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शुक्रवार, 26 मई 2023

हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक स्तुति

हरि जी की कृतज्ञता पूर्वक गुणगान हे हरि एक तू ही इस दास का सहारा है हे हरि एक मात्र तू ही सब का दिशा है तू ही माया और माया से परे है । हे गुरुदेव मैं ने सदा तेरा तिरस्कार किया । मैं ने कभी तुझे अपने सर से नही नवाया । हे गोबिंद एक तू इस अर्जुन का सारथी है । अपने अंतः कारण में मैं ने कभी तेरी आवाज न सुनी । बाहर सदा माया के द्वारा ठगा गया । माया के वशीभूत होकर मैं ने तुझे कभी नही पढ़ा । तू माया है तू ही माया से पड़े है। हे श्रीराम हे गोबिंद तू मुझ में स्थित होकर मेरे मैले मन को निर्मल बना । तू सब को जीवन दान देता है । तू ही सब की रक्षा करता है । मैं ने तुझे कभी नही धयाया। सदा मैं झूठे संसार को अपना सहारा समझता रहा । तू ही अंतः करण में स्थित होकर जीवो को अपने माया के द्वारा नचाता है । मैं तो तेरे चरणो का ऋणी हूं । तेरा सब कुछ तुझे अर्पण कर निश्चिंत हूं । तुझे जैसे अच्छा लगता है वैसा कर । हे विष्णो हे एक तू ही मुझ हारे हुए के हरि है । तू ही इस अर्जुन के अंतः स्थित कलयुग रूपी सेना का नाश करने में समर्थ है । जीवन के जुवा में तू ही हार और जीत है । ये अर्जुन तेरा मुख देख कर जीता है तेरी दया के भीख से ही तुझे सब रूपो में व्याप्त स्मरण करने में समर्थ हुआ है । तुझे अपने अंतः करण से लेकर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित बार बार नमस्कार करता हूं। तुझे जैसा अच्छा लगे वैसा कर । मैं ने स्वयं को तुम्हे सौप दिया। मैं ने स्वयं को तुझ अनंत संसार में बहुत ढूंढा पर उसकी कोई थाह पता न लगी।। । अब ये तेरा दास हार मान तेरे दिव्य कर्मो को भांपने में असमर्थ है । इस दास के अंतः कारण में स्थित होकर भीतर जमे मैल को अपनी शक्ति से साफ कर हृदय और मन को पवित्र बना दे । जहां जाऊ तो वहां गंगाजल जैसी पवित्रता हो । जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास दोष को प्रेम की सरोवर में नहलाता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा पति हे गोपी मैया के प्रीतम हे मीरा माई के प्रभु मैं भी तेरे प्रेम में बावड़ा हो गया हूं । ये दुनिया अब कुछ भी उसकी फरवाह न रही। हे अंतर्यामी हे लक्ष्मी पति आदि नारायण हे श्याम सुंदर जहां जाऊं तेरा ही गुण गाकर तेरे नाम का बार बार रसपान करू । तू ही इस दास को प्रेम की सरोवर में नहलाता है। तू ही मुझ पतित को प्रेम रस का अमृत पान करा पवित्र करता है । हे कृष्ण हे श्याम सुंदर हे मोहन हे राधा मैया के कान्हा , हे गोपी मैया के प्रीतम नटनागर हे मीरा मैया गिरधर गोपाल हे सूरदास के हृदय कमल हे नानक के स्वामी मैं कुछ नही करता जो करता है तू ही करता है। मुझे तेरे उपर पुरा भरोसा है तू हमेशा पाप से बचाता है । ये जीव माया के वशीभूत कर अपना छोटा संसार में फसा है । वो अपने परिवार में तुझे अंतर्यामी को न देखकर भूल कर बैठता है तू तो सर्व्यपत है। मैं ने तेरी कृपा से कर्म काण्ड भी देखे । जब तक मन के मैल न जाएं । तब तक मन के भूमि में पाप रूपी विचार , विकार , भाव ,स्वभाव नहीं मिटाए जा सकते । न ही कोई निर्मल मन बीना (कृतज्ञता पूर्वक , अभिमान रहित होकर पूजा पाठ तीर्थ हवन के क्रियाओं आदी में कृतज्ञ भाव) हे दीन दयाल प्रभु मेरे अहम का नाश करो । मुझे तेरे सिवाय और कुछ नही पता । तू ही जल रूप में प्राणियों का प्यास बुझाता है तू ही भोजन रूप में प्राणियों का पालन करता है तू ही जल बरसाता है तू बिजली चमकाता है । तू ही पृथ्वि को निमित्त बना कर अन्न उत्पन करता है । मैं ने तुझे इस रूप में कभी नही याद किया । तू खरबों सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र और संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में धारण कर स्थित है । मेरी क्या औकाद तुझे अपनी छोटी बुद्धि से तेरे थाह पता का विचार करू। मैं तो सदा तेरा ऋणी रहूंगा । तू ही मुझ में प्राण अपान और समान वायु है । तू ही परब्रह्म है तू ही आदि वैष्णव आदि गुरु महादेव का स्वामि है । तू स्वयं आदि गुरु सदा शिव के रूप में स्थित हैं । तू ही विद्वानों के हृदय में विज्ञान और ज्ञान स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । हे मुरली मनोहर तू ही हजार महाकाल को अपने जीभा से चाटता है । तू सभी विकारों से रहित है तू अनंत गुणों और सभी कालाओ से संपन्न है। एक तू ही त्रिदेवो और उनकी शक्तियों के रूप में स्थित होकर जीवो को उत्पन्न ,पालन पोषण और संहार करता हैं । हे माधव तू ने जितना समर्थ दिया तेरा ये दास उतने से ही तुझे ध्याता है । मेरी ये भौतिक नेत्र तेरे तेज को संभालने में असमर्थ है । मेरी अपनी कोई दिव्य शक्ति नही है । मेरी अपनी कोई भी चमत्कारिक शक्ति नही । न तेरे द्वारा दिया हूवा कोई सिद्धि कोई चाहता है तू ने इस दास को जितना दिया है ये दास सदा इतने में ही संतुष्ट है । ये दास तेरे करुणा मय प्रेम सागर में डूब कर तेरे चरण का आश्रय लिया है । हे प्यारे मोहन तू मैं तेरा ही लाल हूं । तू सदा सब की देखभाल करने वाला है । ये दास तुझे बार बार प्रणाम करता हैं । – श्रीरामभक्त (वत्स)

शनिवार, 20 मई 2023

मेरे गोबिंद मेरे नट नागर

मेरे गोविंद मेरे नटनागर मेरा श्याम मेरे गिरधरनागर अब रहा न जाएं सुनो प्यारे हृदय की बात समझो दुलारे तेरा नित प्रेम रस लग गया मुझको अब कुछ न भाता तेरे सिवाय मुझको प्यारे न जीना न मरना आता मुझको दुलारे तेरे सिवाय कौन समझे मुझको तू घट घट बसा अन्तर्यामी सब के हृदय में बस तू ही समाई न बंधन न मुक्ति अब मिल गई चाकरी तेरी तू एक दिन आएगा आस में बैठा हूं स्वामी जैसे तूने दिया दर्शन मीरा माई को वैसे आकर दर्शन दो मेरे श्याम मुरारे जैसे तू मिला गोपी और राधा माई को जैसे तू छाती से लगाया बाल सखाई को वैसे तू हृदय से लगा अपने दास सखाइ को जैसे तूने खेला खेलाया ब्रज में बाल सखाईं को प्रभु वैसे अपना पैर दबाने दो प्रभु वैसे साथ खेलने दो प्रभु मैं न जानू लीला तुम्हारी फिर भी आवाज देता हूं प्रभू मैं न जानू खेल तुम्हारी फिर भी खेलना चाहता हूं प्रभु समझ न आता तुझे पुकारू कैसे कभी पागल रोता कभी हसता जैसे कभी गाता कभी नाचता हो जैसे कभी कुछ बोलता कुछ भी बकता जैसे अब आजा साथ ले के मईया राधा को अब आजा साथ लेकर मैया दुर्गा को अब रहा न जाई तेरे बिना मुझको अब सहा न जाए ये विरह मुझको अब दास राहुल पुकारे तुझको मैया मेरी राधे मैया तेरे सिवाय कौन मुझको स्वीकारे जग ठुकराई तू ने अपनाई हाथ पकड़ तू चलना सिखाई मैया मेरी दुर्गा माता तूने संकटों से मुझको बचाई तेरा दुलार याद आए मुझको कभी न माता भूलूं तुझको पता नही तुझ से लगी प्रीत मुझको कैसे पता नही तुझ से लगी रीत ये मुझको कैसे पता नही तुझ से इतना प्रेम हुवा मुझको कैसे पता नही अब होगा क्या बस तू ही जाने मुझको जैसे – श्रीरामभक्त रा.झा वत्स

बुधवार, 12 अप्रैल 2023

जब मैं स्तुति करता हूं।

जब मैं श्री हरि विष्णु की स्तुति करता हूं तब उन्हें ही समस्त जगत को अपने एक अंश में धारण किए हुए हैं उन्ही को कारण मानता हु। जब मैं शिव की स्तुति करता हूं तब शिव को समस्त जगत को अपने एक अंश में धारण कर स्थित किए हुए हैं उन्ही को कारण मानता हूं । जब मैं भगवती मूल प्राकृतिक माता आदिशक्ति जगदम्बा महालक्ष्मी राधिका की स्तुति करता हूं तब उन्हें ही जगत का कारण मानता हूं अर्थात ये माताएं समस्त जगत को एक अंश में धारण कर स्थित हैं । जब मैं गुरुजनों की स्तुति करता हूं तब उन्ही को ब्रम्हा विष्णु महेश समस्त देव और पर ब्रह्म उन्ही को मानता हूं बशर्ते गुरु जन शिव भक्त हरि भक्त या अध्यशक्ति भक्त होना चाहिए। (गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||) कोई भी सच्चा संत द्वारा लिखित प्रभु के किसी रूप का स्तुति देखो तो ऐसे परमतत्व की पहचान करते हुए उनकी स्तुति गाते हैं । समस्त पुराणों में भी देवता लोग ऐसे ही स्तुति करते हैं । – श्रीरामभक्त राहुल झा

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

संक्षिप्त महाभारत

॥ श्रीहरिः ॥ संक्षिप्त महाभारत महाभारतका सरल, सचित्र हिंदी - अनुवाद त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ आदिपर्व ग्रन्थका उपक्रम नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके सखा नर-रत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले महाभारत ग्रन्थका पाठ करना चाहिये । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । ॐ नमः पितामहाय । ॐ नमः प्रजापतिभ्यः । ॐ नमः श्रीकृष्णद्वैपायनाय । ॐ नमः सर्वविघ्नविनायकेभ्यः । लोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवा सूतवंशके श्रेष्ठ पौराणिक थे। एक बार जब नैमिषारण्य क्षेत्रमें कुलपति शौनक बारह वर्षका सत्संग-सत्र कर रहे थे, तब उग्रश्रवा बड़ी विनयके साथ सुखसे बैठे हुए व्रतनिष्ठ ब्रह्मर्षियोंके पास आये। जब नैमिषारण्यवासी तपस्वी ऋषियोंने देखा कि उग्रश्रवा हमारे आश्रममें आ गये हैं, तब उनसे चित्र-विचित्र कथा सुननेके लिये उन लोगोंने उन्हें घेर लिया। उग्रश्रवाने हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया और सत्कार पाकर उनकी तपस्याके सम्बन्धमें कुशल- प्रश्न किये। सब ऋषि-मुनि अपने-अपने आसनपर विराजमान हो गये और उनके आज्ञानुसार वे भी अपने आसनपर बैठ गये। जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर चुके, तब किसी ऋषिने कथाका प्रसंग प्रस्तुत करनेके लिये उनसे यह प्रश्न किया- ' सूतनन्दन! आप कहाँसे आ रहे हैं? आपने अबतकका समय कहाँ व्यतीत किया है ?" उग्रश्रवाने कहा, ‘मैं परीक्षित्-नन्दन राजर्षि जनमेजयके सर्प-सत्रमें गया हुआ था। वहाँ श्रीवैशम्पायनजीके मुखसे मैंने भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनके द्वारा निर्मित महाभारत ग्रन्थकी अनेकों पवित्र और विचित्र कथाएँ सुनीं। इसके बाद बहुत-से तीर्थों और आश्रमोंमें घूमकर समन्तपंचक क्षेत्रमें आया, जहाँ पहले कौरव और पाण्डवोंका महान् युद्ध हो चुका है। वहाँसे मैं आपलोगोंका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ । आप सभी चिरायु और ब्रह्मनिष्ठ हैं। आपका ब्रह्मतेज सूर्य और अग्निके समान है। आपलोग स्नान, जप, हवन आदिसे निवृत्त होकर पवित्रता और एकाग्रताके साथ अपने-अपने आसनपर बैठे हुए हैं। अब कृपा करके बतलाइये कि मैं आपलोगोंको कौन-सी कथा सुनाऊँ ।' ऋषियोंने कहा— सूतनन्दन ! परमर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायनने जिस ग्रन्थका निर्माण किया है और ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने जिसका सत्कार किया है, जिसमें विचित्र पदोंसे परिपूर्ण पर्व हैं, जो सूक्ष्म अर्थ और न्यायसे भरा हुआ है, जो पद-पदपर वेदार्थसे विभूषित और आख्यानोंमें श्रेष्ठ है, जिसमें भरतवंशका सम्पूर्ण इतिहास है, जो सर्वथा शास्त्रसम्मत है और जिसे श्रीकृष्णद्वैपायनकी आज्ञासे वैशम्पायनजीने राजा जनमेजयको सुनाया है, भगवान् व्यासकी वही पुण्यमयी पापनाशिनी और वेदमयी संहिता हमलोग सुनना चाहते हैं । उग्रश्रवाजीने कहा – भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके आदि हैं। वे अन्तर्यामी, सर्वेश्वर, समस्त यज्ञोंके भोक्ता, सबके द्वारा प्रशंसित, परम सत्य ॐकारस्वरूप ब्रह्म हैं। वे ही सनातन व्यक्त एवं अव्यक्तस्वरूप हैं। वे असत् भी हैं और सत् भी हैं, वे सत्-असत् दोनों हैं और दोनोंसे परे हैं। वे ही विराट् विश्व भी हैं। उन्होंने ही स्थूल और सूक्ष्म दोनोंकी सृष्टि की है। वे ही सबके जीवनदाता, सर्वश्रेष्ठ और अविनाशी हैं। वे ही मंगलकारी, मंगलस्वरूप, सर्वव्यापक, सबके वांछनीय, निष्पाप और परम पवित्र हैं। उन्हीं चराचरगुरु नयनमनोहारी हृषीकेशको नमस्कार करके सर्वलोकपूजित अद्भुतकर्मा भगवान् व्यासकी पवित्र रचना महाभारतका वर्णन करता हूँ । पृथ्वीमें अनेकों प्रतिभाशाली विद्वानोंने इस इतिहासका पहले वर्णन किया है, अब करते हैं और आगे भी करेंगे। यह परमज्ञानस्वरूप ग्रन्थ तीनों लोकोंमें प्रतिष्ठित है। कोई संक्षेपसे, तो कोई विस्तारसे इसे धारण करते हैं । इसकी शब्दावली शुभ है। इसमें अनेकों छन्द हैं और देवता तथा मनुष्योंकी मर्यादाका इसमें स्पष्ट वर्णन है। जिस समय यह जगत् ज्ञान और प्रकाशसे शून्य तथा अन्धकारसे परिपूर्ण था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्डा उत्पन्न हुआ और वही समस्त प्रजाकी उत्पत्तिका कारण बना। वह बड़ा ही दिव्य और ज्योतिर्मय था। श्रुति उसमें सत्य, सनातन, ज्योतिर्मय ब्रह्मका वर्णन करती है। वह ब्रह्म अलौकिक, अचिन्त्य, सर्वत्र सम, अव्यक्त, कारणस्वरूप तथा सत् और असत् दोनों हैं। उसी अण्डे से लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी प्रकट हुए । तदनन्तर दस प्रचेता, दक्ष, उनके सात पुत्र, सात ऋषि और चौदह मनु उत्पन्न हुए। विश्वेदेवा, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, यक्ष, साध्य, पिशाच, गुह्यक, पितर, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, जल, द्युलोक, पृथ्वी, वायु, आकाश, दिशाएँ, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात तथा जगत्में और जितनी भी वस्तुएँ हैं, सब उसी अण्डेसे उत्पन्न हुईं। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रलयके समय जिससे उत्पन्न होता है, उसी परमात्मामें लीन हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे ऋतु आनेपर उसके अनेकों लक्षण प्रकट हो जाते और बदलनेपर लुप्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह कालचक्र, जिससे सभी पदार्थोंकी सृष्टि और संहार होता है, अनादि और अनन्त रूपसे सर्वदा चलता रहता है। संक्षेपमें देवताओंकी संख्या तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस (छत्तीस हजार तीन सौ तैंतीस ) है । विवस्वान्के बारह पुत्र हैं - दिवः पुत्र, बृहद्भानु, चक्षु, आत्मा, विभावसु, सविता, ऋचीक, अर्क, भानु, आशावह, रवि और मनु । मनुके दो पुत्र हुए- देवभ्राट् और सुभ्राट् । सुभ्राट्के तीन पुत्र हुए - दशज्योति, शतज्योति और सहस्रज्योति। ये तीनों ही प्रजावान् और विद्वान् थे। दशज्योतिके सारे भगवान् व्यास समस्त लोक, भूत-भविष्यत् - वर्तमानके रहस्य, कर्म- उपासना-ज्ञानरूप वेद, अभ्यासयुक्त योग, धर्म, अर्थ और काम, शास्त्र तथा लोक-व्यवहारको पूर्णरूपसे जानते हैं। उन्होंने इस ग्रन्थमें व्याख्याके साथ सम्पूर्ण इतिहास और सारी श्रुतियोंका तात्पर्य कह दिया है। भगवान् व्यासने इस महान् ज्ञानका कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे वर्णन किया है, क्योंकि विद्वान् लोग ज्ञानको भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकाशित करते हैं। उन्होंने तपस्या और ब्रह्मचर्यकी शक्तिसे वेदोंका विभाजन करके इस ग्रन्थका निर्माण किया और सोचा कि इसे शिष्योंको किस प्रकार पढ़ाऊँ ? भगवान् व्यासका यह विचार जानकर स्वयं ब्रह्माजी उनकी प्रसन्नता और लोकहितके लिये उनके पास आये। भगवान् वेदव्यास उन्हें देखकर बहुत ही विस्मित हुए और मुनियोंके साथ उठकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा आसनपर बैठाया। स्वागत-सत्कारके बाद ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे भी उनके पास ही बैठ गये। तब व्यासजीने बड़ी प्रसन्नतासे मुसकराते हुए कहा, 'भगवन्! मैंने एक श्रेष्ठ काव्यकी रचना की है। इसमें वैदिक और लौकिक सभी विषय हैं। इसमें वेदांगसहित उपनिषद्, वेदोंका क्रिया- विस्तार, इतिहास, पुराण, भूत, भविष्यत् और वर्तमानके वृत्तान्त, बुढ़ापा, मृत्यु, भय, व्याधि आदिके भाव - अभावका निर्णय, आश्रम और वर्णोंका धर्म, पुराणोंका सार, तपस्या, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा और युगोंका वर्णन, उनका परिमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वण, अध्यात्म, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपतधर्म, देवता और मनुष्योंकी उत्पत्ति, पवित्र तीर्थ, पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन, समुद्र, पूर्व कल्प, दिव्य नगर, युद्धकौशल, विविध दस हजार, शतज्योतिके एक लाख और सहस्रज्योतिके दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए। इन्हींसे कुरु, यदु, भरत, ययाति और इक्ष्वाकु आदि राजर्षियोंके वंश चले। बहुत से वंशों और प्राणियोंकी सृष्टिकी यही परम्परा है। ...................शेष भाग कल । सम्पादक तथा संशोधक श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका गीताप्रेष ,गोरखपुर

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

धन के लिए कृतज्ञता – अभ्यास 7

 






यदि आपके जीवन में धन की कमी है, तो यह बात अच्छी तरह गाँठ बाँध लें कि धन को लेकर चिंतित, ईर्ष्यालु, निराश, हताश, शंकालु या भयभीत होने से आपके पास कभी अधिक धन नहीं आएगा, क्योंकि ये भावनाएँ इस बात से उत्पन्न होती हैं कि आप अपने पास मौजूद धन के लिए कृतज्ञ नहीं हैं। धन को लेकर शिकवा-शिकायत करना, विवाद करना, कुंठित होना, किसी चीज़ की कीमत के बारे में आलोचना करना या पैसे के बारे में किसी दूसरे को बुरा महसूस कराना कृतज्ञता के काम नहीं हैं। इससे आपका आर्थिक जीवन कभी बेहतर नहीं होगा, बल्कि बदतर होता जाएगा।


चाहे आपकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, यह सोचना कि आपके पास पर्याप्त धन नहीं है, अपने पास मौजूद धन के बारे में कृतघ्न होना है। अपने जीवन में धन को चमत्कारिक ढंग से बढ़ाने के लिए आपको अपनी वर्तमान स्थिति को दिमाग से बाहर निकालना होगा और जो भी पैसा आपके पास है, उसके प्रति कृतज्ञता महसूस करनी होगी।


"जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) नहीं है, उसके पास जो है, वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"


जब आपके पास बहुत कम पैसा हो, तो उसे लेकर कृतज्ञता महसूस करना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि आपको यह बात पता हो कि जब तक आप कृतज्ञ नहीं होंगे, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा, तो आप यह काम करने के लिए प्रेरित हो जाएँगे।


धन का विषय कई लोगों के लिए पेचीदा हो सकता है, खास तौर पर तब, जब उनके पास यह पर्याप्त न हो, इसलिए रहस्यमय धन के अभ्यास के दो क़दम हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप दिन के शुरू में ही चमत्कारिक धन का पूरा अभ्यास पढ़ लें, क्योंकि तब आप धन के अभ्यास को दिन भर जारी रख पाएँगे।


बैठकर कुछ मिनट अपने बचपन के बारे में सोचें, जब आपके पास पैसा या तो था ही नहीं 

फिर बहुत कम था। जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जब आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और पूरे ह्रदय से महसूस करें। क्या आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन था ?


क्या आप किसी मकान में रहते थे?


क्या आपको कई सालों तक शिक्षा मिली थी?


आप हर दिन स्कूल कैसे जाते थे? क्या आपके पास स्कूल की पुस्तकें, लंच और अन्य सभी आवश्यक चीजें थीं? बचपन में क्या आप कभी छुट्टियाँ मनाने किसी हिल स्टेशन या समुद्र तट पर गए थे?


बचपन में आपको जन्मदिन के सबसे रोमांचक उपहार कौन से मिले थे? क्या आपके पास साइकल, खिलौने या पालतू जानवर थे?


क्या आपके पास कपड़े थे, जब आपका क़द तेज़ी से बढ़ जाता था और कपड़े छोटे हो जाते थे?


क्या आप कोई फ़िल्म या मैच देखने गए थे, कोई वाद्ययंत्र सीखने गए थे या आपने अपने किसी शौक को पूरा किया था?


क्या आप स्वास्थ्य ठीक न होने पर कभी डॉक्टर के पास गए थे और दवाएँ ली थीं?


क्या आप दंतचिकित्सक के पास गए थे?


क्या आपके पास अनिवार्य सामान थे, जिनका इस्तेमाल आप हर दिन करते थे, जैसे आपका टूथब्रश, टूथपेस्ट, साबुन और शैम्पू ? क्या आप कार में यात्रा करते थे? क्या आप टेलीविज़न देखते थे, फ़ोन करते थे, बिजली और पानी का इस्तेमाल करते थे?


इन सारी चीज़ों के लिए धन की ज़रूरत थी और आपको ये सब मुफ़्त मिली थीं। बचपन और किशोरावस्था के दिनों को याद करने पर आपको अहसास होगा कि आपको कितनी सारी चीजें मिली थीं, जो मेहनत से कमाए गए पैसे से खरीदी गई थीं। हर उदाहरण और याद के लिए कृतज्ञ हों, क्योंकि जब आप अतीत में मिले धन के लिए सच्ची कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो भविष्य में आपका धन रहस्यमय तरीके से बढ़ेगा! कृतज्ञता का नियम इसकी गारंटी देता है।


चमत्कारिक धन के अभ्यास को जारी रखने के लिए एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और उस पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर यह लिखें :


उस सारे धन के लिए भगवान कृष्ण(विष्णु जी) और माता राधा जी(माता लक्ष्मी जी) को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है। जिसके कारण मेरे कई सारे काम आसान हो गए।


इसे वाक्य को कम से कम तीन बार लिखें और गहराई से माता लक्ष्मी (माता राधा जी) और भगवान विष्णु जी (भगवान कृष्ण)के प्रति कृतज्ञता (एहसानमंद) महसूस करे।


आज ही इस रहस्यमय नोट को अपने पर्स या जेब में रख लें। कम से कम एक बार सुबह और एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, इस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथों में थामें अपने लिखे हुए शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ हों। आप जितने ज्यादा ईमानदार होते हैं और इसे जितना अधिक महसूस करते हैं, आपको अपनी आर्थिक परिस्थितियों में उतना ही तीव्र चमत्कारिक परिवर्तन नज़र आएगा।


आप समय से पहले कभी नहीं जान पाएँगे कि आपका धन कैसे बढ़ेगा, लेकिन संभावना इस बात की है कि आप इस दौरान अधिक धन पाने के लिए कई परिस्थितियों में भारी बदलाव देखेंगे। आप वह धन पा सकते हैं, जिसके बारे में आपको अहसास ही नहीं था कि वह आपका था। आपको अप्रत्याशित नकद राशि या चेक मिल सकते हैं। आपको कोई चीज़ डिस्काउंट, रिबेट या कम लागत में मिल सकती है आपको सभी प्रकार की भौतिक चीजें उपहार में मिल सकती हैं, जिन्हें खरीदने में आपका पैसा खर्च होता।


आज के बाद अपना रहस्यमय नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ उस पर हर दिन आपकी नज़र पड़े, ताकि आपको जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद आती रहे। यह कभी न भूलें कि आप जितनी अधिक बार इस रहस्यमय नोट की ओर देखते हैं और मिलने वाले धन के लिए कृतज्ञता महसूस करते हैं, आप अपने आर्थिक जीवन में उतने ही अधिक चमत्कार को सक्रिय कर देते हैं। धन के लिए कृतज्ञता की प्रचुरता का अर्थ है धन की प्रचुरता !


यदि आप खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं, जहाँ आप धन संबंधी किसी चीज़ के बारे में शिकायत करने वाले हैं, चाहे यह शब्दों में हो या विचारों में, तो स्वयं से पूछें “क्या मैं इस शिकायत की कीमत चुकाना चाहता हूँ?" यह सवाल आपको इसलिए पूछना चाहिए, क्योंकि आपकी एक शिकायत भी धन के प्रवाह को धीमा कर देगी या आपके पास आने से रोक देगी।


आज ही खुद से वादा करें कि जब भी आपको कहीं से पैसा मिलेगा, चाहे यह नौकरी की तनख्वाह हो, टैक्स रिफंड या डिस्काउंट हो या किसी से उपहार में मिली चीज़ हो, जिसे खरीदने में पैसा खर्च होता, तो आप उसके लिए वाक़ई कृतज्ञ होंगे। इनमें से हर परिस्थिति का अर्थ है कि आपको धन मिला है और ऐसा हर प्रसंग आपको यह अवसर देता है कि आप हाल में मिले धन के लिए कृतज्ञ बनकर अपने धन को बढ़ाने और कई गुना करने की कृतज्ञता की रहस्यमय शक्ति का इस्तेमाल करें!


1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ और एक से तीन तक के क़दम दोहराएँ लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।


 2. बैठकर कुछ मिनट तक अपने बचपन के बारे में सोचें कि आपको कितनी सारी चीजें बिना पैसे चुकाए ही मिल गई थीं।


3. जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जहाँ आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो तहेदिल से शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और महसूस करें।


4. एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और नोट पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर लिखें : उस सारे धन के लिए माता राधेकृष्ण जी को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है।


5. अपने रहस्यमय नोट को अपने साथ रखें और कम से कम एक बार सुबह तथा एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, उस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथ में थामें अपने लिखे शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ होइए।


*6. आज के बाद अपना नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ यह आपको हर दिन दिखता रहे, ताकि आपको अपने जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद रहे।*


*7. आज रात सोने से ठीक पहले अपने चाहे गए भगवान के रूपो की फ़ोटो एक हाथ में थामें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद नमस्कार या नमस्ते कहें।*

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

पुत्र राहुल को बुद्ध क्यों मानते थे अपने रास्ते का कांटा ?

पुत्र राहुल को बुद्ध क्यों मानते थे अपने रास्ते का कांटा?

महत्मा बुद्ध का जन्म 500 ईशा पूर्व हिंदू माता पिता के यहां हुआ था। महत्मा को ज्ञान प्राप्ति वट वृक्ष के नीचे श्री हरि विष्णु मंदिर के समीप हुआ था उनके माता पिता एक वैष्णव थे अर्थात ईश्वरों के ईश्वर श्री हरि विष्णु के पूजक थे। मध्यकालीन समय में सम्राट अशोक और उनके पुत्र राहुल द्वारा सत्य ज्ञान का प्रचार किया। जो हिंदू धर्म का अपमान कर रहा है वो बौद्ध नही है। सन्यासी जैसा भेस बनाकर कम्युनिस्ट हमलावार देश में अशांति फैलाना चाहते हैं ।  
आज भी जापान से लेकर मंगोलिया , चीन अफगानिस्तान कश्मीर श्रीलंका , भारत आदि देशों में मध्यकालीन सभ्यता की छाप ।

यूं तो आपने त्याग और बलिदान के किस्से-कहानियां बहुत सुने होंगे, लेकिन उन सभी में बुद्ध के बेटे की कहानी कहीं आगे है.

जी हां! राहुल की कहानी!

ये कहानी तब की है, जब बुद्ध सिद्धार्थ हुआ करते थे. उस समय उनके पुत्र ने अपने पिता के मार्ग पर चलने के लिए धन संपत्ति और सभी तरह की मोह माया का परित्याग कर दिया था.

दिलचस्प बात तो यह है कि जिस पुत्र राहुल का चेहरा देखने से पहले ही बुद्ध ने उसे अपने रास्ते का कांटा समझ लिया था, वह आगे चलकर उन्हीं के रास्ते पर चला.

तो चलिए जानते हैं कि आखिर बुद्ध अपने पुत्र राहुल को क्यों रास्ते का कांटा समझते थे –

*जन्म के साथ ही पिता ने छोड़ दिया*

जब सिद्धार्थ गौतम 16 साल के थे, तभी उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा से करा दिया था. हालांकि सिद्धार्थ एक संन्यासी जीवन का पालन करना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक जीवन में बंधने के कारण वह ऐसा नहीं कर पाए.

विवाह के कुछ समय के पश्चात उन्हें पुत्री हुई और उसके कुछ साल बाद 534 ईसा पूर्व में उन्हें एक पुत्र रत्न हुआ. पुत्र होने की खुशी दाई मां ने सिद्धार्थ के सामने जाहिर की, तो उन्होंने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा-ओह!

असल में पुत्र राहुल के जन्म से पहले सिद्धार्थ किसी खास मार्ग पर निकलने वाले थे. ऐसे में राहुल का जन्म उनके लिए अवरोध बन सकता था. माना जाता है कि यदि सिद्धार्थ गौतम अपने पुत्र का चेहरा देख लेते, तो वह मोह माया के बंधन में जकड़ जाते और फिर आगे नहीं बढ़ पाते. लिहाजा, वह राहुल के जन्म की अगली रात ही घर से निकल गए.

कहते हैं कि बुद्ध सत्य की खोज में इतने लालायित थे कि उन्होंने पिता धर्म का पालन करना तक उचित नहीं समझा.

*9 साल बाद पिता और पुत्र हुए आमने-सामने*

9 साल बाद सिद्धार्थ गौतम ज्ञान प्राप्त कर अपने परिवार से मिलने राजमहल पहुंचे. उनके आने की खबर जैसे ही यशोधरा को मिली, वह खुश होने की जगह क्रोध से भर उठीं. 

उन्होंने बुद्ध को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि आपको हमारी बिल्कुल भी फिक्र नहीं. आप हमें उस समय छोड़कर कैसे जा सकते हैं, जिस समय हमें आपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. 

बुद्ध कुछ कह पाते, इससे पहले ही यशोधरा ने 9 साल के राहुल को हाथ खींचकर उनके सामने खड़ा कर दिया. साथ ही बुद्ध पर कटाक्ष करते हुए बोलीं, राहुल यही तुम्हारे पिता हैं! 

बुद्ध के पास यशोधरा के इन प्रश्नों के जवाब नहीं थे.

दूसरी तरफ राहुल की नन्हीं आंखें बुद्ध की खामोशी में कुछ ढूढ़ रही थीं. बुद्ध ज्यादा देर तक यह देख नहीं सके और बोले, मैं तो एक संन्यासी हूं. मैं तुम्हें क्या दे सकता हूं. राहुल अभी भी खामोश था...

यह देखकर बुद्ध ने अपने शिष्य आंनद से अपना भिक्षापात्र मंगवाते हुए राहुल से कहा, पुत्र मेरे पास इसके अलावा तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, जो मैं तुम्हें दे सकूं. इस पर राहुल ने उन्हें नमन करते हुए कहा, आप मेरे पिता हैं. आप जो देना चाहें, वह मेरे लिए संपत्ति है.

आगे बुद्ध ने राहुल को त्याग और बलिदान का ज्ञान देते हुए सन्यास का वरदान दिया और वापस चले गए.

*बुद्ध जैसा चमत्कारी दृष्टिकोण नहीं था, फिर भी...*

यूं तो 9 साल की उम्र में ही राहुल ने अपने पिता से दान में सन्यासी जीवन का वरदान ले लिया था. साथ ही पिता बुद्ध के दिखाए गए मार्ग पर चलना शुरू कर दिया था. उन तमाम सुख-सुविधाओं से वंचित हो गया, जो एक साधारण बालक को मिला करती थीं.


कुछ वर्ष बीतने के बाद जब राहुल 20 साल का हुआ, तो उसने निश्चय किया कि वह अपने पिता से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर सदैव के लिए बौद्ध भिक्षु बन जाएगा. जबकि, राहुल का व्यक्तित्व बुद्ध के बिल्कुल उलट था.

वह बेहद ही चंचल और राजनीति कौशल से परिपूर्ण था. उसके अंदर अपने पिता जैसा दृढ़ निश्चय और चमत्कारी दृष्टिकोण व्यक्तित्व नहीं था.

बावजूद इसके बौद्ध भिक्षु बनने के लिए वह बुद्ध के पास पहुंच ही गया. वहां उसने बुद्ध से मुक्ति मार्ग और इन्द्रियों पर नियंत्रण का प्रशिक्षण देने का आग्रह किया.

बुद्ध ने राहुल के आग्रह को स्वीकार कर लिया और उसे प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया.

*बुद्ध का शिष्य बनकर प्राप्त किया मोक्ष ज्ञान*

मुक्ति का मार्ग तलाशने निकला राहुल अब भगवान बुद्ध का शिष्य बन चुका था.

मज्झिम निकाय एक बौद्ध धर्म ग्रंथ है. इस निकाय में बुद्ध द्वारा राहुल को आध्यात्मिक दीक्षा का ज़िक्र किया गया है. इसके मुताबिक, जब राहुल की दीक्षा शुरू हुई, तब महात्मा बुद्ध राहुल को एक पेड़ के नीचे ले गए. वह पेड़ उसी बट वृक्ष के समान था, जहां बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.

आगे पिता के निर्देश पर राहुल अपनी दोनों आंखों को मूंदकर ज्ञान की प्राप्त करने लगा... अब वह ध्यान में मग्न हो गया था. बुद्ध ने पूछा, राहुल, आंखों में चेतना स्थायी है या अस्थायी? राहुल ने जवाब दिया अस्थायी. बुद्ध ने फिर पूछा, राहुल, इंद्रियां और चेतना स्थाई है या अस्थाई.

राहुल ने पहले की तरह जवाब दिया, अस्थायी! तीसरा सवाल पूछते हुए बुद्ध ने राहुल से पूछा, जो अस्थाई है, उसमें पीड़ा है या आनंद.

*राहुल ने जवाब दिया, पीड़ा, प्रभु!*

इसी प्रकार से बुद्ध ने एक और प्रश्न पूछा, क्या ऐसी अस्थाई पीड़ादायक वस्तु के बारे में यह सोचना सही है कि यह मेरा है, यह मैं हूं, यह मेरा 'स्व' है? जबकि वह चीज परिवर्तनशील है.

राहुल ने उत्तर दिया, नहीं प्रभु! ऐसी वस्तु हमारी नहीं हो सकती.

आगे महात्मा बुद्ध ने राहुल को सत्य के ज्ञान से परिचित कराया. ज्ञान प्राप्ति के बाद वह अपने आपको बेहद हल्का महसूस कर रहा था. उसकी जागृति चेतना बढ़ चुकी थी. अब वह सांसारिक मोह माया के बंधनों से मुक्त था.

पिता द्वारा दिए गए ज्ञान से वह अनंत प्रकार की लालसाओं से मुक्त था. उसके मन से चिंता और कष्टों के बादल छट चुके थे!

आगे वह बौद्ध भिक्षु बनकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने में जुट गया.

*और राहुल ने त्याग दिए प्राण*

पूर्ण रूप से बौद्ध भिक्षु बनने के बाद राहुल की मुलाकात उसके कुछ पुराने दोस्तों से हुई. राहुल को भिक्षु के रूप में देखकर उसके दोस्तों ने कहा, तुम दो बड़े कारणों से बहुत सौभाग्यशाली हो.

पहला यह कि तुम बुद्ध के पुत्र हो और दूसरा, इसलिए क्योंकि तुम्हें बुद्ध से शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला.


हालांकि बताया यह भी जाता है कि राहुल के त्याग ने अपनी माता का जीवन पूरी तरह से बदल कर रखा दिया था. यशोधरा, राहुल से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई थीं.

इधर, राहुल बौध धर्म के प्रचार-प्रसार में लगा रहा. एक दिन जब बुद्ध जंगल के मार्ग में थक कर विश्राम कर रहे थे, तभी किसी ने बुद्ध को सूचना दी कि आपका पुत्र अब नहीं रहा.

हर प्रकार से बंधनों से मुक्त राहुल अब शारीरिक बंधन से भी मुक्त हो चुके थे.

बताया जाता है कि बाद में महान सम्राट अशोक ने राहुल के सम्मान में एक स्तूप बनाया था.

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

संबंध के लिए कृतज्ञता


*संबंध के लिए कृतज्ञता अभ्यास 6*




कल्पना करें कि आप इस पृथ्वी पर रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। ऐसे में आपके मन में कोई चीज़ करने की कोई इच्छा ही नहीं होगी। कोई पेंटिंग बनाने में क्या तुक है, अगर उसे कोई भी न देख सके ? किसी भी तरह के संगीत का सृजन करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसे न सुन सके? किसी भी चीज़ का आविष्कार करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसका इस्तेमाल न कर सके? एक जगह से दूसरी जगह तक जाने का कोई कारण नहीं होगा, क्योंकि आप जिस भी नई जगह जाएँगे, वह पुरानी जगह जैसी ही होगी यानी वहाँ कोई नहीं होगा। आपके जीवन में कोई खुशी या आनंद नहीं होगा।


दूसरे लोगों के साथ संपर्क और अनुभवों से आपको जीवन में ख़ुशी, अर्थ व उद्देश्य मिलता है।


इसी वजह से आपके संबंध आपके जीवन पर किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा असर डालते हैं। अपने सपनों के जीवन को साकार करने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि आपके संबंध इस वक़्त आपके जीवन पर कैसा असर डाल रहे हैं और वे कैसे कृतज्ञता के सबसे शक्तिशाली साधन बन सकते हैं तथा आपके जीवन को जादुई ढंग से बदल सकते हैं। विज्ञान अब अतीत के महान मनीषियों के ज्ञान की पुष्टि कर रहा है। शोध अध्ययन दर्शा रहे हैं कि जो लोग कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं, वे दूसरों के अधिक निकट होते हैं, परिवार तथा मित्रों से अधिक जुड़े होते हैं और दूसरे लोगों के मन में उनकी बेहतर छवि होती है। लेकिन शोध अध्ययनों में सामने आने वाला संभवतः सबसे आश्चर्यजनक आँकड़ा यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में प्रत्येक शिकायत, चाहे वह वैचारिक हो या शाब्दिक के साथ-साथ उसके बारे में दस नियामतें भी महसूस होनी चाहिए, तभी संबंध समृद्ध हो सकता हैं। हर शिकायत के बदले अगर नियामतों की संख्या दस से कम है, तो संबंध का ह्रास होने लगेगा और यदि यह वैवाहिक संबंध है, तो तलाक की नौबत भी आ सकती है।


कृतज्ञता से संबंध समृद्ध होते हैं। जब आप किसी संबंध के लिए अपनी कृतज्ञता बढ़ाते हैं, तो चाटाकारिक ढंग से आप उसमें ख़ुशी और अच्छी चीजों की प्रचुरता पाएँगे। ध्यान रहे, संबंधों के प्रति कृतज्ञता केवल आपके संबंधों को ही नहीं बदलती है; यह आपको भी बदल देती है। आपका स्वभाव इस वक़्त चाहे जैसा हो, कृतज्ञता आपको अधिक धैर्य, समझ, करुणा और दयालुता प्रदान करेगी और एक वक़्त ऐसा आएगा, जब आप खुद को पहचान भी नहीं पाएँगे। छोटी छोटी बातों पर जो चिढ़ आपने कभी महसूस की थी, वह ग़ायब हो जाएगी। संबंधों को लेकर आपके मन में जो शिकायतें थीं, वे ओझल हो जाएँगी। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि जब आप किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सचमुच कृतज्ञ होते हैं, तो आपके मन में उसकी किसी चीज़ में बदलाव करने की इच्छा नहीं होती। आप उसकी आलोचना नहीं करेंगे, उसके बारे में शिकायत नहीं करेंगे और उसे दोष नहीं देंगे, क्योंकि आप तो उसके अच्छे गुणों के बारे में कृतज्ञता महसूस करने में व्यस्त होंगे। दरअसल, आप उन चीज़ों को देख ही नहीं पाएँगे, जिनके बारे में आप

अक्सर शिकायत किया करते थे।


"हमें केवल उन्हीं पलों में जीवित कहा जा सकता है, जब हमारा हृदय हमारे खजानों के बारे में चेतन होता है।"


थॉर्नटन वाइल्डर (1897-1975) लेखक और नाटककार


शब्द बहुत शक्तिशाली होते हैं, इसलिए जब भी आप किसी व्यक्ति के बारे में शिकायत करते हैं, तो आप दरअसल अपने ही जीवन को नुक़सान पहुँचा रहे होते हैं। यह आपका ही जीवन है, जिसमें परेशानी आएगी। वैज्ञानिक के नियम के अनुसार आप किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में जो भी सोचते या कहते हैं, उसे अपने स्वयं के जीवन में ले आते हैं। यही वजह है कि संसार के महानतम लोगों और शिक्षकों ने हमें कृतज्ञ होने की सलाह दी है। वे जानते थे कि आपको अधिकतम तभी मिल सकता है, आपके जीवन में अच्छी प्रगति तभी हो सकती है, जब आप दूसरों के लिए उतने ही कृतज्ञ हों, जितने कि वे स्वयं हैं। यदि आपका हर क़रीबी व्यक्ति आपसे कहे, "मैं आपसे प्रेम करता हूँ आपके वर्तमान स्वरूप से, जैसे भी आप हैं उससे," तब आप कैसा महसूस करेंगे?


किसी की शिकयत करने से उसके अवगुण हमारे भीतर आ जाते है इसलिए हमें भगवान के गुणों की चर्चा ही सुनने चहिए सोचना चहिए या वर्णन करना चाहीए।


– श्रीमद्भागवत महापुराण 


आज का शक्तिशाली अभ्यास लोगों के वर्तमान स्वरूप के लिए कृतज्ञ होना है! फ़िलहाल भले ही आपके सभी संबंध अच्छे हों, लेकिन इस अभ्यास के बाद वे कहीं अधिक मधुर हो जाएँगे और जब आप कृतज्ञ होने के लिए हर व्यक्ति में अच्छी चीजें खोजते हैं, तो उसके बाद आप कृतज्ञता को अचूक सफल होते देखेंगे तब आपके संबंध इतने अधिक मजबूत, इतने अधिक संतुष्टिदायक और इतने अधिक समृद्ध हो जाएँगे, जितना आपने कभी सोचा भी नहीं था। कृतज्ञ होने के लिए अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें। आप अपनी पत्नी, बेटे और पिता को चुन सकते हैं या फिर अपने कारोबारी साझेदार और बहन को चुन सकते हैं। आप अपने सबसे अच्छे मित्र, दादी और चाचा को चुन सकते हैं। आप कोई भी तीन संबंध चुन सकते हैं, जिन्हें आप महत्वपूर्ण मानते हैं। बस ज़रूरी यह है कि आपके पास हर संबंधित व्यक्ति की तस्वीर हो वह तस्वीर अकेले उस व्यक्ति की भी हो सकती है या उसमें आप भी उस व्यक्ति के साथ मौजूद हो सकते हैं।


एक बार जब आप अपने तीन संबंध और तस्वीर चुन लेते हैं, तो आप जादू को गति देने के लिए तैयार हो जाते हैं। सुकून से बैठकर उन चीज़ों के बारे में सोचें, जिनके लिए आप हर व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं। उस व्यक्ति में ऐसी कौन सी खूबियाँ हैं, जिनसे आप सर्वाधिक प्रेम करते हैं? उसके सर्वश्रेष्ठ गुण कौन से हैं? आप उसके धैर्य, सुनने की योग्यता, काबिलियत, शक्ति, विवेक, बुद्धिमानी, हँसी, हास्यबोध, आँखों, मुस्कान या दयालु हृदय के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं। आप उन चीज़ों के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं, जिन्हें उस व्यक्ति के साथ करने में आपको सबसे अधिक आनंद आता है या आप वह समय याद कर सकते हैं, जब उस व्यक्ति ने आपका साथ दिया, आपकी परवाह की या आपको सहारा दिया। उस  व्यक्ति के बारे में किन चीज़ों के लिए आप कृतज्ञ हैं, इस बारे में कुछ देर सोचें। इसके बाद उसकी तस्वीर अपने सामने रखें और पेन-नोटबुक लेकर या कंप्यूटर के सामने बैठकर उसकी पाँच खूबियाँ चुनें, जिनके लिए आप सर्वाधिक कृतज्ञ हैं। जब आप पाँच खूबियों की सूची बनाएँ, तो उस व्यक्ति की तस्वीर की ओर देखें। हर वाक्य को जादुई शब्दों धन्यवाद से शुरू करते हुए उसका नाम लिखें। साथ ही यह भी लिखें कि आप किस चीज़ के लिए कृतज्ञ हैं। धन्यवाद, उसका नाम क्योंकि क्या ?


मिसाल के तौर पर, "धन्यवाद, गोविन्द, क्योंकि आप मुझे हमेशा हँसाते हो।" या, "धन्यवाद, मेरी मां, क्योंकि आपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने में मेरी मदद की।"


जब आप तीनों लोगों की सूचियाँ बना लें, तो इस जादुई अभ्यास को जारी रखते हुए उनकी तस्वीरें किसी ऐसी जगह रख दें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकें। आज जब भी आप उनकी तस्वीरें देखें, उस व्यक्ति को धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और फिर उस व्यक्ति का नाम लें:

धन्यवाद, माधव ।


यदि आप ज्यादा समय घर से बाहर रहते हैं, तो उन तस्वीरों को अपने बैग या जेब में साथ ले जाएँ और दिन में तीन बार इसी तरीके का इस्तेमाल करते हुए उन्हें देखने की कोशिश करें।


अब आप जान चुके हैं कि अपने संबंधों को अच्छे और मजबूत बनाने के लिए आपको कृतज्ञता की शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करना है। यदि आप अपने हर संबंध को शानदार बनाना चाहें, तो इस अद्भुत अभ्यास का प्रयोग प्रत्येक दिन कर सकते हैं। आप इसका प्रयोग एक ही संबंध पर जितनी बार चाहें, कर सकते हैं। आप अपने संबंधों में अच्छी चीज़ों के लिए जितने अधिक कृतज्ञ होंगे, आपके जीवन का हर संबंध उतनी ही चमत्कारिक और तीव्र गति से बदल जाएगा।



1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ। लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची को दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद और उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।


2. अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें और हर व्यक्ति की एक तस्वीर भी चुन लें। 3. तस्वीर को अपने सामने रखते हुए अपने जर्नल में या कंप्यूटर पर पाँच बातें लिखें, जिनके लिए आप उस व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं।


4. हर वाक्य को शक्ती शाली शब्द धन्यवाद से शुरू करें, फिर उसका नाम लिखें और यह भी कि आप निश्चित रूप से किस ख़ासियत या ख़ूबी के लिए कृतज्ञ हैं।


*5. आज ही तीन तस्वीरें अपने साथ या किसी ऐसी जगह पर रखें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकते हों उन तस्वीरों को दिन में कम से कम तीन बार देखें, तस्वीर में व्यक्ति की ओर देखते हुए बोलें और उसे धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और इसके बाद उसका नाम लें। धन्यवाद, मोहन ।*


*6. आज रात सोने जाने से पहले अपने चाहे गए भगवान की फ़ोटो एक हाथ में लें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए उन्हें धन्यवाद कहें।*


कृतज्ञता का महत्व


कृतज्ञता का महत्व 2


हमें सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत क्यों मिलता हैं?2


शंका का त्याग क्यों आवश्यक हैं ?


चिन्तन का विषय:– चिन्तन करे और अपने सपने को पूरा करे ।


विचार की शक्ति जिससे बदल सकती है आपकी जिंदगी


स्वास्थ्य के लिए कृतज्ञता




रविवार, 2 अक्टूबर 2022

जो स्वयं को कट्टर हिन्दू समझता है सिर्फ वही पढ़े अन्यथा आगे बढ़े।

 



महादेव 

. 🕉️

. 🙏🕉️🌷श्रीहरि 🌷🕉️🙏

. 🙏🚩हर हर महादेव 🚩🙏

. 🙏🏹⚔️जय परशुराम 🏹⚔️




हे पार्थ तू जाग जा नपुसकता को त्याग दे. देख रण में तुझे दुर्योधन ललकार रहा, अगर तू युद्ध नहीं करेगा तो पूरी दुनिया के लोग तेरी आवादी पर हेसेंगे.


तू वही अर्जुन है जिसका सारथी श्री कृष्ण था तू वही अर्जुन है जिसने अकेले यवन को जीता था तू वही परशुराम है जिसने अकेले पूरी पृथ्वी को विधर्मियों से 21 वार विरक्त किया.तू वही महकाल है जिसने त्रिपुरासूर का वध किया था वही माता महाकाली है जिसने अकेले 7 अरब राक्षसों को जिन्दा चबा गयी थी.तू वही माता दुर्गा है जिसने अकेले ही यूरोप और पाताल से आए हुए महिषासूर को उसके 8 अरब सेना सहित क्षण भर में नाश कर दिया.तू वही काली दास है जिसने मुहम्मद को भस्म किया था, तू वही पोरस,चाणक्य और चन्द्रगुप्त है जिसने इसी कलयुग में बिखड़े हुए भारत को फिर से अखंड भारत का निर्माण किया.. तू गुरु गोविन्द और 40 सरदार है जिसने चंडी की तलवार से 10 लाख भेरियो को गाजर मूली की भांति काटा था तू वही छत्र पति शिवा जी महराज और पेशवा बाजीराव है जिसने एक ही झटके में भारत को आसुरी शक्तियों का नाश कर बचाया था. 


हे पार्थ क्यों डरते हो मरने से... तुम वैसे भी जन्म से पहले और मरने के बाद अमर ही हो धर्म युद्ध लड़ने का सौभाग्य हर युगो के लोगो को प्राप्त नहीं होता. तुम शरीर नहीं हो तुम प्रत्यक्ष ब्रम्ह के अंश अर्थात ब्रम्ह हो तुम जो चाहो अपने विश्वास के बदौलत पा सकते हो. तुम्हारे पिछले विचारों का परिणाम तुम्हारा शरीर रूप रंग परिवार समाज और संसार है जिसका कभी तुम भूल वश या जान बुझ कर चिंतन किए थे .. तू नहीं भी लड़ेगा तो तेरा स्वभाव युद्ध में लगा देगा.. क्योंकि ये सब विधर्मी महकाल के द्वारा पहले ही मारा जा चूका है तू नहीं भी चाहेगा तो भी तुझे निमित्त मात्र बनना ही होगा, इनकी आसामनी किताब देख इनका अंत तेरे ही हाथों लिखा है, तुझे ही बनना है इनके अल्लाह का कहर ।

तू प्रति दिन महकाली को ध्यान कर, तू प्रतिदिन महकाल का ध्यान कर, तू इस वक़्त विधर्मियों का नाश करने के लिए अमर लोक से आया है, तुझे कोई क्षलिया भेद नहीं सकता क्योंकि तू ही सतरंज का जन्म दाता है, ये पृथ्वी तो तेरे लिए ही बनी है असुरो का स्थान तो पताल है. तू निर्दोष पशु को मार कर उसका मांस मत खाया कर। तू तामसी भोजन त्याग दे। तू शराब का सेवन मत किया कर , तेरी बुद्धि नष्ट हो जाएगी जिससे तू पाप को प्राप्त होगा। 


ज़ो स्वयं को शिव से ऊँचा कहे ज़ो राम को मुहम्मद से तुलना करें, ज़ो सनातन धर्म का अपमान करें, उसका सर धर से अलग कर दे, आज तू सनातन धर्म की आत्म रक्षा के लिए यहाँ लड़ेगा, कल तेरा राम तेरे लिए सनातन मुक्ति का द्वार खोलेगा, तेरे सैकड़ो पितृ का उद्धार हो जायेगा। आज तू अपने देश के लिए लड़ेगा, आने वाली पीढ़ियां तेरे वीरता की कथा सुन कर देश को विश्वगुरु और सोने की चिडया नहीं सोने का शेर बनाएगा .... तू युद्ध के लिए तैयार हो जा... अगर आज युद्ध नहीं लड़ेगा तो वैसे भी तू या तेरी पीढ़ी दुर्योधन का गुलाम बनेगा, लाखों द्रोपदी के कपड़े नोचे जायेंगे, तेरी पीढ़ियां तुझे कोसेगी..... जीवन के के हर क्षण मेरा स्मरण कर मुझ में मन स्थिर कर, तू बिजली की भांति मेरी भक्ति और शक्ति अपने भीतर प्रवाह होने दे.. मै स्वयं तेरे भीतर अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ, मै स्वयं तुम्हारे भीतर स्थित होकर ज्ञान दीप जला कर अज्ञानता रूपी अन्धकार को मिटा दूंगा. जिससे तू मुझ सनातन ईश्वर को ही प्राप्त होगा फिर तेरा पुनर्जन्म नहीं होगा। यदि तू अपने मन को मुझ में स्थित नहीं करेगा.. तो फिर मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी... यदि युद्ध के के क्षण मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी तो तू कलयुगी रूपी दुर्योधन को जितने में असमर्थ हो जायेगा. तू हर क्षण मेरा ध्यान कर, मेरा नाम जपा कर.. तू प्रहलाद की तरह मुझे सर्वयाप्त हर स्थान को मेरे भीतर है ऐसा विश्वास कर 


मै ही जल अग्नि पृथ्वी वायु और अनंत ब्रह्माण्ड रूप में स्थित हूँ.

मै जितने वालों का विजय हूँ, मै तेजस्वी का तेज और शक्तिशाली पुरुषो की शक्ति हूँ, मै धर्मों में सनातन और मनुष्यो में तू स्वयं सनातनी हिन्दू हूँ। मै बलशालियो का बल और बुद्धिमानो की बुद्धि, शाशन करने में नितिवान शाशक प्रभु श्री राम हूँ मै पंच तत्व हूँ और ज्ञानी विज्ञानी पुरुषो का ज्ञान हूँ, मै विद्यायो में अध्यात्म विद्या हूँ, मै ही पृथ्वी पर लुप्त हुए ज्ञान को फिर से स्थापित करने वाला गौतम बुद्ध, गुरुनाक और महावीर हूँ,पृथ्वी पर अपने प्रिय पुत्र ईसा मसीह को मै ने ही ज्ञान दीप जलाने के लिए भेजा था.मै क्षल करने वालों में जुवा और मित्रता निभाने में सुदामा का विश्वासी मित्र द्वारिकाधीश श्री कृष्ण हूँ. मै स्वयं तुम्हारे साथ हूँ, पूरी दुनिया की सत्ता देख, अपने राष्ट्र की शान देख. तू 2014 के बाद अपने देश का भाग्य देख, काशी विश्वनाथ अयोध्याधाम देख, कश्मीर में तू अपनी ललकार देख, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का हाल देख.., श्री लंका को फिर से जलता देख अयोध्या को फिर सबरता देख....


हे पार्थ जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है मै तब तब हर युग के एक ही समय में अपने कई रूप को रचता हूँ और धर्म की स्थपना करता हूँ साधु पुरुषो की रक्षा करता हूँ अधर्म का नाश करता हूँ.. दुष्टो का संहार करता हूँ पंडित जनो को धर्म कार्य के लिए नियुक्त करता हूँ। 


सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त्त वचन को तू फिर भी सुन । तू मेरा अतिशय प्रिय हैं, इससे यह परम हित कारक वचन मैं तुमसे कहूँगा.हे अर्जुन ! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भक्त्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर । ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है.सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्व शक्त्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त्त कर दूंगा, तू शोक मत कर ।तुझे यह गीता रूप रहस्य मय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्त्ति रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये ; तथा जो मुझ में दोष दृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये.


जो पुरुष मुझ में परम प्रेम करके इस परम रहस्य युक्त्त गीता शास्त्र को मेरे भक्त्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा —– इसमे कोई संदेह नहीं.


उससे बढ़ कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है ; तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़ कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं.


जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीता शास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा


हे पार्थ ! क्या इस ( गीता शास्त्र ) को तूने एकाग्रचित से श्रवण किया ? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया.

काशी बम बम बोल रहा है

अयोध्या जय श्री राम दहाड़ रहा है 

- श्री कृष्णा


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मंगलवार, 27 सितंबर 2022

कृतज्ञता का महत्व 2

{ह्रीं}
*🙏🌺⚔️❤️ ॐ श्रीं दुर्गाये नमः ❤️🔱🌺🙏*

*माता दुर्गा की दया कृपा से उनके द्वारा प्रेरित होने पर मैं दुर्गा पाठ सपस्ती का सार बताना चाहूंगा। जब आप इस सार को समझ जायेंगे। तब इस के लिए मैया को गहराई से धन्यवाद करे क्योंकि उन्ही की कृपा दृष्टि से इस पाठ के विज्ञान का रहस्य समझ पाया हूं। उन्ही की दी हुई बुद्धि से समझ पाया हूं। नही तो हजार बार पढ़ कर भी कोई इस सपस्ती को समझने में असमर्थ हो जाता है। उन्ही की दी शक्ती से मैं राहुल झा ये सार लिख रहा हूं।* 

*दुर्गा सपस्ती का पाठ करने से पहले उसे समझना अवस्यक है। तभी हमारे मोह का नाश और उसका फल संभव है।*

*प्राचीन समय में पूरी पृथ्वी पर सनातन धर्म ही था। उसी सनातनी में एक राजा सुरथ नामक एक राजा थे वो पूरी पृथ्वी के राजा थे। जब उन्हे परमात्मा के प्रति कृतज्ञ होने का ज्ञान नही था तब उनके शत्रु धीरे धीरे उनके राज्य को हड़पने लगे और शत्रु राजा से हारने लगे फिर एक समय ऐसा आया पूरी पृथ्वी से सिर्फ अपने छोटे राज्य का राजा बनकर रह गए। उसमे भी उनके मंत्री महामंत्री आदि उनके शत्रुओं के प्रभाव में आकर पीठ पीछे उनके विरुद्ध षडयंत्र रचने लगे ये सब देख राजा स्वयं की रक्षा के लिए अपना राज्य त्याग कर घना वन की ओर चल दिए। चलते चलते उन्हें एक नदी और ऋषि की कुटिया मिली। राजा ऋषि के शरणागत होकर वही अपना डेरा बना लिया और रहने लगे। एक दिन राजा सूरथ एक वैश्य को देखा वो काफ़ी उदास होकर शोक में डूबा था। राजा सुरथ उसके समीप जाकर उसके दुःख का कारण पूछने लगे। तभी उस वैश्य ने कहा मेरे द्वारा अर्जित किए धन समाप्ति के लालच में आकर मेरी पत्नी बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया फिर भी मेरा मोह उससे से नही हटता जबकि जानता हूं उन्हे हम से संबंध नही था अपितु उनका सम्बन्ध मेरे धन संपत्ति से था ये सब जानकर कर भी उसके प्रति मेरा मोह नही हटता।*

*वैश्य का ये कारण जानकर धर्मात्मा राजा को स्वयं के राज्य की याद आ गई और वो भी मोह में पड़ गए और आश्चर्य में पड़कर वो अपने प्यारे प्रजा की हाल के बाड़े में सोच कर चिंतित हो गए।*

*उन्होंने वैश्य को अपने साथ ऋषि के समीप लाया और अपनी और उस वैश्य की व्यथा सुनाई और अपने मोह को लेकर प्रश्न किया – हे प्रभु जो राज मेरे हाथ निकल चुका है अब वो वास्तव में हमारा नही है ये जानकर भी मैं क्यो अपने प्यारे प्रजा के बारे में चिंतित हूं। उन्हे दुष्ट राजा न जाने किस किस प्रकार से प्रताड़ना करते होंगे। मेरे हाथी घोड़े को परतंत्र होकर न जाने किन किन कष्टों को शाहना परता होगा। ये सब सोच मैं अपने प्रजा के लिए बहुत दुःख को प्राप्त हुआ हुआ हूं प्रभू मेरे मोह के नाश का मार्ग हो तो बताए।*

*तभी ऋषि बोले: हे राजन ये पूरी सृष्टि महामाया का ही स्वरूप है उसी ने इस जगत को धारण कर रखा है वहीं इस अनंत ब्रह्मांड को धारण कर स्थित है उसी ने जगत को मोह में डाल रखा है ।वो जब चाहती तब राजा बना देती है जब चाहती है तब राजा को रंक बना देती है। वो जब चाहती है भिक्षुक को दुनियां का सम्राट बना देती और वो जब चाहती है तब सम्राट को भिक्षुक बना देती है। ये भगवती आदिशक्ति महाज्ञानियों के चित्त को भी बल पूर्वक खीच कर मोह डाल देती है। ये श्री हरि विष्णु के चित्त को भी बल पूर्वक खीच कर मोह रूपी नींद में सुला देती है। पूर्व काल में विष्णु जी के कान से दो दानव उत्पन्न हुए। और ब्रम्हा जी को खाने के लिए दौर पड़े तभी ब्रम्हा जी स्वयं की रक्षा के लिए श्री हरि विष्णु जी को जगाने बहुत प्रयत्न किया किंतु श्री विष्णु जी को जगाने में असमर्थ रहे। फिर उन्होंने उनके योगनिद्रा रुपी भगवती महामाया का ध्यान किया। कृतज्ञता पूर्वक उनके गुणों के साथ उनकी स्तुति करना सुरू किया। फिर माता भगवती विष्णु जी के योगनिंद्र रूपी से निकल कर आकाश में स्थित हो गई और विष्णु जी जाग गए। तभी उन्होंने ने ब्रम्हा और उस मधु कैटभ नामक दो दानव को देखा । फिर विष्णु जी ने ब्रम्हा जी को बचाने के उद्देश्य से मधु – कैटभ से कई हजार वर्षों तक युद्ध किया अंत में माता भगवती ने दोनो दानव को मोह में दाल दिया। दोनो मोहित दानव विष्णु जी के पराक्रम से प्रसन्न होकर कहने लगा मैं तुम्हारी युद्ध कौशल से प्रसन्न हूं तुम वर मांगो क्या चाहते हो तभी भगवान विष्णु ने कहा यदि तुम वर देना ही चाहते हो तो अभी मेरे हाथों से मारा जाओ तभी दोनों असुरों ने कहा जहां पृथ्वी सुखी हो हमारी मृत्यु वहीं पर होगी तभी भगवान विष्णु ने उस दोनों को पकड़ कर अपने जांघ पर रखा और अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया इसी के साथ ब्रह्मा जी स्वयं को रक्षा करने में सफल हुए ।*

*इसी तरह पूर्व काल देवताओं ने भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञ न होकर अपना स्वर्ग और अपने अपने अधिकार को खो बैठे महिषासुर को मारने में ब्रह्मा विष्णु महेश भी असमर्थ हो चुके थे क्योंकि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों लिखी थी भगवती के द्वारा ब्रह्मा जी की बुद्धि मोहित होकर उनके मुख से महिषासुर को वरदान दे रखा था तभी सभी देवताओं ने भगवती महामाया को याद करने लगे महामाया प्रकट होकर महिषासुर को नाश किया इसी तरह चंड मुंड रक्तबीज आदि का विनाश हुआ देवता जब-जब अभिमान के वशीभूत होकर परमात्मा के प्रति कृतज्ञ ना हुए तब तब उनके स्वर्ग आदि पर से अधिकार हट गया फिर जब जब परमात्मा के प्रति अर्थात माता दुर्गा के प्रति भगवती मूल प्राकृतिक के प्रति कृतज्ञ होने लगे तब तब प्रकट होकर उनके शत्रुओं का नाश करती और उनके अधिकार को दोबारा देकर उन्हें वरदान दिया करती। हे राजा सूरत आप उसी भगवती की शरण में जाओ पूर्ण रूप से स्वयं को समर्पित कर दो उनके प्रति कृतज्ञ हो जाओ वह जो देती है उसके लिए उसका स्तुति करते रहो भक्ति करते रहो वह स्वयं प्रसन्न होकर आपको मोह से मुक्त कर देगी आपके अधिकार को दोबारा देकर वरदान देगी तभी उस राजा और व्यस्य ने नवरात्रि के समय में 9 दिन व्रत पूरी जीवन में जो कुछ मिला उसके लिए भगवती महामाया को गहराई से धन्यवाद रूपी पूजा-पाठ स्तुति किया वह अपने अभिमान को त्याग अपनी माता सर्व स्वरूप में अपनी माता दुर्गा को ही देखने लगे तभी माता ने प्रकट होकर उन दोनों को इक्षित वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गई।*

*पूरे सप्तशती पाठ में हमने यही सीखा मनुष्य जीवन या देवता जीवन मैं कभी भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञता को नहीं त्यागना चाहिए ना ही कभी अभिमान करना चाहिए हमें जो कुछ मिला उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद करते रहना चाहिए भगवती माता को धन्यवाद करते रहना चाहिए हमारे शरीर आदि के लिए माता को धन्यवाद करते रहना चाहिए छोटी छोटी चीजों पर हमें धन्यवाद करते रहना चाहिए हम जितना प्रेम पूर्वक माता को कृतज्ञ भाव देंगे उतनी ही तीव्र गति से वह हमें अपने अधिकार को प्राप्त करेगी । ये सृष्टि का विज्ञान है। आप जब भी पाठ करे प्रार्थना करे तो 3,6,9 बार करें। ये सृष्टि का वैज्ञानिक सिक्योरिटी कोड है। सपस्ति पाठ के हर एक शब्दों में रहस्यमय जादू है। आप जब भी मैया से प्रार्थना करे तो पूरी भावना के साथ देवताओं की भांति, ब्रम्हा जी की भांति प्रार्थना करें । मैया के गुणों का बखान करें। आपका कृतज्ञ भाव ईधन की भांति है , आपका विचार किसी यान की भांति है। यदि ईंधन न हो तो यान एक पग भी आगे नही जा पाएगा। आप जो कुछ मैया से मागना चाहते हो उसके लिए पहले मैया के प्रति कृतज्ञ होना परेगा। इस संसार में आपको अभिमान का त्याग कर अपने को प्रभु का निमित्त मात्र बनकर जीना सीखना होगा।*

*आप जब भी प्रार्थना करें तो तो अपने साथ अन्य भक्तो के लिए प्रार्थना करें जैसे अर्गला स्त्रोत में अन्य भक्तो के लिए प्रार्थना किया गया है , जैसे 4 अध्याय के अंत में देवता गण मनुष्य के लिए मैया से वरदान मागते है। इनमे जीतना भी क्रिया करने को बताया हूं इसमें एक भी नहीं छुटना चाहिए सभी महत्त्वपूर्ण क्रिया है।*

🙏 *ॐ नमो माता दुर्गे* 🙏

    *🌺जय माता दी 🌺*
                 🪷
बागेश्वर धाम सरकार 

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