही पार्थ अर्जुन का सारथी है । [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि करोड़ो सूर्य की भांति जो तेरा तेज है उसे देख कर भी मुझे संतुष्टि नहीं मिली मुझे तो तेरा वो सगुण रूप ही प्रिय है जो काक और ध्रुव जी को प्रिय लगता था । मुझे तेरा वही रूप अच्छा लगता है । [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: रे मन जैसे जल से जल अलग नही होता वैसे आत्मा परमात्मा से अलग नही होता जिसे हरि स्वयं में लीन कर लिया उसे ये ज्ञान हो जाता है सब कुछ वासुदेव ही है । हरि स्वयं का ही स्वयं स्मरण कर रहा है । वो आत्मिक आनंद से डोलता रहता है [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे मन परमात्मा को जो अच्छा लगता है वही करता वो जिसे भक्ति देता है वही उसके गुण नाम और कीर्तन गाता है वो एक रूप है वो संतो से अलग नही है वो तेरे से अलग नही है तू अपने को पहचान तू कौन है तेरा स्वामी कौन है । [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: मैं गोपी मैया पर सदा कुर्बान हूं जिन्होंने हरि का साक्षात् दर्शन किया मैं उस सुदामा जी पर सदा कुर्बान हूं जिन्होंने हरि का साक्षात् दर्शन किया मैं उस महत्मा अर्जुन पर सदा कुर्बान हूं जिन्होने हरि को अपना सारथी बनाया । [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: रे मन जो हरि के स्मरण नही करता वो माया के प्रपंच से कभी अनंत काल तक नही छूट सकता । हरि सब का कल्याण करने वाला तेरा भी कल्याण करेगा तू शोक मत कर । [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि मुझे तो बस तुम्हे पुकारने आता है तेरा नाम रटने आता है तेरे से प्रेम करने आता है तू मेरा स्वामी है तू ही मेरा गुरु है तेरे सिवाय अब और कुछ न भाए मुझ पर मेहर कर। 🙏 [20/07, 7:04 pm] श्रीरामभक्त: हे हरि मेरे प्रेम को तू ही जानता है तू मेरे हृदय में रहता है तू सब का स्वामी है सब रूप में अलेके व्याप्त है तू वासुदेव सर्वम है सब कुछ तुझ से उतपन्न हुवा है सब तेरे में लीन हो जाएंगे। पर मैं तो तेरे सदके जावा।

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