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गुरुवार, 22 सितंबर 2022

कृष्ण रासलीला कोई कामुक भोग नही अपितु एक रहस्य है।


6 वर्ष 9 माह की आयु में कालिया नाग का घमंड चूर करना।

राजा परीक्षित ने यहां प्रश्न कर दिया- शुकदेवजी से पूछते हैं गुरुदेव! मेरी समझ में नहीं आया, सज्जनों! बहुत बहुत ध्यान से पढ़े, परीक्षित कहते हैं- श्रीकृष्ण ने परायी स्त्रियों के साथ रास किया, परायी स्त्रियों के गले में गलबहियाँ डालकर कृष्ण नाचे, ये कहां का धर्म है? मेरी समझ में नहीं आया?


परीक्षित के समय में कलयुग आ गया था, परीक्षित कहते हैं- कलयुग आगे आ रहा है, शुकदेवजी बोले- अब तो घोर कलियुग आने वाला है और कलयुग के लोगों को तो जरा सी बात चाहिये, फिर देखों, शास्त्रार्थ पर उतर आते हैं- ऐसा क्यों लिखा? ऐसा क्यों किया? मनुस्मृति में लिखा है कि धर्म का तत्व गुफा में छुपा हुआ है, इसलिये बड़े जिस रास्ते से जायें, छोटों को उसी रास्ते से जाना चाहिये।


ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

चेतन अमल सहज सुखराशी।।


हम लोग ईश्वर के अंश हैं, जीव ईश्वर का दश है तो कलयुग के लोगों को लीक प्वाइंट मिल गया, ऐसे ही जो ईश्वर कोटि के पुरूष होते हैं, यदि धर्म के विपरीत भी वो कोई काम करे, उन्हें कोई दोष नहीं लगता, क्योंकि वे ईश्वर है, कर्तु, अकर्तु अन्यथा "कर्तु समर्थ ईश्वरः" ईश्वर वो है जो नहीं करने पर भी सब कुछ करे और करने के बाद भी कुछ नहीं करे।


नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्रानीश्वरः।

विनश्यत्याचरन् मौढयाधथा रूद्रोऽब्धिजं विषम्।।


दूसरी बात- तुमने कहां, जो ईश्वर ने किया वो हम करेंगे, मैं इसका विरोध करता हूँ, शुकदेवजी कहते हैं- जो ईश्वर होता है उनका अनुकरण हमें कभी नहीं करना चाहिये, तुम ये बताओ शंकरजी कौन है? परीक्षित ने कहा शंकरजी ईश्वर है, तुम कहते हो- ईश्वर ने जो किया वो हम करेंगे तो समुद्र में से जितना जहर निकला था, पूरे जहर को शंकरजी पी गये।


शंकरजी ईश्वर है इसलिये दस-बीस हजार टन जहर पी गये, तुम उनके अंश हो तो तुम तौले-दो तौले ही पीकर देखो, शिवजी ने विष पी लिया, उन्हें बुखार भी नहीं आया और हम एक बूंद भी विषपान करेंगे तो डेढ़ मिनट में ही हमारा राम नाम सत् हो जायेगा, जो कार्य ईश्वर ने किया वो हम कैसे कर सकते हैं।


ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित्।

तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्।।


ईश्वर के वचन को मानो, ईश्वर के वचन सत्य है, देखो सज्जनों! रामजी और कृष्णजी के चरित्र में अन्तर क्या है? जो रामजी ने किया है वो हम कर सकते हैं और कृष्णजी ने जो कहा वो हम कर सकते हैं, रामजी के किये हुए को करो और कृष्णजी के कहे हुए को करो।


कृष्णजी के किये हुए को हम नहीं कर सकते, क्योंकि राम का जो चरित्र है वो विशुद्ध मानव का चरित्र है और कृष्णजी का जो चरित्र है वो विशुद्ध ईश्वरी योगेश्वर का चरित्र है, दोनों ही भगवान् हैं, लेकिन रामजी के चरित्र में मानवता का प्रदर्शन ज्यादा है और कृष्णजी के चरित्र योगेश्वरता का प्रदर्शन है।


प्रातः काल उठ के रघुनाथा।

मात-पिता गुरु नावहिं माथा।।


रघुवर प्रातः उठकर माता-पिता गुरुजनों को प्रणाम करते हैं, ये तो काम हम कर सकते हैं कि नहीं? हम भी कर सकते हैं और सब को करना ही चाहिये, लेकिन सात दिन के कृष्ण ने पूतना को मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, छः महीना के कृष्ण ने शकटासुर मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, पूरे ब्रजमंडल में आग लग गयी और ब्रजवासीयों के देखते-देखते कृष्ण ने उस दावाग्नि का पान कर लिया, ये हम कर सकते हैं क्या? 


कृष्ण ने लाखों गोपियों के साथ रास किया, उसे हम नहीं कर सकते, शुकदेवजी कहते हैं- यह कोई स्त्री-पुरुष का मिलन नहीं था, जीव और ईश्वर का मिलन था, यह रासलीला छः महीनों तक चली थी, क्या छः-छः महीनों तक ब्रज गोपियाँ अपने घर से बाहर रह सकती थी, इसी बात से सिद्ध होता है कि यह तो जीव का प्रभु से मिलन था।


हम कहते हैं कि हम ईश्वर के अंश हैं, इस पर भी मैं यह कहना चाहता हूं, हम जानते हैं अंश का अर्थ होता है थोड़ा यानी छोटा जैसे हम लोग गंगाजी में नहाते हैं, गंगा स्नान करते वक्त हमारे मुंह से निकलता है हर-हर गंगे, हर-हर गंगे, यह जानते हुए भी कि भारत के जितने भी महानगर है, उन ज्यादातर महानगरों की सारी गंदगी गंगाजी में ही जाती है।


चाहे वो रूद्रप्रयाग हो या उत्तरकाशी हो, हरिद्वार हो या देवप्रयाग, ऋषिकेश हो या प्रयाग, सारा गंदा पानी गंगाजी में जाता है फिर भी हम गंगा स्नान करते हैं और बोलते हैं हर-हर गंगे•• क्यों? क्योंकि हम जानते हैं, इन सारे नगरों की गंदगी मिलकर भी गंगा को गंदा नहीं कर सकती, गंगा विशाल है, गंगा महान् है।


लेकिन आपने कहा- मोतीभाई गंगा स्नान करने चलिये, हमने गंगा स्नान करते-करते सोचा कि शालिग्रामजी की सेवा के लिए गंगाजल ले चलूं, सो मैंने एक चांदी की कटोरी में अढ़ाई सौ ग्राम गंगाजल भी लिया, स्नान करके लौटे तो धर्मशाला के कमरे का ताला खोलने के लिये मैंने गंगाजल की कटोरी नीचे रख दी, पीछे से गंदे मुँह वाला सूअर उस गंगाजल की कटोरी में मुंह लगाकर आधा गंगाजल तो पी गया।


मैंने देखा तो मन खिन्न हो गया, तो सज्जनों! अब बताओ कि क्या उस बचे हुए गंगाजल से मैं अपने शालिग्रामजी भगवान् को स्नान कराऊँ या नहीं? नहीं कराऊँगा, क्योंकि सूअर का मुंह लग जाने से वो गंगाजल गंदा हो गया, और बहती हुई गंगा में तो पूरा सूअर ही डूब जाये तो कोई असर नहीं होता, इसी कटोरी से मुंह लगाया तो असर क्यों हुआ? क्योंकि बहती हुई गंगा विशाल है और कटोरी का गंगाजल अंश है, तो जो ताकत उस विशाल गंगा में है वो अंश में नहीं रही।


इसलिये ईश्वर जो विशाल है और हम ईश्वर के अंश हैं, अंश होने के नाते जो कार्य ईश्वर करता है वो हम कैसे कर सकते हैं? इसलिये ईश्वर के चरित्र को प्रणाम करो, ईश्वर के चरित्र का वंदन करो, दूसरी बात- कुछ नास्तिक लोगों को ये कामी पुरुष की सी लीला लगती है, नहीं-नहीं कृष्ण ने जो गोपियों के साथ जो रास किया ये काम लीला नहीं- "का विजय प्रख्यापनार्थ सेयं रासलीला" काम को जीतने के लिये प्रभु ने रासलीला की।


कोई कहता है हम हलवा नहीं खाते, अरे, खाओगे कहाँ से तुम्हें मिलता ही नहीं है, नहीं खाना तो वो है जो मिलने पर भी इच्छा नहीं रहे, कहते हो कि हम तो ब्रह्मचारी है, जब शादी किसी ने करवाई नहीं, अपनी बेटी किसी ने दी ही नहीं, सगाई वाला कोई आया ही नहीं तो ब्रह्मचारी तो अपने आप हो गये।


नैष्ठिक ब्रह्मचारी सिवाय कृष्ण के किसी और के चरित्र में नहीं है, कृष्ण ने कामदेव से कहा- कोपीन पहन कर जंगल में समाधि लगाकर तो काम को सभी जीतते है, लेकिन असंख्य सुंदरी नारियों के गले में हाथ डालकर रासविहार करके भी मैं तुम पर विजय प्राप्त करूँगा, ये तो काम को जीतने की है रासलीला, इसलिये तो प्रभु ने काम को उल्टा लटका दिया आकाश में।


गोपियाँ कृष्ण के संग रास कर रही थी, वे तो वेद के मंत्र थे साक्षात्, जीव है गोपी और ईश्वर है स्वयं श्रीकृष्ण, तो जीव और ईश्वर का जो विशुद्ध मिलन है उसी को हम रास कहते हैं, ये काम लीला नहीं, काम को जीतने वाली लीला है, काम के मन में अभिमान था कि मैंने सबको जीत लिया, ब्रह्मा को जीत लिया, वरूण को जीत लिया, कुबेर को जीत लिया, यम को जीत लिया, वो योगेश्वर कृष्ण को जीतना चाहता था।


प्रभु ने असंख्य सुंदरी गोपियों के बीच रहकर भी काम को जीता, मन और इन्द्रियों पर जिसका नियंत्रण है उसे कोई विचलित नहीं कर सकता, इस रास लीला के प्रसंग को सुनने का मतलब क्या है? रास के मंगलमय् प्रसंग को जो व्यक्ति सुनते है, पढ़ते है और पढ़कर और चिन्तन के द्वारा इस काम विजय को जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं उन व्यक्तियों के ह्रदय में भक्ति प्रगट हो जाती है, और अंत में गोविन्द के चरणों में प्रीति हो जाती है, और ह्रदय का सबसे बड़ा रोग जो काम है वो काम हमेशा के लिये निकल जाता है।


बताओं, जिस रासलीला को सुनने से या पढ़ने से मन का काम निकल जाये, वो स्वयं कामलीला कैसे हो सकती है? परीक्षित के मन का संदेह दूर हो गया, गोविन्द ब्रजवासीयों के वश में है, इनका प्रेम इतना अगाध सागर है कि ब्रजवासीयों के प्रेम के सागर में ब्रह्मा भी गोता लगाये तो थाह नहीं पा सकते, विधाता में सामर्थ्य नहीं है थाह पाने की, एक अलौकिक बात- यहाॅ गोविन्द से मिलना भी है, गोविन्द से मिलन की आकांक्षा भी है तो गोविन्द के प्रति आशीर्वाद का भाव भी है।

 *8 वर्ष की आयु में काम देवता का अभिमान तोड़ दिया । काम देवता ने अपने पांच शक्तिशाली वाणो से पूरी शक्ति लगा दी किंतु भगवान कृष्ण को काम भाव से प्रभावित न कर सके। वहां अलग ही दृश्य दिखने को मिला.. कोई गोपियां कृष्ण का रूप हो जाती और दूसरी गोपियां के संग नृत्य संगीत करने लगती, कोई गोपियां स्वयं को कृष्ण रूप देखकर आश्चर्य से अपनी सखी को कहती ये देखो मैं श्याम सुंदर कृष्ण हूं। ये सब देखते हुऐ काम देवता अचंभित हो गए। वो पहचान ही नही पा रहे थे इसमें असली कृष्ण कौन है। तब उन्हे ज्ञान हुआ। कृष्ण में तो सम्पूर्ण चराचर जगत है। ये लाखों गोपियां कृष्ण का ही रूप है। जो गोपियां वहां मौजूद थीं उसका शरीर उसी समय उसके घर पर भी था क्योंकि उस समय कोई माता पिता अपने बच्चे को रात्रि में नही निकलने देते । उसकी आत्मा परमात्मा के साथ स्थिर था। वो सब गोपियां पिछले जन्म में ऋषियों मुनि ही थे जो अपनी योग भक्ति के बौदौलत भगवान कृष्ण को प्राप्त हो चुके थे। जब भगवान अवतार लेते हैं तो उनके साथ उनके प्रेमी भक्त भी


अवतरित होते है। जैसे त्रेता युग में प्रभु श्री राम के साथ वानर के रूप में देव सेना अवतरित हुए थे। 






4 वर्ष 4 माह की आयु में अघाशुर वध।

7 वर्ष 2 माह की आयु में गोवर्धन पर्वत को अपने अंगूली पर धारण करना।

3 वर्ष की आयु में अग्निपान कर बृजवासियों की अग्नि से रक्षा करना।

11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस के कुश्ती मैदान में भगवान कृष्ण द्वारा कालरीपट्टू ( मार्सल आर्ट) का जन्म ।

11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस को उसके घर में घुस कर उसका वध करना ।

6 दिन पूर्ण होने बाद 7 वे दिन की आयु में पूतना वध अर्थात पूतना पर कृपा उसे स्वर्ग लोक भेजना।

कृष्ण गोपियों के कपड़े क्यों छुपाए ?

 



एक समय कुछ गोपियां स्नान करने के लिए यमुना नदी पहुंची । स्नान से पूर्व नदी के तट पर भागवती जगत जननी माता की मूरत बना कर प्रार्थना में उनसे कृष्ण जैसा पति मागने लगी। फिर वहां 5 वर्षीय कृष्ण सीघ्र ही पहुंचे और माता भागवती की मूर्ति और गोपियां के बीच खड़े होकर गोपियां से नटखटता पूर्वक पूछने लगे " क्यों री वानरी क्या मांग रही थीं माता से " अभी तो प्रार्थना कर रही, फिर मेरे घर जाके मैया से शिकायत करेगी "कान्हिया मुझे परेशान करता है।" रूक आज तुझे मज़ा चखाता हूं। इतना सुनते ही सभी गोपियां वहां से भाग निकली और नदी में जाकर स्नान करने लगीं, नदी या कहीं भी नग्न होकर स्नान करना वेद विरुद्ध महापाप है। शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। और जल भगवान कृष्ण का ही एक तत्व स्वरूप है जिस प्रकार अग्नि वायु पृथ्वी आकाश कृष्ण का ही पंच तत्व स्वरूप होता है उसी तरह ये नदी सागर और जल भी श्री कृष्ण का रूप है। वो सर्व्यपत है जब नदी में गोपियां स्नान करने गई थीं तब किशोर अवस्था होने के कारण उसे ज्ञान नही था नग्न होकर नदी जल में स्नान करना महापाप है। चाहे वो छोटा बच्चा ही क्यों न हों। भगवान कृष्ण ढूढते हुए नदी के किनारे पहुंचे गोपियों के कपड़े देखे उस कपड़े को छुपा दिया। स्वयं अंतर्ध्यान हो गए। जब गोपियां स्नान कर बाहर निकली तो उसके कपडे गायब थे अब वो शर्म के मारे नदी में फिर प्रवेश हो गई और जगत जननी माता से प्रार्थना करने लगी। क्योंकि कृष्ण सिर्फ विष्णु अवतार ही नही थे वो माता पार्वती का भी अवतार था । अर्थात परमात्मा तत्व एक ही है अनेक नही। जब गोपियां प्रार्थना कर थक गई कुछ भी संकेत न मिला तब उसे कृष्ण कभी जल में दिखते तो कभी पेड़ की टहनियों पर कभी नदी के तट पर दिखते और उनके साथ उसके कपडे।  


अब वो कृष्ण से क्षमा मागने लगी की अब से वो दुबारा ऐसा अपराध नही करेगी। शास्त्रविरुद्ध कर्म का त्याग करेगी । क्षमा का भाव आते ही उसके कपडे जहां वो रखी उसी स्थान पर फिर से पड़ा हुआ मिला। 


गोपियों को ज्ञान हो गया की परमात्मा चरण को वो तभी प्राप्त कर सकेगी जब वो शास्त्र विरुद्ध कर्म का त्याग करेगी। अन्यथा जन्म जन्मांतर तरह तरह के अंजाने में पाप के बंधन के कारण संसार बंधन भी बना रहेगा शास्त्र विरुद्ध कर्म करते हुए जीव कभी पाप से मुक्त नही हो सकता। उसे एक दिन परमात्मा की शरण जाना ही होगा।

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

कृतज्ञता का महत्व

 🌷 *जय श्री कृष्णा* 🌷



*नीचे दिया गया वाक्य-समूह न्यू टेस्टामेंट में वर्णित गॉस्पेल ऑफ़ मैथ्यूज़ से लिया गया है। और बहुत से लोग सदियों से इसे ग़लत समझते आए हैं, जिस वजह से यह उन्हें बहुत दुविधापूर्ण तथा अबूझ लगता रहा है।*


*"जिसके भी पास है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके पास नहीं है, उसके पास जो है वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"*


*आपको मानना होगा कि जब आप इन वाक्यों को पढ़ते हैं, तो ये अन्यायपूर्ण लगते हैं। यह एक तरह से ऐसा कहने जैसा लगता है कि अमीर लोग ज़्यादा अमीर बनेंगे और ग़रीब लोग ज़्यादा ग़रीब। लेकिन इस वाक्य-समूह में एक पहेली है, एक रहस्य है। जब आप इसे सुलझा लेते हैं और इसका सही अर्थ जान लेते हैं, तो आपके सामने एक नया संसार खुलने लगेगा।*


*इस गुत्थी का जवाब सदियों तक बहुत से लोगों के लिए अबूझ रहा है, और इसका जवाब एक शब्द में छिपा हुआ है : कृतज्ञता ।*


*" जिसके भी पास कृतज्ञता है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा।*


*कृतज्ञता नहीं है, उसके पास जो है वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"*


*छिपे हुए शब्द को उजागर करते ही जटिल वाक्य समूह आईने की तरह एकदम साफ़ हो जाता है । जब ये शब्द लिखे गए थे, तब से दो हज़ार साल का समय बीत चुका है, लेकिन ये आज भी उतने ही सच हैं, जितने कि वे तब थे : दुर्भाग्य से, यदि आप कृतज्ञ होने का समय नहीं निकाल पाते हैं, तो आपको कभी अधिक नहीं मिलेगा और आपके पास जो है, उसे भी आप खो देंगे। कृतज्ञ होने पर जो जादू हो सकता है, उसका वादा इन शब्दों में है : यदि आप कृतज्ञ हैं, तो आपको अधिक दिया जाएगा और आप समृद्ध होंगे!*


*सनातन धर्म के हर एक मंत्र में कृतज्ञता भी इतनी ही प्रबलता से किया गया है। वेदों के मंत्र और पुराणों के स्त्रोत में कृतज्ञता प्रचुर मात्रा से दिया गया है। कृतज्ञता अर्थात इश्वर के प्रति एहसानमंद होना,उनके गुणों का चिन्तन करना तथा उनके द्वारा निःस्वार्थ भाव से किया गया उपकार के बदले प्रार्थना स्त्रोत और मंत्र के द्वारा उनके प्रति एहसानमंद महसूस या अनुभव करना । जब हम कृतज्ञता महसूस करने लगते है तब हमारे भीतर द्वेष, ईर्ष्या और दुखो का नाश होने लगता है। हमारे जिवन में चमत्कार की बाढ़ सी आने लगती है। आप चाहे किसी भी रूप में इश्वर के प्रति कृतज्ञता महसूस करे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप किस धर्म के अनुयायी हैं या आप धार्मिक हैं भी या नहीं। ये विज्ञान और सृष्टि के एक मूलभूत नियम को बता रहे हैं। यदि आप पूजा पाठ भजन कीर्तन यज्ञ आदि में कृतज्ञता श्रद्धा महसूस नही करते तो वो पूजा पाठ यज्ञ आदि व्यर्थ हो जायेगी । भारत में अनेकों ऐसे संत ऋषि मुनि या स्वयं इश्वर अवतार लिए इन सभी ने अपने समय के लोगों की समझ के अनुसार कृतज्ञता होना सिखाया था संत कबीर, गुरु नानक, संत रविदास, भक्त प्रह्लाद इन सभी ने कृतज्ञतापूर्वक भक्ति के बदौलत ऊंचे शिखर को प्राप्त हुए हैं जब आप प्रार्थना करते हैं तब आपका ध्यान या श्रद्धा ईश्वर के प्रति न हो तब वो प्रार्थना व्यर्थ हो जाती है।*


*भगवद्गीता में अर्जुन की कृतज्ञता पूर्वक भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हे गीता ज्ञान दिया और असंभव कार्य को संभव कर दिए। ब्रम्हा जी ने पहले आदि शक्ति भगवती माता के प्रति कृतज्ञता पूर्वक ध्यान किया तभी उन्होने सृष्टि रचना करने की शक्ति मिली और वो सृष्टि रचना करने में सफल हुए। सच्ची श्रद्धा से स्तुति भक्ति ईश्वर के प्रति माता पिता वाली भाव रखना ये सब कृतज्ञता का ही स्वरूप है। कृतज्ञता भी उतना सटीकता से कार्य करती है जितना गुरुत्वाकर्षण का नियम सटीकता से कार्य करता है।*


"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"


"सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।"


इन्हीं मंगलकामनओं के साथ आपका दिन मंगलमय हो


*आप देख सकते है मंत्र में पूरी दुनियां के लोगों के लिए कृतज्ञता व्यक्त की गई है। आप जितना दूसरो के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे। उतना ही दूसरे के साथ आपको दुगुनी रूप में आरोग्य, सुख समृद्धि और सुंदर भाग्य मिलता है।*


*यह सृष्टि का नियम है*


*कृतज्ञता सृष्टि के एक नियम के ज़रिए कार्य करती है, जो आपके समूचे जीवन को संचालित करता है। कृतज्ञता का नियम हमारी सृष्टि में एक अणु से लेकर ग्रहों की गतियों तक सारी ऊर्जा को शासित करता है और इस नियम के अनुसार, "समान ही समान को आकर्षित करता है। " यह सृष्टि का नियम ही है, जिसकी बदौलत हर जीवित प्राणी की कोशिकाएँ एक साथ जुड़ी रहती हैं, जिसकी बदौलत हर भौतिक वस्तु का रूप कायम है। आपके जीवन में यह नियम आपके विचारों और भावनाओं पर कार्य करता है, क्योंकि आप भी ऊर्जा ही हैं और आप जैसा भी सोचते हैं, जैसा भी महसूस करते हैं, वैसा ही परिस्थितियों घटनाओं को अपनी ओर खींचते हैं।*


*यदि आप सोचते हैं, "मैं अपनी नौकरी को पसंद नहीं करता," "मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है,*


*"मुझे आदर्श जीवनसाथी नहीं मिल सकता," "मैं अपने बिल नहीं चुका सकता," "मैं सोचता हूँ*


*कि मुझे कोई रोग हो रहा है," "वह मेरी क़द्र नहीं करती," "मेरी अपने माता-पिता के साथ पटरी*


*नहीं बैठती," "मेरा बच्चा बहुत बड़ी समस्या है," "मेरा जीवन अस्तव्यस्त हो गया है, " या "मेरा*


*वैवाहिक जीवन संकट में है, " तो आप अपनी ओर ऐसे ही अधिक अनुभवों को आकर्षित करेंगे।*


*लेकिन यदि आप उन चीज़ों के बारे में सोचते हैं, जिनके लिए आप कृतज्ञ हैं, जैसे "में अपनी नौकरी से प्रेम करता हूँ," "मेरा परिवार बहुत मददगार है," "मेरी छुट्टियाँ बेहतरीन रहीं," "मैं आज गज़ब का अनुभव कर रहा हूँ" "मुझे अब तक का सबसे बड़ा टैक्स रिफंड मिला है, " या " बेटे के साथ कैंपिंग करने में मेरा वीकएंड बेहतरीन गुज़रा," और आप सचमुच कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो का नियम कहता है कि आपको जीवन में ऐसी ही अधिक चीजें मिलेंगी। यह कुछ उसी तरह काम करता है, जिस तरह धातु चुंबक की ओर खिंचती है; आपकी कृतज्ञता चुंबकीय है, और आपके पास जितनी अधिक कृतज्ञता होती है, आप चुंबक की तरह उतनी ही अधिक समृद्धि को अपनी ओर आने की संभावना को बढ़ा लेते हैं। यह सृष्टि का नियम है!*


*आपने इस तरह की कहावतें सुनी होंगी, “जो भी जाता है, लौटकर आता है," "आप जो बोते हैं, वही काटते हैं, " और "आप जो देते हैं, वही पाते हैं।" देखिए, ये सारी कहावतें उसी नियम का वर्णन कर रही हैं। ये सृष्टि के उस सिद्धांत का वर्णन भी कर रही हैं, जिसे महान वैज्ञानिक सर आइज़ैक न्यूटन ने खोजा था।*


*न्यूटन की वैज्ञानिक खोजों में सृष्टि में गति के मूलभूत नियम शामिल थे, जिनमें से एक यह है : हर क्रिया की हमेशा विपरीत और समान प्रतिक्रिया होती है।*


*जब आप कृतज्ञता के विचार को न्यूटन के नियम पर लागू करते हैं, तो यह इस प्रकार होता है। धन्यवाद देने की हर क्रिया हमेशा पाने की विपरीत प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, यानी कि आप पाते हैं। और आप जो पाते हैं, वह हमेशा आपके द्वारा दी गई कृतज्ञता की मात्रा के समान होगा। इसका अर्थ है कि कृतज्ञता की क्रिया पाने की प्रतिक्रिया को शुरू कर देती है! और आप जितनी ईमानदारी और गहराई से कृतज्ञता महसूस करते हैं (दूसरे शब्दों में, जितनी अधिक कृतज्ञता देते हैं), आप उतना ही अधिक पाएँगे।*


प्रति दिन कृतज्ञता के महत्व को आवश्य पढ़े इसमें ऐसी शक्ति छुपी है जिसका अनुसरण करने पर आप चौक जायेंगे आपके भीतर इतनी बड़ी शक्ति है। जिसका उपयोग आप अपने विरुद्ध भी करते हैं और अपने कल्याण के लिए करते हैं इसलिए भगवान कृष्ण भगवद्गीता अ०6 श्लोक 5 में कहते हैं  


" अपने द्वारा अपना संसार समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।।5।।


इस श्लोक का अर्थ अनंत है संसार भर के विद्वान अपने अपने समझ के अनुसार इस श्लोक का अर्थ समझते हैं। फिर भी मुझ जैसा तुच्छ बालक जो कुछ समझा आप से साझा किया


परमात्मा हमे हर प्राकृतिक वस्तु मुफ्त प्रदान करते हैं । इसलिए हमारा कर्त्तव्य है उनके प्रति हर छोटी से छोटी चीजों के लिए प्रेम पूर्वक श्रद्धा पूर्वक धन्यवाद करें। शिकायत कभी न करें। तभी हम अपनें शक्तियों का सही उपयोग कर पाएंगे। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 22 में खुद आप से वादा कर रहें है जो उनके चिन्तन में प्रेम पूर्वक कृतज्ञता पूर्वक डूबा रहता है उनका योगक्षेम वो स्वयं वहन करते हैं । 


*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते ।*

*तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।22।।*


जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का योग क्षेम में स्वयं प्राप्त कर देता हूँ ।।22।।


ये शरीर जहाज है इस जहाज का चालक हमारा मन है । जब हमारा मन भगवान कृष्ण के प्रति कृतज्ञता महसुश करने लगता है तब इस शरीर रुपी जहाज के चालक स्वयं श्री कृष्ण से मार्गदर्शन पा कर इस भवसागर रुपी संसार से पार कर जाता है। इस दुनिया में आप और आपका परमात्मा है। तीसरा कोई नही है। आप जितना ज्यादा परमात्मा के प्रति कृतज्ञता होंगे उतनी ही तेजी से अपने जीवन में चमत्कार पाएंगे आप चौक जायेंगे। 


आप बिना कृतज्ञता के अपने अभिमान , द्वेष, ईर्ष्या, प्रमाद, आलस्य आदि को नाश नही कर सकते आप बिना कृतज्ञता के कुछ पा नही सकते। बिना कृतज्ञता का कोई पूजा पाठ यज्ञ भजन कीर्तन सफल नही होता। 



– राहुल झा 

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

श्रीमद्भगवद्गीता : अथ प्रथमोऽध्याय


 *🕉श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक स्वाध्याय 🕉*

         *🌹!श्री हरि!🌹*


  *🙏ॐ परमात्मने नमः🙏*


अथ प्रथमोऽध्यायः-


अर्जुनविषादयोग

दोनों सेनाओं के प्रधान शूरवीरों और अन्य महान वीरों का वर्णन


धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1-1॥


dhṛtarāṣṭra uvāca

dharmakṣētrē kurukṣētrē samavētā yuyutsavaḥ.

māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya৷৷1.1৷৷


समवेता: = इकट्ठे हुए; युयुत्सव: = युद्ध की इच्छा रखने वाले; मामका: = मेरे; च = और; पाण्डवा: = पाण्डु के पुत्रों ने; किम् = क्या; अकुर्वत = किया


धृतराष्ट्र[1]बोले-


हे संजय[2] ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र[3] में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु[4] के पुत्रों ने क्या किया ? ।।1:1।।


Dhratrastra said:


Sanjaya, gathered on the sacred soil of kuruksetra, eager to fight, what did my children and the children of pandu do?(1:1)


संजय उवाच

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥1-2।।


sañjaya uvāca

dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṅ vyūḍhaṅ duryōdhanastadā.

ācāryamupasaṅgamya rājā vacanamabravīt৷৷1.2৷৷


तदा = उस समय; दुर्योंधन: = दुर्योधन ने; व्यूढम् = व्यूहरचनायुक्त; पाण्डवानीकम् = पाण्डवों की सेना को; द्रष्टा= देखकर; तु = और; आचार्यम् = द्रोणाचार्य के; उपसंगम्य = पास जाकर (यह); अब्रवीत् = कहा;


उस समय राजा दुर्योधन[3] ने व्यूह रचनायुक्त पांडवों [4] की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य[5]के पास जाकर यह वचन कहा ।।2।।


Sanjaya said:


O King, after looking over the army gathered by the sons of Pandu, King Duryodhana went to his teacher and began to speak the following words: (2)


पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥


paśyaitāṅ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṅ camūm.

vyūḍhāṅ drupadaputrēṇa tava śiṣyēṇa dhīmatā৷৷1.3৷৷


तब = आपके; धीमता= बुद्धिमान्; शिष्येण = शिष्य; द्रुपदपुत्रेण = द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा; व्यूढाम् = व्यूहाकार खड़ी की हुई; पाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डुपुत्रों की; एताम् = इस; महतीत् = बड़ी भारी; चमूम् = सेना को; पश्य = देखिये


हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद[3] पुत्र धृष्टद्युम्न[4] द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डु[5]पुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये ।।3।।


Behold, master, the mighty army of the sons of Pandu arrayed for battle by your talented pupil, Dhristadyumna, son of Drupada.(3)


अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: ।।4।।

धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् ।

पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगव: ।।5।।

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: ।।6।।


atra śūrā mahēṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi.

yuyudhānō virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ৷৷1.4৷৷

dhṛṣṭakētuścēkitānaḥ kāśirājaśca vīryavān.

purujitkuntibhōjaśca śaibyaśca narapuṅgavaḥ৷৷1.5৷৷

yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān.

saubhadrō draupadēyāśca sarva ēva mahārathāḥ৷৷1.6৷৷


अत्र = इस (सेना) में; महेष्वासा: = बड़े बड़े धनुषों वाले; युधि = युद्ध में; भीमार्जुनसमा: = भीम और अर्जुन के समान; शूरा: = बहुत से शूरवीर; (सन्ति) = हैं (जैसे); युयुधान: = सात्यकि; द्रुपद: = राजा द्रुपद; (4) धृष्टकेतु: = धृष्टकेतु; चेकितान: = चेकितान; वीर्यवान् = बलवान्; कशिराज: = काशिराज; पुरूजित् =पुरूजित्; कुन्तिभोज: = कुन्तिभोज; च = और; नरपुड़व = मनुष्यों में श्रेष्ठ; शैब्य: = शैब्य;(5) विक्रान्त: = पराक्रमी; युधामन्यु: = युधामन्यु; वीर्यवान् = बलवान्; उत्तमौजा: = उत्तमौजा; सौभद्र: = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु; द्रौपदेया: = द्रौपदी के पांचो पुत्र (यह); सर्वे =सब; महारथा: = महारथी हैं;(6)


इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम[4] और अर्जुन[5] के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद[6], धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रा[7] पुत्र अभिमन्यु[8] एवं द्रौपदी[9] के पाँचों पुत्र महारथी हैं ।।4-5-6।।


There are in this army heroes wielding mighty bows and equal in military prowess to Bhima and Arjuna-Satyaki and Virat and the maharathi(warrior chief) Drupada; Dhrstaketu,Chekitana and the valiant king of Kasi, and Purujit, Kuntibhoja, and Saivya, the best of men and mighty Yudhamanyu, and valiant Uttamauja, Abhimanyu, the son of Subhadra, and the five sons of Draupadi,-all of them maharathis (warrior chiefs). (4,5,6)


*【शेष क्रमशः कल】*


अधिकांश हिन्दू तथाकथित व्यस्तता और

समयाभाव के कारण हम सब सनातनियों

के लिए परम पूज्यनीय 

श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय करना छोड़

चुके हैं, इसलिए प्रतिदिन *गीता* जी के कुछ 

*श्लोकों को* उनके *हिंदी*/इंग्लिश अर्थ सहित पोस्ट

कर 

सम्पूर्ण *गीता* जी का स्वाध्याय कराने का

यह प्रण लिया गया है . आप सभी भी गीता जी के 

 श्लोको को प्रतिदिन* पढ़ने व *पढ़वाने* और अर्जुन की भांति ज्ञान का अनुशरण करने का

*संकल्प लें lllll*


🛕🕉⚜️🌷🗡️🚩🔱🐚⚔🇮🇳


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शनिवार, 3 सितंबर 2022

चिन्तन का विषय:– चिन्तन करे और अपने सपने को पूरा करे ।

🌷श्री हरि 🌷 🔱 ॐ नमः शिवाय 🔱🚩 जय श्री राम🚩

 जो जिस जिस भाव का चिंतन ( स्मरण) करता है वो उस उस फल को प्राप्त होता है। एक भगवदभक्त इसलिए श्री भगवान को प्राप्त होता है। क्योंकि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा भगवान का स्मरण किया। एक ईश्वर (शिव)भक्त ईश्वर को इसलिए प्राप्त होता है क्योंकि उसने शिव को याद किया। एक गरीब लड़का बड़ा होकर समाज का सबसे सफल व्यक्ति बनता है क्योंकि उसने जीवन में सबसे ज्यादा सफल होने के दृश्य का चिंतन किया । एक रोगी इसलिए स्वस्थ हुआ क्योंकि उसने स्वस्थ होने के दृश्य का चिंतन किया। एक सीधा बालक आगे जाकर अपराधी बन गया क्योंकि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा अपराधी विचार या अपराधियों का चिंतन किया। हम हमेसा चिंतन करते है चाहे वो किसी भी मामले में हो हमारा पहला कर्म चिंतन करने से सुरु होता है उसके फल स्वरूप हम वैसे फल को प्राप्त करते हैं। इसलिए हमे विपरित परिस्थितियों में भी अपने मनचाही सपने के दृश्य का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे ऐसे मनचाही सपने का चिन्तन करना चाहिए जिससे किसी का नुकसान न हो नही तो सबसे पहले हमे नुकसान होगा । हमे हमेशा प्रभु के चरण का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा प्रभु के नाम का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा प्रभु से मिलने वाले दृश्य का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा शान्ति, आनंद,सुख –समृद्धि और प्रभु भक्ति का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा सफलता का चिन्तन करते रहना चाहिए। 

 — राहुल झा 

 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। 
 कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। 

 अर्थ: कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है। 

 बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। 

 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 
 मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।। 

 अर्थ: हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। 

 इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

 य यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
 तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।।6।। 

 हे कुन्ती[1] पुत्र अर्जुन[2] ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता हैं; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।।8.6।।

 यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः। 
 भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।9.25।। देवताओं को पूजने वाले देवताओ को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।इसीलिये मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता ।।25।। 
 
– श्रीमद्भागवतगीता

गुरुवार, 23 जून 2022

किसी भी दुःख विपत्ती से मुक्ति कैसे पाए.

भगवाद्गीता 

*तातपर्य*

*श्लोक ५-१०*


आपकी दृष्टि जहाँ तक जा रही है या जहाँ तक नहीं भी जा रही है वहाँ तक परमत्मा ही परमत्मा है उसके शिवाय यहाँ कुछ नहीं है जिस प्रकार एक सूर्य की प्रकाश से अनेको रंग दीखते है उसी प्रकार से यहाँ परमत्मा भिन्न भिन्न रूपों में विराजमान है जिस प्रकार दूध से घी दही मिठाई छाछ लस्सी बनते है इन सभी में दूध का ही अंश होता है उसी प्रकार से परमत्मा से ही ये समस्त जगत बना है अर्थात परमत्मा अपने एक अंश मात्र में धारण किए हुए है जिस प्रकार मकड़ी से उसके जाल निकलते है फिर वही जाल को मकड़ी अपने भीतर समा लेती है उसी प्रकार भगवती मूल प्राकर्तिक अर्थात परमत्मा से ये समस्त जगत प्रकट होते है और फिर उसी में विलीन हो जाते हैं


*हम यहाँ क्यों आते है*

हम जीव शरीर धारण क्यों करते हैं


जिस प्रकार बच्चे अपने उम्र के अनुसार विद्यालय शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं उसी प्रकार हम अज्ञानी जीव यहाँ स्वयं और परमात्मा के विषय में अध्यात्म ज्ञान प्राप्ति के लिए आते हैं अगर इस जन्म में ज्ञान की प्राप्ति या परमत्मा की भक्ति नहीं हुई तों ये जीवन व्यर्थ हैं अनुभव के आधार पर और कुछ नहीं कहूंगा आप सिर्फ इतना विश्वास रखो यहाँ वहाँ दाया बाया ऊपर निचे जहाँ देखो वहाँ परमत्मा ही परमत्मा हैं उसके शिवाय कुछ नहीं हैं यहाँ हमें अज्ञानता की माया ने हमें अंधा बना दिया हैं जिसके कारण परमत्मा को नहीं देख पाते हैं जिस प्रकार एक वृक्ष का अस्तित्व जड़ से पत्ती तक होता हैं उसी प्रकार परमत्मा का अस्तित्व अनंत ब्रह्माण्ड में हैं उसके शिवाय और कुछ नहीं हैं।


जिस प्रकार एक गुलाब के पौधे से कांटे  और फूल उतपन्न होते हैं उसी प्रकार एक परमत्मा से देव- असुर, अच्छे -बुरे लोग उतपन्न होते हैं उसी प्रकार एक माँ से असुर और देव प्रकृति के संतान उतपन्न होते हैं। इन दोनों में परमत्मा का ही अंश हैं माया के द्वारा जिसका ज्ञान नेत्र अंधा हो गया वो स्वयं को या परमत्मा को नहीं जानता हैं इसलिए वो अच्छे बुरे कर्मो में भेद नहीं कर पाते हैं


इन्द्रियों के विषय में आप कितना ही विषयी हो आप उस पर ध्यान मत दो आप सिर्फ अपने आस पास परमत्मा के अनंत रूपों पर ध्यान दो आप अपने हृदय सिर्फ  इतना ही धारण कर लो " मैं परम् ब्रम्ह परमत्मा माँ काली -दुर्गे, माँ राधेकृष्ण माँ गौरीशंकर माँ सीताराम, माँ सरस्वती - ब्रम्हा जी का प्रिय संतान हूँ और ये सब मुझ पवित्र आत्मा के माता पिता जी हैं 

आप कितना ही इन्द्रियों के विषयी हो आपका नाश नहीं हो सकता हैं।


हम करोड़ो जन्मों से भटक रहे हैं अज्ञानता के कारण....

हमारी इन्द्रियों ने यहाँ फसा रखा हैं हमारी व्यर्थ इक्षाओं ने यहाँ फसा रखा हैं जबकि आप स्वयं सब कुछ से परिपूर्ण आत्मा हो आप सब कुछ पा सकते हो


बस आवश्यकता हैं तों सिर्फ इतना की आप दुःख सुख नाकारत्मक ऊंच नीच गरीब अमीर को समान समझने की... समझने की आवशयकता इतनी हैं की आपके किसी विषय पर केंद्रित ध्यान से प्रवाह होने वाली ऊर्जा का सही उपयोग करने की... अगर आप दुःख पर ध्यान देते हैं तों वो और बढ़ेगा जिससे आप स्वयं परेशान होकर सुखी होने के लिए वहाँ से ध्यान हटा कर मन बहलाने की कोसिस करते हो, अगर आप सुख पर सिर्फ ध्यान देते हो तों वो और बढ़ता जाता हैं उसमे आपके केंद्रित ध्यान से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा ही हैं ज़ो सुख दुःख वाली घटना को निर्माण करता हैं


अब आप सुख दुख धन दौलत शांति अशांति पर ध्यान देते कैसे हो 

अगला व्यख्यान इस लिंक पर है


https://rahuljha014797.blogspot.com/2022/06/blog-post.html?m=1

 तब तक के लिए आज आपको अपने ऊर्जा का सही उपयोग करने का मार्ग बताने का प्रयास करूंगा।


जैसा की आप जानते हैं परमत्मा सर्व व्याप्त हैं और आपके भीतर आत्मा उन्ही का अंश है 


आँख बंद करें हाथ पाव मोड़ कर बैठ जाए पीठ सीधी या ढीली कर ले हाथ पाँव भी ढीली कर ले घरी का समय देख ले ५ -१० मिनट सिर्फ अपने साँसो पर ध्यान केंद्रित कीजिये , सांस को अपने अनुसार चलने दीजिये आप सिर्फ अपने सांस पर ध्यान केंद्रित कीजिए और उस प्राण वायु को परमत्मा का स्वरुप समझ कर ग्रहण करें। किसी विचारो पर ध्यान मत दीजिए आपनी ऊर्जा व्यर्थ के विचारो पर बर्बाद न करें आप सिर्फ चल रहे शांसे पर ध्यान दे शांति महसूस कीजिए


१० मिनट के बाद आप कहने के साथ दिमाग़ में तस्वीर देखिए " मैं परमत्मा का प्रिय पुत्र हूँ मुझ में परमत्मा का प्रेम भक्ति और प्रेम शक्ति समा रही हैं मैं आत्म शांति को इसी समय प्राप्त कर रहा हूँ मैं परमत्मा के चरणों में मस्तक झुक कर प्रणाम और धन्यवाद करता हूँ अपनी प्रेम भावनाओ को बढ़ने दे।


मेरे और भगवत भक्तो के सभी विघ्न को भगवान गणेश नाश कर रहे हैं मैं उनके चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ


मेरे और भगवत भक्त के भीतर माँ दुर्गा और माँ काली सभी दुर्गनो का नाश कर धर्म की स्थापना कर रही हैं मेरे और भगवत भक्तो के दुष्ट शत्रु को नाश कर रही हैं मैं माता दुर्गा और माता काली के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद कर रहा हूँ।


मुझे और सृस्टि के सभी ज्ञानियों को माता सरस्वती के कृपा से ज्ञान प्राप्त हो रहा हैं मैं माता सरस्वती और ब्रम्हा जी के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ 


मुझे और भगवत भक्तो को माता लक्ष्मी धन सम्पदा सुख समृद्धि शांति इसी समय प्रदान कर रही हैं मैं माता लक्ष्मी और श्री हरि के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ।


मुझे और भगवत भक्तो को माता पार्वती इसी समय जन्म मृत्यु से मुक्त कर रही हैं मैं माता पार्वती और महादेव के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद करता हूँ।


इस व्यख्यान को ध्यान में 9 बार दोहराए। रात्रि को शीघ्र सोए ब्रम्ह मुहूर्त तीन बजे जागकर शौच आदि होकर मुँह पर पानी मारे हो सके तों स्नान कर ले फिर ध्यान में बैठे। 

आप ध्यान कभी भी कर सकते हैं कही भी कर सकते हैं किसी समय में कर सकते हैं किन्तु अपने शरीर और मन को किसी मंदिर  की भांति पवित्रता बनाए रखे। ध्यान करने से पहले मुँह हाथ पाँव अवश्य धोए ।


ये ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण हैं आप इसे अपने हृदय में धारण कर ले


ऊर्जा के सही उपयोग के विषय में आपको ध्यान के दौरान ज़ो कहने के लिए बताया हूँ वो आप प्रत्येक दिन नियमित रूप से प्रातः काल और रात्रि में सोते समय अवश्य कहे।


जिस प्रकार एक मरीज को दवा नियमित रूप से दिया जाता हैं और वो नियमित रूप से दवा लेने के बाद स्वस्थ हो जाता हैं उसी प्रकार नियमित रूप से अपने ऊर्जा का सही उपयोग करने के लिए ध्यान के दौरान कहे।


जिस प्रकार मरीज को सही समय पर इलाज नहीं मिलता और बहुत देर हो जाती हैं फिर दवा मिल भी जाए तों असर नहीं करता उसी प्रकार देर न करें मानव शरीर बहुत दुर्लभ हैं उसमे भी ब्रह्मण शरीर बहुत दुर्लभ हैं इसलिए अपने जीवन को व्यर्थ के दुःख में न कटने दे अपने आप को दुःख भरी संसार में फिर से न गिड़ने दे ।


आप सभी भगवत भक्तो और आपके भीतर आत्मा राम के चरणों में प्रणाम 🙏❤️


🚩धर्म की जय हो🚩

🚩अधर्म का नाश हो🚩

🚩गौ माता की रक्षा हो🚩

🚩विश्व का कल्याण🚩


🙏❤️जय श्री सीता राम ❤️🙏


🚩जय श्री राम 🚩


- rahul jha

बुधवार, 8 जून 2022

हमें सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत क्यों मिलता हैं?

जय श्री राम 🚩🙏श्रीराम भक्त 🙏🚩

  आप सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत पर ध्यान कैसे दे रहे हो*

आप आज ज़ो कुछ हैं वो पिछले विचारो का परिणाम है - महत्मा बुद्ध किसी भी कर्म की शुरुआत एक *विचार* से सुरु होती है आधुनिक विज्ञान के अनुसार हमारे दिमाग़ मे प्रत्येक दिन अधिकतम 72000 विचार आते हैं दिमाग़ मे विचार आना तभी बंद होता है जब आप नींद की गोद मे चले जाते हैं 72000 विचारो मे से हम कुछ ही विचारो पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिससे प्रेरित होकर दैनिक कार्य या कोई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं.... आप भोजन करने से पहले भोजन के बारे मे सोचते हैं, सुबह मे आप जब न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं तब आप समाचार को पढ़ने के साथ समाचार से संबंधित मानसिक चित्र देख रहे होते हैं आप सोने से पहले सोने के बारे मे सोचते हैं आप कोई भी कार्य करने से अवश्य सोचते हैं। किसी से बात करते हैं तब आप पहले सोचते हैं फिर बोलते हैं। जागृत अवस्था मे आपके दिमाग़ मे हमेसा विचार चलता हैं आप हर पल हर क्षण नकरात्मक सोच रहे होते हैं या सकारात्मक सोच रहे होते हैं आपके इक्षा अनुसार जीवन चल रहा है तों आप सुखी होते हैं यदि आपके इक्षा के विरुद्ध जीवन चल रहा है तों दुखी होते हैं एक छोटा सा उदाहरण देकर समझाना चाहूंगा एक व्यक्ति पैसा इसलिए कामाना चाहता है क्योंकि वो जीवन मे सुख शांति चाहता है। अक्सर लोग अपने युवा अवस्था मे सोचते हैं

*"मैं असफल नहीं होना चाहता हूँ।"*

 *मुझे जीवन मे धन का आभाव न हो*

 *मैं जीवन मे दुःखी नहीं रहना चाहता हूँ*

*मैं निचे दर्जे का नौकरी नहीं करना चाहता*

वो जब ऐसा सोचते हैं तभी फिसल जाते हैं, उन्हें पता नहीं होता है वो अपनी ऊर्जा को बुरे भविष्य के रूप मे रूपत्रण कर रहे होते हैं क्योंकि उनका ध्यान सिर्फ असफलता, आभाव और दुःख पर केंद्रित है। हमारा दिमाग अच्छे बुरे मे भेद नहीं करता है इसलिए जिस विचार पर आपका ध्यान केंद्रित होता है आपकी ऊर्जा उसी रूप मे रूपत्रण हो रही होती है, उनके अंदर शंका, असफलता का डर बैठा है तभी वो असफल नहीं होना चाहते हैं। इसलिए वो जीवन अच्छी नौकरी करने के बाद भी सुखी नहीं है धन दौलत होने के बाद भी उसका भोग नहीं कर पाते है खाने के लिए अच्छे स्वादिस्ट भोजन तों है पर डॉक्टर ने परहेज से रहने को कहा है सोने के लिए सोफे तों हैं पर डॉक्टर ने पतले बिस्तर पर सोने को कहा है सफलता का अर्थ हैं सफल जीवन पूर्ण सुख शांति हमने अधिकतर लोगो को देखा हैं वो लाख पैसे कमा लेते हैं किन्तु वो अपने जीवन कही न कही अशांति, बैचेनी, तनाव महसूस करते हैं। मैं ये नहीं कहता पैसा धन दौलत बुरा हैं, धन दौलत एकमात्र अमीरी का हिस्सा हैं किन्तु वो अमीरी नहीं ज़ो सुख शांति की अमीरी होती हैं। आपका ध्यान सिर्फ सफलता होना चाहिए उदाहरण देकर समझाता हूँ
"*मैं जीवन मे भरपूर सफल होना चाहता हूँ* "

*मैं जीवन मे भरपूर धन दौलत और उसका भोग चाहता हूँ*

 *मैं उच्च पद वाली नौकरी करना चाहता हूँ।*
जब आप इन जैसे वाक्यों का प्रयोग करते हैं तों आप सही रास्ते पर हैं। आप सिर्फ इन तीन वाक्यों को सुबह शाम रात्रि को सोते समय कहे और अपने इन्द्रियों को महसूस कराये अर्थात आप महसूस करें आपकी ऊर्जा अच्छे भविष्य के रूप मे रूपत्रण होने लगेगी और आप १०१% सकारात्मक जीवन जियेंगे और एक सफल व्यक्ति के रूप मे देखे जायेंगे। अगर आप बीमार हैं तों बीमारी पर ध्यान न दे बल्कि आप सिर्फ स्वस्थ होने पर ध्यान दे जिस दिन आप स्वस्थ थे उन पलो को याद करें आप स्वयं के स्वस्थ होने का महसूस करें और कहे " मैं पहले अच्छी स्वस्थ पा रहा हूँ परमत्मा को धन्यवाद और उनके चरणों मे हृदय से प्रणाम करता हूँ आप दवा ले या न ले उससे कोई फर्क नहीं पड़ता आपके बीमारी की इलाज आपके दिमाग़ मे हैं जब लगे दवा की अवश्यकता है आपको दवा पर ही पूर्ण विस्वास है तों आपको दवा अवश्य लेना चाहिए। हमने कोरोना काल मे कई ऐसे पेसेंट को देखा है ज़ो करोना संक्रमित हो चुके थे किंतु उन्हें पता नहीं था और वो स्वस्थ भी हो गए। अगर आप किसी बात को लेकर चिंतित हैं तों आप सिर्फ समाधान पर ध्यान केंद्रित करें और कहे " मेरे अनंत बुद्धिमता मेरे दिमाग की क्षमता के पास हर परेशानी का समाधान है वो हमें समाधान का मार्ग दिखाए। जैसे आप किसी व्यक्ति से विचार विमर्श मांगते हैं वैसे अपने अंतर आत्मा से समाधान की मांग करें ऐसा तब तक करें जब तक आपको समाधान न मिल जाए। आपको परेशानी का समाधान किसी व्यक्ति के द्वारा मिल सकता है किसी बच्चो के द्वारा मिल सकता है आप स्वयं समाधान की ओर खींचे चले जायेगे आपको पता भी नहीं चलेगा क्योंकि वो परमत्मा सर्व व्याप्त है वो हर क्षण हमारी सहायता करने के लिए तैयार बैठे हैं किन्तु हम स्वयं अपनी ऊर्जा को अनजाने मे संकट बना लेते हैं अगर आपके पास धन नहीं है तों सिर्फ धन पर ध्यान केंद्रित करें और कहे मेरे पास आत्मिक खजाना है मेरे पास दूसरे को देने के लिए दुसरो की सेवा के लिए स्वयं की सहायता के लिए धन प्रवाह हो रहा है और ऐसा ५ मिनटों तक महसूस करें शंका न करें नहीं तों यही शंका आपके राह मे और शंका को उतपन्न करेगा दैनिक जीवन मे ईश्वर से प्रार्थना को सामील कीजिये प्रार्थना एक सकारात्मक प्रक्रिया है।

 इंसान जैसा सोचता है वैसा बन जाता है - श्री कृष्ण

सृस्टि मे सब कुछ पहले से निर्माण कर दिया गया है बस अवस्य्क्ता है तों केवल मनुष्य के कल्पना मात्र की है - श्री मदभगवद महापुराण
आप जीवन को जितना कठिन समझते हैं ये उतना ही आसान है जब आप अपनी ऊर्जा का उपयोग सही रूप से करना समझ जायेंगे तब। मैं अपना एक अनुभव आप से साझा करना चाहूंगा। बचपन के ४ वर्ष की आयु मे तंत्र मंन्त्र के शक्तियों और धोखे से भोजन मे विष मिलाकर अन्य लोगो द्वारा मुझे खिलाया गया था अचानक तबियत बिगड गयी मेरी हालत सीरयस हो चुकी थी मेरे पिता जी को सुचना गयी पर वो मजबूर थे उन्हें सुचना सुन कर दुःख भी हुआ किन्तु जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता तब तक वापस नहीं लौट सकते थे वो धर्मयज्ञ (महायज्ञ ) मे गए हुए थे उस यज्ञ के नियम अनुसार कुछ भी हो जाए साधक को उठना नहीं है चाहिए स्वयं के पुत्र पत्नी माता पिता की मृत्यु ही क्यों न हो जाए। किसी डॉक्टर ने रेफर कर दिया तों किसी डॉक्टर ने माँ को जवाब दे दिया अब ये जीवित नहीं रहेगा बहुत देर हो चुकी है कोई भी डॉक्टर इस बच्चे बचाने मे सक्षम नहीं है मेरी माँ अब हार चुकी थी अब कोई रास्ता नहीं बचा था अचानक उसने आँशु पोछते हुए अपने निराशा को ऐसा अटूट विस्वास मे बदल लिया जैसे मुझ पर किसी विष का प्रभाव हुआ ही नहीं उसने मुझे घर लाकर सुला दिया अब मेरी के माँ पास मुझे बचाने का एक ही उपाय था वो था प्रार्थना अब वो डॉक्टर की बातो को दिमाग से बाहर निकाल कर पूरी विश्वास के साथ अपने इष्ट से प्रार्थना करने लगी और उनका धन्यवाद करना सुरु कर दिया मानो ईश्वर ने मुझे बचा लिया। मैं वर्तमान मे जीवित हूँ आगे भी रहूंगा उसने बार बार इस विचार के साथ प्रार्थना और धन्यवाद रूपी भावना देकर अपने विश्वास की ऊर्जा क काफी बढ़ा लिया था उसने कल्पना करना सुरु किया जब तक वो जीवित रहेगी तब तक वो मुझे पूर्ण स्वस्थ रूप मे मुझे देख पाएगी। उसने ईश्वर से गहरी भावनाओ के साथ प्रार्थना करना सुरु किया. आज देखो मैं आपके सामने हूँ। इस घटना से यही सिखने को मिलता है सुख शांति धन दौलत की कमी को कभी महसूस न करें आपको इसमें से जिस चीज की अवस्य्क्ता है उस के लिए पहले ईश्वर को धन्यवाद करें। मानो आपको इसी समय मिल गया हो आपने दिमाग को विश्वास दिलाए ज़ो हम वर्तमान मे सोचते है वही हमारा भविष्य बनता है विचार वस्तु बन जाते है। परिणाम शीघ्र ही नहीं मिलते ये धीरे धीरे पेड़ पौधे की भाँती बनते है और इसमें प्रत्येक दिन धन्यवाद प्रार्थना और कृतज्ञता के खाद पानी देकर बड़ा आप ही करते हैं कर्म का फल मिलता अवश्य है। आप सोचते है तों कर्म कर रहे होते हैं आप सोते हैं तों कर्म कर रहे हैं जैसे रात को सोने का फल उत्साह स्वस्थ और नई ऊर्जा के रूप मे मिलता है वैसे ही हमारे सोचने का फल भिन्न भिन्न रूपों मे मिलता है *अगर आप अस्वस्थ है तों दूसरे के स्वस्थ को देख कर उसके स्वस्थ के लिए धन्यवाद करें* *अगर आप निर्धन हैं तों धन दौलत वाले धनी व्यक्ति के लिए ईश्वर को धन्यवाद करें* *अगर आप निःसंतान है तों दूसरे के संतान को देखकर ईश्वर को धन्यवाद करें* *आप ज़ो भी पाना चाहते है उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद करें आज भले ही आपके पास न हो जिनके पास है उस व्यक्ति के लिए धन्यवाद करें क्योंकि ईश्वर ने आपको आपकी चाही गयी वस्तु के सामान वस्तु अन्य लोगो के पास दिखाया है और बहुत जल्द आपको भी मिलेगी सिर्फ धन्यवाद ही नहीं सच्चे भवाना के साथ ध्यान को केंद्रित करने के साथ धन्यवाद करें*

*आपको किसी शिकायत से स्वयं को दूर करना है*
क्योंकि आपकी ऊर्जा आपकी कमी को निर्माण करता है जैसे - मेरे पास फ़लाने चीज नहीं है उसके पास है मैं ये नहीं कर सकता या वो मुझे करने नहीं देंगे दुःख देने वाले इन जैसे भावना से उतपन्न अपने भीतर ईर्ष्या द्वेष राग मोह आदि से मुक्त हो सकते है किन्तु आपको दूसरे के लिए धन्यवाद करना पड़ेगा दूसरे के लिए हमेसा प्रार्थना करना पड़ेगा जब आप दुसरो के लिए प्रार्थना करते तों ये हमेसा ध्यान रखे वही प्रार्थना आपकी ओर दुगुना रूप मे आशीर्वाद बनकर लौटता है
हर क्रिया की समान या विपरीत प्रतिक्रिया होती है - न्यूटन आप हमेसा आसाहयो की सहायता करें ज़ो सहायता के योग्य हो, वही निःस्वार्थ भाव से किया गया सहायता आपको दुगुनी रूप से किसी न किसी रूप मे आशीर्वाद बनकर आती है बड़ा हुआ तों क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंछी को छाया नहीं फल लागे अतिदूर - कबीर दास जिस प्रकार एक किसान अपने फ़सल तैयार होने तक धर्य रखता है उसी प्रकार आप भी अपने जीवन मे धर्य रखे धर्य खोना अर्थात अपने आप को फिर से दुःख मे धकेलना।

- राहुल झा🚩

शनिवार, 7 मई 2022

सज्जन मनुष्य को दुष्टों के साथ कैसा व्यहार करना चाहिए

🌷श्री हरि 🌷 ❤*आचार्य चाणक्य ज्ञान*❤ *अ० ७(7) श्लोक ८(8)* हस्ती अंकुशहस्तेन वाजी हस्तेन शृंगी लगुडहस्तेन खड्गहस्तेन ताड्यते । दुर्जनः || ८ || *भवार्थ* हाथी को चलाने के लिए अंकुश , घोड़े के लिए हाथ में एक चाबुक , सींग वाले बैल आदि पशु के लिए डण्डे की आवश्यकता होती है , परन्तु दृष्ट व्यक्ति सरलता से वश में नहीं आता । वह मामूली ताड़ना से भी वश में नहीं आता । उसके लिए तो हाथ में तलवार लेनी पड़ती है । चाणक्य कहते हैं कि उसे सीधे रास्ते पर लाने के लिए कभी - कभी उसकी हत्या भी कर देनी पड़ती है । यह सब कहने का अभिप्राय यह है कि दुष्ट व्यक्ति में जो बुरी आदते और स्वभाव पड़ गए हैं , उन्हें सरलता से दूर नहीं किया जा सकता । उन्हें सुधारना बहुत टेढ़ी खीर है । *अ० ७ (7)श्लोक ९(9)* तुष्यन्ति साधवः भोजने विप्रा मयूरा : परसम्पत्ती खला : घनगर्जिते । रविपत्तिषु ।। ९ ।। *भवार्थ* ब्राह्मण केवल भोजन से तृप्त हो जाते हैं और मोर बादल के गर्जने भर से सन्तुष्ट हो जाता है , संत और सज्जन व्यक्ति दूसरे की समृद्धि देखकर प्रसन्न होते हैं , परन्तु दुष्ट व्यक्ति को तो प्रसन्नता तभी होती है , जब वे किसी दूसरे को संकट में पड़ा हुआ देखते हैं । दुष्ट ब्राह्मण अपने यजमान की समृद्धि की कामना करता है । उसके बदले में केवल उसे सामान्य भोजन की इच्छा रहती है । आकाश में मेघों के घिर आने पर मयूर प्रसन्न होकर नाचने लगता है । संत लोग किसी से किसी प्रकार की अभिलाषा न करते हुए सबके लिए सुख - समृद्धि की कामना करते हैं । उसके विपरीत व्यक्ति दूसरों को संकट में पड़ा हुआ देखकर ही प्रसन्न होते हैं । अ०७(7) श्लोक १०(10) अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् । आत्मतुल्यबलं शत्रु विनयेन बलेन वा ।। १० ।। *भवार्थ* यदि शत्रु अपने से बलवान् प्रतीत होता हो तो उसे विनयपूर्वक व्यवहार करके वश में करना चाहिए । यदि दष्ट व्यक्ति से सामना पड़े तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वह स्वयं दूसरों से करता है - अर्थात् बुरे के प्रति बुरा व्यवहार उचित है । यदि उससे विनय - प्रदर्शन किया जायेगा तो उसकी उद्दण्डता और बढ़ जायेगी । वह सज्जनता को दबलता समझने लगेगा । - चाणक्य नीति ये पवित्र ज्ञान दुष्ट भावना से पीड़ित मुनष्य को कभी नही देना चाहिए । इतिहास साक्षी है मौर्य साम्राज्य के बाद जिस जिस भारतीय राजा या सम्राट दुष्टों को उसकेे भाषा के में व्यहार न करने के कारण पराजित या वीरगति को प्राप्त हुए । यहां विदेशी सम्राट का उदाहरण देता हूँ आज के मंगोलिया क्षेत्र में ..महाकाल और गोरखनाथ पन्थ का मिश्रित पन्थ को मनाने बौद्ध चंगेज खान ,हलगु खान,कुबलाई खान जैसे योद्धा ऐसे ही सिद्धान्तों अनुशरण कर पूरी दुनिया मे लगभग मुस्लिम को समाप्त कर दिए थे किन्तु उसमे एक दोष था उसने मुस्लिम महिलाओं को सही मार्ग दिखाने के बजाए उसका उपभोग कर लाखो में मुस्लिम की जनसख्या बढ़ा दिए जनसख्या बढ़ाया किन्तु उन्हीने कभी उस बच्चे को परवरिस का ख्याल नही किया जिसके कारण बचे खुचे इस्लामिक धूर्तो द्वारा मोहित कर धर्म परिवर्तन कर लिए गए ..हमारे देश मे महिलाओं को सूपनखा और माता सीता के रूप में देखा जाता है । जो सूपनखा स्वभाव की है उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए दूसरा क्षत्रपति शिवा जी महाराज पर दृष्टि डाले हारे हुए बादशाह की बेगम को लूट कर लाया गया तो उन्होंने बेगम को माता कह कर सम्बोधित किया उसे सुरक्षा के साथ हारे हुए बादशाह के पास भिजवा दिया फिर उस बेगम को लुटने वाले भोले पुरुष को डांटा ... हमे उनकी गुणों अपने अंदर उतारनी है । श्री कृष्णा ने नरकाशुर का वध किया उसके बाद नरका सुर की सभी 18000 रानियां अपने इक्षा से श्री कृष्ण की शरण मांग कर रही थी क्योकि वो सभी रानियां राम ,कृष्ण भक्त थी उसने नरकासुर से रक्षा के लिए प्रत्येक दिन श्री कृष्ण से प्रार्थना करती थी उन्होंने कभी किसी अशुरो की पत्नी पर बर्बरता नही की.. फिर चाहे 10 अवतार ही क्यो न हो । आप ऐसे गुण को अपनाएं तभी हमारे देश का भला हो पाएगा । 🙏👉Rahul Jha 🛕🐚🚩🔱⚜️⚔❤🌷🙏🏹🗡

शुक्रवार, 6 मई 2022

हिंदुस्थान का वो महान योद्धा तक्षक जिसने राजा को जिहाद से लड़ना सिखाया ।

तक्षक का दर्द और बदला तो देखो आंसू भी आएंगे और सीना चौड़ा भी हो जाएगा। सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।* एक बालक *तक्षक* के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब *तक्षक* के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। *तक्षक* और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं। *तक्षक* की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया। आठ वर्ष का बालक *तक्षक* एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया। 25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा गुर्जर प्रतिहार उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था। इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला--- *महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।* महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।" *"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"* महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। " तक्षक ने कहा- *"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"* "पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर" "राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।" महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन *तक्षक* के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा। आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक *तक्षक* के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में *तक्षक* का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था.... उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था। विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में *तक्षक* की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच *तक्षक* की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा- "आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे *तक्षक*.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।" *इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।* *तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा। पर देश का दुर्भाग्य देखो ,कोंग्रेस वामपंथीयो ने भारत भूमि के ऐसे वीर को इतिहास में जगह तक नही दी ,कैसा पाप किया इन पापियों ने।

नाम जप किस प्रकार होना चाहिए ।

प्रश्न . नाम किस प्रकार जप होना चाहिए ? जिससे हमे लाभ हो ? उत्तर:– सबसे पहले नाम जप जैसे भी हो लाभ होता ही है ... फिर भी आप जानने के इक्ष...