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बुधवार, 9 अगस्त 2023

प्यारे गोबिंद

[08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: प्रेम स्वरूप कृष्ण करुणा स्वरूप कृष्ण दया स्वरूप कृष्ण क्षमा स्वरुप कृष्ण सरल स्वरूप कृष्ण संतोष स्वरूप कृष्ण सत्य स्वरूप कृष्ण । 🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️ [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भूमि स्वरूप कृष्ण जल स्वरूप कृष्ण अग्नि स्वरूप कृष्ण वायु स्वरूप कृष्ण आत्मा स्वरूप कृष्ण पीपल रूप कृष्ण । 🙏🙏🙏🌷🌷🌷♥️♥️♥️ [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भक्त जैसा भी हो सब भगवान के प्यारे हैं। हरे राम हरे हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। 🙏मैं भगवान में हूं। 🙏 [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है । हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏 [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: भगवान दया और क्षमा के मूरत हैं । वो सब पर कृपा करते हैं भगवान सब के स्वामी हैं। अपमान करने वाले सम्मान करने वाले सुख दुख देने वाले सब में भगवान है भगवान में सब है। उनसे पड़े कुछ नही है। [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि सचिदानंद स्वरूप है हरि सत स्वरूप है हरि ही सत पुरुष है। हरि ही असत स्वरूप है । हरि ही पूर्ण ब्रह्म है हरि परम् ब्रह्म स्वरूप है । 🙏🙏🙏 [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे । हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है । [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: विकार अविकार से पार निर्विकार , गति दुर्गति से पार अविगत , ब्रम्ह आदि ब्रम्ह से पार ब्रम्हतीत , आदि अंत से पार आनादि , जन्म मरण से पार अजन्मा ( विदेह) , व्यापी अव्यापी से पार सर्वव्यापी सनातन परमात्मा🙏 [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: बस जहां रहे वहां हरि के सिवाय कुछ भी स्मरण न रहे । हरि का दास हरि पर आश्रित है। क्योंकि एक हरि ही सत है और सब कुछ असत है । [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हरि स्वयं अपनी इक्षा से संसार चला रहा है वो हर स्थान में है । हरि सभी में है सब कोई हरि में है। हरि के सिवाय कुछ नही है । ऐसे हरि को सभी रूपो में प्रणाम 🙏 [08/08, 9:36 am] श्रीरामभक्त वत्स: हे अनादि अंत से रहित हे सब के स्वामी गोबिंद हे अंतर्यामी करोड़ो जीभ से भी तेरा नाम लिया जाए करोड़ो बार नाम लिया जाय और सोचे मैं इतनी बार जप कर लूंगा तो तेरी प्राप्ति हो जाएगी । मैं अपनी मेहनत से भगवान की प्राप्ति कर लूंगा ये जीवो का झूठा अहंकार है इस अहंकार से तुम्हारा कोई अता पता भी नही लगा सकता ....जब तक तू स्वयं नही दया करता तब तुम्हे कोई प्राप्त नही कर सकता। कई योगी ध्यान लगा कर तेरा पता लगा रहे हैं कई संत बनकर मन में विकार लिए प्रवचन दे रहें कोई पंथ की माया जाल में तेरी महिमा गाकर दूसरे पंथ की निंदा कर रहे हैं कोई जोड़ जोड़ से चिल्ला कर तेरे नाम का नमाज अदा कर रहे हैं कोई समाधि लगा बैठा है । हे जगत पालक यदि मन यही अहंकार लिए मैं तेरी वंदना करू तो तू भी मेरी नही सुनेगा । मैं सदा तेरे आश्रय लिया है मैं हे माधव रघुनंदन तू जैसे नचाता है मैं वैसे नाचता हूं । मुझ से तेरी शक्ति के बीना कुछ भी नही हो सकता । इस संसार में छोटा बड़ा श्रेष्ठ सर्व श्रेष्ठ की फैसला तेरे दरबार में ही होता है । तू सभी के हृदय में स्थित जानने वाला है।

मां दुर्गा और मां राधा स्तुति

हे करूणा मय जगदंब मंगल स्वरुप दुर्गे कैवल्य स्वरूप मुक्त स्वरूप आनन्द स्वरुप माता अंबिके जिसका मन तेरे नाम तेरे लीन हो गया .. उस मनुष्य का धर्म के साथ सीधा संबंध बन जाता है, वह फिर दुनिया के विभिन्न पंथ मत रास्तों पे नहीं चलता उसके अंतःकरण में ये द्वंद नहीं रहता कि ये मार्ग ठीक है और ये गलत है । हे मधुर स्वरूपिणी वैष्णवी तेरा नाम जो माया के प्रभाव से परे है वो इतना ऊंचा है कि इस में जुड़ने वाला भी उच्च आत्मिक अवस्था वाला हो जाता है पर ये बात तभी समझ में आती है जब कोई मनुष्य अपने मन में "मां काली दुर्गे राधे श्याम गौरी शंकर सीता राम वाहेगुरु" आदि किसी एक नाम में भी सच्ची श्रद्धा जाग जाए । हे निराकार साकार ओंकार निर्विकार जगत के पालनहार तारणहार भव सागर से पार माया से पार प्रपंचों से पार यदि मैं दुनिया में बहुत बड़ी हस्ती बना लू ऊंची नाम बना लू दुनिया की सारी संपदा प्राप्त कर लू..पूरी दुनिया से अपनी गुणगान बड़ाई कराऊं... माता माहेश्वरी यदि तेरी दृष्टि मुझ पर न पड़ी तो मैं तेरे आगे सूक्ष्म कीड़ा ही हूं। माता सर्वेश्वरी काल के भी काल महाकालेश्वरी मृत्यू की भी मृत्यु रूद्राणी यदि मैं तेरे नाम से विमुख होकर अपनी नाम कमा लूं अपनी मान कमा लूं दान – पुण्य कमा लूं तप करके सैकड़ो इंद्र के समान शक्तियां प्राप्त कर लू कुछ समय के लिए त्रिलोक पर शासन जमा लू सैकड़ों सूर्य चंद्र को अपने अधीन कर लू तो भी मैं तेरे यमदूत के आगे कीड़ा ही हूं । मेरी बुद्धि एक कीड़ा के समान ही है । अन्नत स्वरूपिणी माता दुर्गे प्राण स्वरूप माता राधिके आत्मा स्वरूप माता सर्वात्मन है अनंत शक्तियों की जननी आद्याशक्ति अनंता यदि मैं ऊंची अवस्था प्राप्त कर लू ऊंचे पद प्राप्त कर लू कई सिद्धियां प्राप्त कर लू बड़े बड़े ज्ञान प्राप्त कर लू यदि मैं तेरे नाम के आगे न झुकूं तो मैं तेरे बनाए संसार का मूर्ख अहंकारी जीव ही हूं। माता देवकी तुमने अनंत ब्रह्मांड को ही अपने गर्भ में आश्रय दिया है। माता यशोदा तुमने अनंत जगत को ही अपने हाथो से माखन खिला कर कृतार्थ कर दिया है माता अंबिके जो तेरे आगे नहीं झुकते वो तो कलयुगी जीव तेरे ओखल में पड़े धान के समान ही है जिसके कूटने के बाद उसमें तेरी भक्ति बन जाती है। – श्रीराम सेवक 🙏♥️🌷

हरि जी प्रेम भक्ति

हरि जी तुम्हे बार बार नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो को अपने चरणो को प्रेमभक्ति प्रदान किया । मां वृजेश्वरी श्री राधिके तुम्हे अन्नत कोटि नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमीजनों को अपने चरणो की भक्ति प्रदान की.... मां भगवती दुर्गा तुम्हे बार बार अन्नत कोटि दंडवत नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो की कलयुगी प्रांपचो से रक्षा की .... माता कृष्ण माता राधिके माता दुर्गे माता गोपी तुम्हे आगे से नमस्कार तुम्हे पीछे से नमस्कार तुम्हे सब रूप में नमस्कार जो तुमने सभी प्रेमी जनो को अपने चरणो की भक्ति प्रदान की... माता तुम ही सर्वात्मा सव्रेश्वरी तुम शिवा हो तुम शिव हो तुम ही आदि अनादि और मध्य हो तुम ही आदि अंत से रहित अन्नता हो। माता तुम ही जगत का संचालन करने वाली हो तुम ही अनंत सृष्टि को धारण करने वाली हो । माता तुम ही सभी जीवो रूप में स्थित हो तुम गौरी लक्ष्मी माता सरस्वती गंगा गोदावरी यमुना तथा सर्वदेव सर्वदेवी महादेव महादेवी हो । माता मैं तेरा गुणानग कहां से प्रारम्भ करू तुम ही वासुदेव सर्वम हो तुम ही राधा सर्वम और दुर्गा सर्वम हो । माता मुझे हर स्वांस से वायु के स्थान पर तेरा नाम ही नाम निकले माता मैं हर जन्म तेरा रहू। माता मुझ पर बस तेरा अधिकार हो माता मेरी श्रद्धा बस तेरे चरणो में रहे । माता मुझे मणिद्वीप गोलोक वैकुंठ लोक कुछ नही चाहिए मैं तो तेरे चरणो के प्रेम का प्यासा हूं माता मुझे अपने चरणो की प्रेम भक्ति दो । माता मुझे ज्ञान विज्ञान प्राण कुछ नही चाहिए । मुझे तो बस तेरे साथ रहने का वरदान चाहिए । माता मुझे मुक्ति शक्ति सिद्धी आदि कुछ नही चाहिए मुझे तो बस तेरे भक्तो का दुःख संकट विपत्ति अपने सर पे चाहिए । माता तुम ही अपने भक्तो रूप में स्थित है मैं तो तेरा उदंड बालक हूं । सब को परेसान करने वाला हूं संतो झगड़ने वाला हूं । पर जैसा भी हूं तेरा हूं भीतर से संतो और तेरे भक्तो के चरणो का दास हूं । माता मुझे कुछ नही चाहिए । मुझे तो बस तुम्हारे भक्तो को आदर सम्मान प्रेम देने वाली बुद्धि चाहिए । माता तुम जहां कही भी हो तुम्हे हर हृदय में पुकार पुकार कर तुझे बुला लूंगा । अब तुम मुझ से आंख मिचोलिया खेलना बंद करो मेरा हाल अब तेरे बिना बेहाल है । माता तू ही दरिद्र सुदामा का कृष्ण हो तुम ही हनुमान के रामचंद्र जानकी हो तुम ही मेरे गोबिंद श्री राधा आदिगुरु महादेव हो । माता तुम ही जल अग्नि चंद्र सूर्य गगन पशु पक्षी असुर सुर देव दानव और इन सबसे पड़े परब्रह्म स्वरूप हो । हे सर्वेशरी जगतीश्वरी परमेश्वरी भक्तवत्सला मैं जन्मों जन्मों तुम्हे ध्याऊंगा फिर तू मेरी इक्षा के अनुसार नही मिलने वाली है जब तेरी इक्षा होगी तभी मिलने वाली है अर्थात मैं तेरा पुत्र होकर भी अनाथ ही सिद्ध हुवा । माता तुम तो मैया द्रोपदी के बुलाने पा आ गई थी तुम तो गजराज को बुलाने पर आ गई थी ध्रुव प्रह्लाद के बुलाने पर आ गई थी पर मेरे नैन तेरा दर्शन कब करे तू ही जाने .... हे हरि मैं तो तेरा नाम ही जानता हूं। मैं तुम्हे ही माता पिता भाई बहन मित्र गुरु साधु संत और जगत स्वरूप में जनता हूं मैं पूजा पाठ तीर्थ स्नान कर्म काण्ड यज्ञ आदि करना कुछ नही जानता बस तेरे प्रेम और दुलार रस का भूखा हूं । करुणा माइ गोबिंद दया करो माता कृपा करो माता मुझे इस दुर्गम संसार में तेरे सिवाय और कौन समझ सकते हैं । माता इस दुर्गम संसार से पार तेरे साथ ही जाना चाहता हूं तेरे साथ ही रहना चाहता हूं । माता तुम जहां कही भी छुपी हो आने की कृपा करो । ❤️🙏🌷 – श्री राम भक्त राहुल झा

मां काली स्त्रोत्र

दिव्य स्वरूपिणी मां काली आपकी जय हो आपकी जय हो रक्तबीज सहारिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार है आपको बार बार नमस्कार है आपको बार बार नमस्कार है दुष्ट विनाशीनी मां काली आपके चरणो में बार बार नमस्कार है माता जगद्मबीक आपको हर दिशा से हर दिव्य रूप में आपको नमस्कार है । जगत स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार बार नमस्कार बार नमस्कार है । परब्रह्म स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार प्रणाम आपको बार प्रणाम आपको बार बार प्रणाम है । आत्म स्वरूपिणी मां काली आपको बार बार नमस्कार नमस्कार बार बार नमस्कार बार नमस्कार। विराट स्वरुपिणी मां काली आपको हर रूप में नमस्कार आपको हर दिशा से नमस्कार आपको अनंत बार नमस्कार है विक्राल स्वरूपिणी मां काली आपकी जय आपकी जय हो । नर मुंडो की माला धारण करने वाली माता आपकी जय हो मृत्यु को भी मार भगाने वाली माता आपकी जय हो आपकी सदा जय हो नारियों की रक्षा करने वाली माता आपकी जय ही आपकी जय हो । अपने खंडा से सम्पूर्ण जगत के संकटों का नाश करने वाली माता आपकी जय आपकी जय हो आपकी जय हो । स्त्रियों में पतिव्रता स्वरुप में स्थित रहने वाली माता काली आपकी जय हो आपकी जय हो आपकी जय हो । महाविद्या ब्रह्म विद्या आत्म विद्या स्वरूपिणी माता आपकी जय हो आपकी जय हो आपकी सदा जय हो आपके चरणो मे बार बार नमस्कार माता चंडीके आपको बार बार प्रणाम । – श्रीराम सेवक 🙏🙏🙏 🙏🌷♥️🙏♥️🌷🙏🌷🙏♥️🌷🙏♥️🌷

शुक्रवार, 26 मई 2023

हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक स्तुति

हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक गुणगान हे हरि एक तू ही इस दास का सहारा है हे हरि एक मात्र तू ही सब का दिशा है तू ही माया और माया से परे है । हे गुरुदेव मैं ने सदा तेरा तिरस्कार किया । मैं ने कभी तुझे अपने सर से नही नवाया । हे गोबिंद एक तू इस अर्जुन का सारथी है । अपने अंतः कारण में मैं ने कभी तेरी आवाज न सुनी । बाहर सदा माया के द्वारा ठगा गया । माया के वशीभूत होकर मैं ने तुझे कभी नही पढ़ा । तू माया है तू ही माया से पड़े है। हे श्रीराम हे गोबिंद तू मुझ में स्थित होकर मेरे मैले मन को निर्मल बना । तू सब को जीवन दान देता है । तू ही सब की रक्षा करता है । मैं ने तुझे कभी नही धयाया। सदा मैं झूठे संसार को अपना सहारा समझता रहा । तू ही अंतः करण में स्थित होकर जीवो को अपने माया के द्वारा नचाता है । मैं तो तेरे चरणो का ऋणी हूं । तेरा सब कुछ तुझे अर्पण कर निश्चिंत हूं । तुझे जैसे अच्छा लगता है वैसा कर । हे विष्णो हे एक तू ही मुझ हारे हुए के हरि है । तू ही इस अर्जुन के अंतः स्थित कलयुग रूपी सेना का नाश करने में समर्थ है । जीवन के जुवा में तू ही हार और जीत है । ये अर्जुन तेरा मुख देख कर जीता है तेरी दया के भीख से ही तुझे सब रूपो में व्याप्त स्मरण करने में समर्थ हुआ है । तुझे अपने अंतः करण से लेकर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित बार बार नमस्कार करता हूं। तुझे जैसा अच्छा लगे वैसा कर । मैं ने स्वयं को तुम्हे सौप दिया। मैं ने स्वयं को तुझ अनंत संसार में बहुत ढूंढा पर उसकी कोई थाह पता न लगी।। । अब ये तेरा दास हार मान तेरे दिव्य कर्मो को भांपने में असमर्थ है । इस दास के अंतः कारण में स्थित होकर भीतर जमे मैल को अपनी शक्ति से साफ कर हृदय और मन को पवित्र बना दे । जहां जाऊ तो वहां गंगाजल जैसी पवित्रता हो । जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास दोष को प्रेम की सरोवर में नहलाता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा पति हे गोपी मैया के प्रीतम हे मीरा माई के प्रभु मैं भी तेरे प्रेम में बावड़ा हो गया हूं । ये दुनिया अब कुछ भी उसकी फरवाह न रही। हे अंतर्यामी हे लक्ष्मी पति आदि नारायण हे श्याम सुंदर जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास को प्रेम की सरोवर में नहलाता है। तू ही मुझ पतित को प्रेम रस का अमृत पान करा पवित्र करता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा मैया के कान्हा , हे गोपी मैया के प्रीतम नटनागर हे मीरा मैया गिरधर गोपाल हे सूरदास के हृदय कमल हे नानक के स्वामी मैं कुछ नही करता जो करता है तू ही करता है। मुझे तेरे उपर पुरा भरोसा है तू हमेशा पाप से बचाता है । ये जीव माया के वशीभूत कर अपना छोटा संसार में फसा है । वो अपने परिवार में तुझे अंतर्यामी को न देखकर भूल कर बैठता है तू तो सर्व्यपत है। मैं ने तेरी कृपा से कर्म काण्ड भी देखे । जब तक मन के मैल न जाएं । तब तक मन के भूमि में पाप रूपी विचार , विकार , भाव ,स्वभाव नहीं मिटाए जा सकते । न ही कोई निर्मल मन बीना (कृतज्ञता पूर्वक , अभिमान रहित होकर पूजा पाठ तीर्थ हवन के क्रियाओं आदी में कृतज्ञ भाव) हे दीन दयाल प्रभु मेरे अहम का नाश करो । मुझे तेरे सिवाय और कुछ नही पता । तू ही जल रूप में प्राणियों का प्यास बुझाता है तू ही भोजन रूप में प्राणियों का पालन करता है तू ही जल बरसाता है तू बिजली चमकाता है । तू ही पृथ्वि को निमित्त बना कर अन्न उत्पन करता है । मैं ने तुझे इस रूप में कभी नही याद किया । तू खरबों सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र और संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में धारण कर स्थित है । मेरी क्या औकाद तुझे अपनी छोटी बुद्धि से तेरे थाह पता का विचार करू। मैं तो सदा तेरा ऋणी रहूंगा । तू ही मुझ में प्राण अपान और समान वायु है । तू ही परब्रह्म है तू ही आदि वैष्णव आदि गुरु महादेव का स्वामि है । तू स्वयं आदि गुरु सदा शिव के रूप में स्थित हैं । तू ही विद्वानों के हृदय में विज्ञान और ज्ञान स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । हे मुरली मनोहर तू ही हजार महाकाल को अपने जीभा से चाटता है । तू सभी विकारों से रहित है तू अनंत गुणों और सभी कालाओ से संपन्न है। एक तू ही त्रिदेवो और उनकी शक्तियों के रूप में स्थित होकर जीवो को उत्पन्न ,पालन पोषण और संहार करता हैं । हे माधव तू ने जितना समर्थ दिया तेरा ये दास उतने से ही तुझे ध्याता है । मेरी ये भौतिक नेत्र तेरे तेज को संभालने में असमर्थ है । मेरी अपनी कोई दिव्य शक्ति नही है । मेरी अपनी कोई भी चमत्कारिक शक्ति नही । न तेरे द्वारा दिया हूवा कोई सिद्धि कोई चाहता है तू ने इस दास को जितना दिया है ये दास सदा इतने में ही संतुष्ट है । ये दास तेरे करुणा मय प्रेम सागर में डूब कर तेरे चरण का आश्रय लिया है । हे प्यारे मोहन तू मैं तेरा ही लाल हूं । तू सदा सब की देखभाल करने वाला है । ये दास तुझे बार बार प्रणाम करता हैं । – श्रीरामभक्त (वत्स)

शनिवार, 20 मई 2023

मेरे गोबिंद मेरे नट नागर

मेरे गोविंद मेरे नटनागर मेरा श्याम मेरे गिरधरनागर अब रहा न जाएं सुनो प्यारे हृदय की बात समझो दुलारे तेरा नित प्रेम रस लग गया मुझको अब कुछ न भाता तेरे सिवाय मुझको प्यारे न जीना न मरना आता मुझको दुलारे तेरे सिवाय कौन समझे मुझको तू घट घट बसा अन्तर्यामी सब के हृदय में बस तू ही समाई न बंधन न मुक्ति अब मिल गई चाकरी तेरी तू एक दिन आएगा आस में बैठा हूं स्वामी जैसे तूने दिया दर्शन मीरा माई को वैसे आकर दर्शन दो मेरे श्याम मुरारे जैसे तू मिला गोपी और राधा माई को जैसे तू छाती से लगाया बाल सखाई को वैसे तू हृदय से लगा अपने दास सखाइ को जैसे तूने खेला खेलाया ब्रज में बाल सखाईं को प्रभु वैसे अपना पैर दबाने दो प्रभु वैसे साथ खेलने दो प्रभु मैं न जानू लीला तुम्हारी फिर भी आवाज देता हूं प्रभू मैं न जानू खेल तुम्हारी फिर भी खेलना चाहता हूं प्रभु समझ न आता तुझे पुकारू कैसे कभी पागल रोता कभी हसता जैसे कभी गाता कभी नाचता हो जैसे कभी कुछ बोलता कुछ भी बकता जैसे अब आजा साथ ले के मईया राधा को अब आजा साथ लेकर मैया दुर्गा को अब रहा न जाई तेरे बिना मुझको अब सहा न जाए ये विरह मुझको अब दास राहुल पुकारे तुझको मैया मेरी राधे मैया तेरे सिवाय कौन मुझको स्वीकारे जग ठुकराई तू ने अपनाई हाथ पकड़ तू चलना सिखाई मैया मेरी दुर्गा माता तूने संकटों से मुझको बचाई तेरा दुलार याद आए मुझको कभी न माता भूलूं तुझको पता नही तुझ से लगी प्रीत मुझको कैसे पता नही तुझ से लगी रीत ये मुझको कैसे पता नही तुझ से इतना प्रेम हुवा मुझको कैसे पता नही अब होगा क्या बस तू ही जाने मुझको जैसे – श्रीरामभक्त रा.झा वत्स

बुधवार, 12 अप्रैल 2023

जब मैं स्तुति करता हूं।

जब मैं श्री हरि विष्णु की स्तुति करता हूं तब उन्हें ही समस्त जगत को अपने एक अंश में धारण किए हुए हैं उन्ही को कारण मानता हु। जब मैं शिव की स्तुति करता हूं तब शिव को समस्त जगत को अपने एक अंश में धारण कर स्थित किए हुए हैं उन्ही को कारण मानता हूं । जब मैं भगवती मूल प्राकृतिक माता आदिशक्ति जगदम्बा महालक्ष्मी राधिका की स्तुति करता हूं तब उन्हें ही जगत का कारण मानता हूं अर्थात ये माताएं समस्त जगत को एक अंश में धारण कर स्थित हैं । जब मैं गुरुजनों की स्तुति करता हूं तब उन्ही को ब्रम्हा विष्णु महेश समस्त देव और पर ब्रह्म उन्ही को मानता हूं बशर्ते गुरु जन शिव भक्त हरि भक्त या अध्यशक्ति भक्त होना चाहिए। (गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||) कोई भी सच्चा संत द्वारा लिखित प्रभु के किसी रूप का स्तुति देखो तो ऐसे परमतत्व की पहचान करते हुए उनकी स्तुति गाते हैं । समस्त पुराणों में भी देवता लोग ऐसे ही स्तुति करते हैं । – श्रीरामभक्त राहुल झा

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

संक्षिप्त महाभारत

॥ श्रीहरिः ॥ संक्षिप्त महाभारत महाभारतका सरल, सचित्र हिंदी - अनुवाद त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ आदिपर्व ग्रन्थका उपक्रम नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके सखा नर-रत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले महाभारत ग्रन्थका पाठ करना चाहिये । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । ॐ नमः पितामहाय । ॐ नमः प्रजापतिभ्यः । ॐ नमः श्रीकृष्णद्वैपायनाय । ॐ नमः सर्वविघ्नविनायकेभ्यः । लोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवा सूतवंशके श्रेष्ठ पौराणिक थे। एक बार जब नैमिषारण्य क्षेत्रमें कुलपति शौनक बारह वर्षका सत्संग-सत्र कर रहे थे, तब उग्रश्रवा बड़ी विनयके साथ सुखसे बैठे हुए व्रतनिष्ठ ब्रह्मर्षियोंके पास आये। जब नैमिषारण्यवासी तपस्वी ऋषियोंने देखा कि उग्रश्रवा हमारे आश्रममें आ गये हैं, तब उनसे चित्र-विचित्र कथा सुननेके लिये उन लोगोंने उन्हें घेर लिया। उग्रश्रवाने हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया और सत्कार पाकर उनकी तपस्याके सम्बन्धमें कुशल- प्रश्न किये। सब ऋषि-मुनि अपने-अपने आसनपर विराजमान हो गये और उनके आज्ञानुसार वे भी अपने आसनपर बैठ गये। जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर चुके, तब किसी ऋषिने कथाका प्रसंग प्रस्तुत करनेके लिये उनसे यह प्रश्न किया- ' सूतनन्दन! आप कहाँसे आ रहे हैं? आपने अबतकका समय कहाँ व्यतीत किया है ?" उग्रश्रवाने कहा, ‘मैं परीक्षित्-नन्दन राजर्षि जनमेजयके सर्प-सत्रमें गया हुआ था। वहाँ श्रीवैशम्पायनजीके मुखसे मैंने भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनके द्वारा निर्मित महाभारत ग्रन्थकी अनेकों पवित्र और विचित्र कथाएँ सुनीं। इसके बाद बहुत-से तीर्थों और आश्रमोंमें घूमकर समन्तपंचक क्षेत्रमें आया, जहाँ पहले कौरव और पाण्डवोंका महान् युद्ध हो चुका है। वहाँसे मैं आपलोगोंका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ । आप सभी चिरायु और ब्रह्मनिष्ठ हैं। आपका ब्रह्मतेज सूर्य और अग्निके समान है। आपलोग स्नान, जप, हवन आदिसे निवृत्त होकर पवित्रता और एकाग्रताके साथ अपने-अपने आसनपर बैठे हुए हैं। अब कृपा करके बतलाइये कि मैं आपलोगोंको कौन-सी कथा सुनाऊँ ।' ऋषियोंने कहा— सूतनन्दन ! परमर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायनने जिस ग्रन्थका निर्माण किया है और ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने जिसका सत्कार किया है, जिसमें विचित्र पदोंसे परिपूर्ण पर्व हैं, जो सूक्ष्म अर्थ और न्यायसे भरा हुआ है, जो पद-पदपर वेदार्थसे विभूषित और आख्यानोंमें श्रेष्ठ है, जिसमें भरतवंशका सम्पूर्ण इतिहास है, जो सर्वथा शास्त्रसम्मत है और जिसे श्रीकृष्णद्वैपायनकी आज्ञासे वैशम्पायनजीने राजा जनमेजयको सुनाया है, भगवान् व्यासकी वही पुण्यमयी पापनाशिनी और वेदमयी संहिता हमलोग सुनना चाहते हैं । उग्रश्रवाजीने कहा – भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके आदि हैं। वे अन्तर्यामी, सर्वेश्वर, समस्त यज्ञोंके भोक्ता, सबके द्वारा प्रशंसित, परम सत्य ॐकारस्वरूप ब्रह्म हैं। वे ही सनातन व्यक्त एवं अव्यक्तस्वरूप हैं। वे असत् भी हैं और सत् भी हैं, वे सत्-असत् दोनों हैं और दोनोंसे परे हैं। वे ही विराट् विश्व भी हैं। उन्होंने ही स्थूल और सूक्ष्म दोनोंकी सृष्टि की है। वे ही सबके जीवनदाता, सर्वश्रेष्ठ और अविनाशी हैं। वे ही मंगलकारी, मंगलस्वरूप, सर्वव्यापक, सबके वांछनीय, निष्पाप और परम पवित्र हैं। उन्हीं चराचरगुरु नयनमनोहारी हृषीकेशको नमस्कार करके सर्वलोकपूजित अद्भुतकर्मा भगवान् व्यासकी पवित्र रचना महाभारतका वर्णन करता हूँ । पृथ्वीमें अनेकों प्रतिभाशाली विद्वानोंने इस इतिहासका पहले वर्णन किया है, अब करते हैं और आगे भी करेंगे। यह परमज्ञानस्वरूप ग्रन्थ तीनों लोकोंमें प्रतिष्ठित है। कोई संक्षेपसे, तो कोई विस्तारसे इसे धारण करते हैं । इसकी शब्दावली शुभ है। इसमें अनेकों छन्द हैं और देवता तथा मनुष्योंकी मर्यादाका इसमें स्पष्ट वर्णन है। जिस समय यह जगत् ज्ञान और प्रकाशसे शून्य तथा अन्धकारसे परिपूर्ण था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्डा उत्पन्न हुआ और वही समस्त प्रजाकी उत्पत्तिका कारण बना। वह बड़ा ही दिव्य और ज्योतिर्मय था। श्रुति उसमें सत्य, सनातन, ज्योतिर्मय ब्रह्मका वर्णन करती है। वह ब्रह्म अलौकिक, अचिन्त्य, सर्वत्र सम, अव्यक्त, कारणस्वरूप तथा सत् और असत् दोनों हैं। उसी अण्डे से लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी प्रकट हुए । तदनन्तर दस प्रचेता, दक्ष, उनके सात पुत्र, सात ऋषि और चौदह मनु उत्पन्न हुए। विश्वेदेवा, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, यक्ष, साध्य, पिशाच, गुह्यक, पितर, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, जल, द्युलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, दिशाएँ, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात तथा जगत्में और जितनी भी वस्तुएँ हैं, सब उसी अण्डेसे उत्पन्न हुईं। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रलयके समय जिससे उत्पन्न होता है, उसी परमात्मामें लीन हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे ऋतु आनेपर उसके अनेकों लक्षण प्रकट हो जाते और बदलनेपर लुप्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह कालचक्र, जिससे सभी पदार्थोंकी सृष्टि और संहार होता है, अनादि और अनन्त रूपसे सर्वदा चलता रहता है। संक्षेपमें देवताओंकी संख्या तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस (छत्तीस हजार तीन सौ तैंतीस ) है । विवस्वान्के बारह पुत्र हैं - दिवः पुत्र, बृहद्भानु, चक्षु, आत्मा, विभावसु, सविता, ऋचीक, अर्क, भानु, आशावह, रवि और मनु । मनुके दो पुत्र हुए- देवभ्राट् और सुभ्राट् । सुभ्राट्के तीन पुत्र हुए - दशज्योति, शतज्योति और सहस्रज्योति। ये तीनों ही प्रजावान् और विद्वान् थे। दशज्योतिके सारे भगवान् व्यास समस्त लोक, भूत-भविष्यत् - वर्तमानके रहस्य, कर्म- उपासना-ज्ञानरूप वेद, अभ्यासयुक्त योग, धर्म, अर्थ और काम, शास्त्र तथा लोक-व्यवहारको पूर्णरूपसे जानते हैं। उन्होंने इस ग्रन्थमें व्याख्याके साथ सम्पूर्ण इतिहास और सारी श्रुतियोंका तात्पर्य कह दिया है। भगवान् व्यासने इस महान् ज्ञानका कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे वर्णन किया है, क्योंकि विद्वान् लोग ज्ञानको भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकाशित करते हैं। उन्होंने तपस्या और ब्रह्मचर्यकी शक्तिसे वेदोंका विभाजन करके इस ग्रन्थका निर्माण किया और सोचा कि इसे शिष्योंको किस प्रकार पढ़ाऊँ ? भगवान् व्यासका यह विचार जानकर स्वयं ब्रह्माजी उनकी प्रसन्नता और लोकहितके लिये उनके पास आये। भगवान् वेदव्यास उन्हें देखकर बहुत ही विस्मित हुए और मुनियोंके साथ उठकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा आसनपर बैठाया। स्वागत-सत्कारके बाद ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे भी उनके पास ही बैठ गये। तब व्यासजीने बड़ी प्रसन्नतासे मुसकराते हुए कहा, 'भगवन्! मैंने एक श्रेष्ठ काव्यकी रचना की है। इसमें वैदिक और लौकिक सभी विषय हैं। इसमें वेदांगसहित उपनिषद्, वेदोंका क्रिया- विस्तार, इतिहास, पुराण, भूत, भविष्यत् और वर्तमानके वृत्तान्त, बुढ़ापा, मृत्यु, भय, व्याधि आदिके भाव - अभावका निर्णय, आश्रम और वर्णोंका धर्म, पुराणोंका सार, तपस्या, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा और युगोंका वर्णन, उनका परिमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वण, अध्यात्म, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपतधर्म, देवता और मनुष्योंकी उत्पत्ति, पवित्र तीर्थ, पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन, समुद्र, पूर्व कल्प, दिव्य नगर, युद्धकौशल, विविध दस हजार, शतज्योतिके एक लाख और सहस्रज्योतिके दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए। इन्हींसे कुरु, यदु, भरत, ययाति और इक्ष्वाकु आदि राजर्षियोंके वंश चले। बहुत से वंशों और प्राणियोंकी सृष्टिकी यही परम्परा है। ...................शेष भाग कल । सम्पादक तथा संशोधक श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका गीताप्रेष ,गोरखपुर

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

धन के लिए कृतज्ञता – अभ्यास 7

 






यदि आपके जीवन में धन की कमी है, तो यह बात अच्छी तरह गाँठ बाँध लें कि धन को लेकर चिंतित, ईर्ष्यालु, निराश, हताश, शंकालु या भयभीत होने से आपके पास कभी अधिक धन नहीं आएगा, क्योंकि ये भावनाएँ इस बात से उत्पन्न होती हैं कि आप अपने पास मौजूद धन के लिए कृतज्ञ नहीं हैं। धन को लेकर शिकवा-शिकायत करना, विवाद करना, कुंठित होना, किसी चीज़ की कीमत के बारे में आलोचना करना या पैसे के बारे में किसी दूसरे को बुरा महसूस कराना कृतज्ञता के काम नहीं हैं। इससे आपका आर्थिक जीवन कभी बेहतर नहीं होगा, बल्कि बदतर होता जाएगा।


चाहे आपकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, यह सोचना कि आपके पास पर्याप्त धन नहीं है, अपने पास मौजूद धन के बारे में कृतघ्न होना है। अपने जीवन में धन को चमत्कारिक ढंग से बढ़ाने के लिए आपको अपनी वर्तमान स्थिति को दिमाग से बाहर निकालना होगा और जो भी पैसा आपके पास है, उसके प्रति कृतज्ञता महसूस करनी होगी।


"जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) नहीं है, उसके पास जो है, वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"


जब आपके पास बहुत कम पैसा हो, तो उसे लेकर कृतज्ञता महसूस करना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि आपको यह बात पता हो कि जब तक आप कृतज्ञ नहीं होंगे, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा, तो आप यह काम करने के लिए प्रेरित हो जाएँगे।


धन का विषय कई लोगों के लिए पेचीदा हो सकता है, खास तौर पर तब, जब उनके पास यह पर्याप्त न हो, इसलिए रहस्यमय धन के अभ्यास के दो क़दम हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप दिन के शुरू में ही चमत्कारिक धन का पूरा अभ्यास पढ़ लें, क्योंकि तब आप धन के अभ्यास को दिन भर जारी रख पाएँगे।


बैठकर कुछ मिनट अपने बचपन के बारे में सोचें, जब आपके पास पैसा या तो था ही नहीं 

फिर बहुत कम था। जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जब आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और पूरे ह्रदय से महसूस करें। क्या आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन था ?


क्या आप किसी मकान में रहते थे?


क्या आपको कई सालों तक शिक्षा मिली थी?


आप हर दिन स्कूल कैसे जाते थे? क्या आपके पास स्कूल की पुस्तकें, लंच और अन्य सभी आवश्यक चीजें थीं? बचपन में क्या आप कभी छुट्टियाँ मनाने किसी हिल स्टेशन या समुद्र तट पर गए थे?


बचपन में आपको जन्मदिन के सबसे रोमांचक उपहार कौन से मिले थे? क्या आपके पास साइकल, खिलौने या पालतू जानवर थे?


क्या आपके पास कपड़े थे, जब आपका क़द तेज़ी से बढ़ जाता था और कपड़े छोटे हो जाते थे?


क्या आप कोई फ़िल्म या मैच देखने गए थे, कोई वाद्ययंत्र सीखने गए थे या आपने अपने किसी शौक को पूरा किया था?


क्या आप स्वास्थ्य ठीक न होने पर कभी डॉक्टर के पास गए थे और दवाएँ ली थीं?


क्या आप दंतचिकित्सक के पास गए थे?


क्या आपके पास अनिवार्य सामान थे, जिनका इस्तेमाल आप हर दिन करते थे, जैसे आपका टूथब्रश, टूथपेस्ट, साबुन और शैम्पू ? क्या आप कार में यात्रा करते थे? क्या आप टेलीविज़न देखते थे, फ़ोन करते थे, बिजली और पानी का इस्तेमाल करते थे?


इन सारी चीज़ों के लिए धन की ज़रूरत थी और आपको ये सब मुफ़्त मिली थीं। बचपन और किशोरावस्था के दिनों को याद करने पर आपको अहसास होगा कि आपको कितनी सारी चीजें मिली थीं, जो मेहनत से कमाए गए पैसे से खरीदी गई थीं। हर उदाहरण और याद के लिए कृतज्ञ हों, क्योंकि जब आप अतीत में मिले धन के लिए सच्ची कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो भविष्य में आपका धन रहस्यमय तरीके से बढ़ेगा! कृतज्ञता का नियम इसकी गारंटी देता है।


चमत्कारिक धन के अभ्यास को जारी रखने के लिए एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और उस पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर यह लिखें :


उस सारे धन के लिए भगवान कृष्ण(विष्णु जी) और माता राधा जी(माता लक्ष्मी जी) को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है। जिसके कारण मेरे कई सारे काम आसान हो गए।


इसे वाक्य को कम से कम तीन बार लिखें और गहराई से माता लक्ष्मी (माता राधा जी) और भगवान विष्णु जी (भगवान कृष्ण)के प्रति कृतज्ञता (एहसानमंद) महसूस करे।


आज ही इस रहस्यमय नोट को अपने पर्स या जेब में रख लें। कम से कम एक बार सुबह और एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, इस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथों में थामें अपने लिखे हुए शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ हों। आप जितने ज्यादा ईमानदार होते हैं और इसे जितना अधिक महसूस करते हैं, आपको अपनी आर्थिक परिस्थितियों में उतना ही तीव्र चमत्कारिक परिवर्तन नज़र आएगा।


आप समय से पहले कभी नहीं जान पाएँगे कि आपका धन कैसे बढ़ेगा, लेकिन संभावना इस बात की है कि आप इस दौरान अधिक धन पाने के लिए कई परिस्थितियों में भारी बदलाव देखेंगे। आप वह धन पा सकते हैं, जिसके बारे में आपको अहसास ही नहीं था कि वह आपका था। आपको अप्रत्याशित नकद राशि या चेक मिल सकते हैं। आपको कोई चीज़ डिस्काउंट, रिबेट या कम लागत में मिल सकती है आपको सभी प्रकार की भौतिक चीजें उपहार में मिल सकती हैं, जिन्हें खरीदने में आपका पैसा खर्च होता।


आज के बाद अपना रहस्यमय नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ उस पर हर दिन आपकी नज़र पड़े, ताकि आपको जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद आती रहे। यह कभी न भूलें कि आप जितनी अधिक बार इस रहस्यमय नोट की ओर देखते हैं और मिलने वाले धन के लिए कृतज्ञता महसूस करते हैं, आप अपने आर्थिक जीवन में उतने ही अधिक चमत्कार को सक्रिय कर देते हैं। धन के लिए कृतज्ञता की प्रचुरता का अर्थ है धन की प्रचुरता !


यदि आप खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं, जहाँ आप धन संबंधी किसी चीज़ के बारे में शिकायत करने वाले हैं, चाहे यह शब्दों में हो या विचारों में, तो स्वयं से पूछें “क्या मैं इस शिकायत की कीमत चुकाना चाहता हूँ?" यह सवाल आपको इसलिए पूछना चाहिए, क्योंकि आपकी एक शिकायत भी धन के प्रवाह को धीमा कर देगी या आपके पास आने से रोक देगी।


आज ही खुद से वादा करें कि जब भी आपको कहीं से पैसा मिलेगा, चाहे यह नौकरी की तनख्वाह हो, टैक्स रिफंड या डिस्काउंट हो या किसी से उपहार में मिली चीज़ हो, जिसे खरीदने में पैसा खर्च होता, तो आप उसके लिए वाक़ई कृतज्ञ होंगे। इनमें से हर परिस्थिति का अर्थ है कि आपको धन मिला है और ऐसा हर प्रसंग आपको यह अवसर देता है कि आप हाल में मिले धन के लिए कृतज्ञ बनकर अपने धन को बढ़ाने और कई गुना करने की कृतज्ञता की रहस्यमय शक्ति का इस्तेमाल करें!


1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ और एक से तीन तक के क़दम दोहराएँ लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।


 2. बैठकर कुछ मिनट तक अपने बचपन के बारे में सोचें कि आपको कितनी सारी चीजें बिना पैसे चुकाए ही मिल गई थीं।


3. जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जहाँ आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो तहेदिल से शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और महसूस करें।


4. एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और नोट पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर लिखें : उस सारे धन के लिए माता राधेकृष्ण जी को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है।


5. अपने रहस्यमय नोट को अपने साथ रखें और कम से कम एक बार सुबह तथा एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, उस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथ में थामें अपने लिखे शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ होइए।


*6. आज के बाद अपना नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ यह आपको हर दिन दिखता रहे, ताकि आपको अपने जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद रहे।*


*7. आज रात सोने से ठीक पहले अपने चाहे गए भगवान के रूपो की फ़ोटो एक हाथ में थामें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद नमस्कार या नमस्ते कहें।*

नाम जप किस प्रकार होना चाहिए ।

प्रश्न . नाम किस प्रकार जप होना चाहिए ? जिससे हमे लाभ हो ? उत्तर:– सबसे पहले नाम जप जैसे भी हो लाभ होता ही है ... फिर भी आप जानने के इक्ष...