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जब मैं स्तुति करता हूं।
मंगलवार, 4 अप्रैल 2023
संक्षिप्त महाभारत
शनिवार, 1 अप्रैल 2023
शुक्रवार, 31 मार्च 2023
धन के लिए कृतज्ञता – अभ्यास 7
यदि आपके जीवन में धन की कमी है, तो यह बात अच्छी तरह गाँठ बाँध लें कि धन को लेकर चिंतित, ईर्ष्यालु, निराश, हताश, शंकालु या भयभीत होने से आपके पास कभी अधिक धन नहीं आएगा, क्योंकि ये भावनाएँ इस बात से उत्पन्न होती हैं कि आप अपने पास मौजूद धन के लिए कृतज्ञ नहीं हैं। धन को लेकर शिकवा-शिकायत करना, विवाद करना, कुंठित होना, किसी चीज़ की कीमत के बारे में आलोचना करना या पैसे के बारे में किसी दूसरे को बुरा महसूस कराना कृतज्ञता के काम नहीं हैं। इससे आपका आर्थिक जीवन कभी बेहतर नहीं होगा, बल्कि बदतर होता जाएगा।
चाहे आपकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, यह सोचना कि आपके पास पर्याप्त धन नहीं है, अपने पास मौजूद धन के बारे में कृतघ्न होना है। अपने जीवन में धन को चमत्कारिक ढंग से बढ़ाने के लिए आपको अपनी वर्तमान स्थिति को दिमाग से बाहर निकालना होगा और जो भी पैसा आपके पास है, उसके प्रति कृतज्ञता महसूस करनी होगी।
"जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) नहीं है, उसके पास जो है, वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"
जब आपके पास बहुत कम पैसा हो, तो उसे लेकर कृतज्ञता महसूस करना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि आपको यह बात पता हो कि जब तक आप कृतज्ञ नहीं होंगे, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा, तो आप यह काम करने के लिए प्रेरित हो जाएँगे।
धन का विषय कई लोगों के लिए पेचीदा हो सकता है, खास तौर पर तब, जब उनके पास यह पर्याप्त न हो, इसलिए रहस्यमय धन के अभ्यास के दो क़दम हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप दिन के शुरू में ही चमत्कारिक धन का पूरा अभ्यास पढ़ लें, क्योंकि तब आप धन के अभ्यास को दिन भर जारी रख पाएँगे।
बैठकर कुछ मिनट अपने बचपन के बारे में सोचें, जब आपके पास पैसा या तो था ही नहीं
फिर बहुत कम था। जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जब आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और पूरे ह्रदय से महसूस करें। क्या आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन था ?
क्या आप किसी मकान में रहते थे?
क्या आपको कई सालों तक शिक्षा मिली थी?
आप हर दिन स्कूल कैसे जाते थे? क्या आपके पास स्कूल की पुस्तकें, लंच और अन्य सभी आवश्यक चीजें थीं? बचपन में क्या आप कभी छुट्टियाँ मनाने किसी हिल स्टेशन या समुद्र तट पर गए थे?
बचपन में आपको जन्मदिन के सबसे रोमांचक उपहार कौन से मिले थे? क्या आपके पास साइकल, खिलौने या पालतू जानवर थे?
क्या आपके पास कपड़े थे, जब आपका क़द तेज़ी से बढ़ जाता था और कपड़े छोटे हो जाते थे?
क्या आप कोई फ़िल्म या मैच देखने गए थे, कोई वाद्ययंत्र सीखने गए थे या आपने अपने किसी शौक को पूरा किया था?
क्या आप स्वास्थ्य ठीक न होने पर कभी डॉक्टर के पास गए थे और दवाएँ ली थीं?
क्या आप दंतचिकित्सक के पास गए थे?
क्या आपके पास अनिवार्य सामान थे, जिनका इस्तेमाल आप हर दिन करते थे, जैसे आपका टूथब्रश, टूथपेस्ट, साबुन और शैम्पू ? क्या आप कार में यात्रा करते थे? क्या आप टेलीविज़न देखते थे, फ़ोन करते थे, बिजली और पानी का इस्तेमाल करते थे?
इन सारी चीज़ों के लिए धन की ज़रूरत थी और आपको ये सब मुफ़्त मिली थीं। बचपन और किशोरावस्था के दिनों को याद करने पर आपको अहसास होगा कि आपको कितनी सारी चीजें मिली थीं, जो मेहनत से कमाए गए पैसे से खरीदी गई थीं। हर उदाहरण और याद के लिए कृतज्ञ हों, क्योंकि जब आप अतीत में मिले धन के लिए सच्ची कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो भविष्य में आपका धन रहस्यमय तरीके से बढ़ेगा! कृतज्ञता का नियम इसकी गारंटी देता है।
चमत्कारिक धन के अभ्यास को जारी रखने के लिए एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और उस पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर यह लिखें :
उस सारे धन के लिए भगवान कृष्ण(विष्णु जी) और माता राधा जी(माता लक्ष्मी जी) को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है। जिसके कारण मेरे कई सारे काम आसान हो गए।
इसे वाक्य को कम से कम तीन बार लिखें और गहराई से माता लक्ष्मी (माता राधा जी) और भगवान विष्णु जी (भगवान कृष्ण)के प्रति कृतज्ञता (एहसानमंद) महसूस करे।
आज ही इस रहस्यमय नोट को अपने पर्स या जेब में रख लें। कम से कम एक बार सुबह और एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, इस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथों में थामें अपने लिखे हुए शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ हों। आप जितने ज्यादा ईमानदार होते हैं और इसे जितना अधिक महसूस करते हैं, आपको अपनी आर्थिक परिस्थितियों में उतना ही तीव्र चमत्कारिक परिवर्तन नज़र आएगा।
आप समय से पहले कभी नहीं जान पाएँगे कि आपका धन कैसे बढ़ेगा, लेकिन संभावना इस बात की है कि आप इस दौरान अधिक धन पाने के लिए कई परिस्थितियों में भारी बदलाव देखेंगे। आप वह धन पा सकते हैं, जिसके बारे में आपको अहसास ही नहीं था कि वह आपका था। आपको अप्रत्याशित नकद राशि या चेक मिल सकते हैं। आपको कोई चीज़ डिस्काउंट, रिबेट या कम लागत में मिल सकती है आपको सभी प्रकार की भौतिक चीजें उपहार में मिल सकती हैं, जिन्हें खरीदने में आपका पैसा खर्च होता।
आज के बाद अपना रहस्यमय नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ उस पर हर दिन आपकी नज़र पड़े, ताकि आपको जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद आती रहे। यह कभी न भूलें कि आप जितनी अधिक बार इस रहस्यमय नोट की ओर देखते हैं और मिलने वाले धन के लिए कृतज्ञता महसूस करते हैं, आप अपने आर्थिक जीवन में उतने ही अधिक चमत्कार को सक्रिय कर देते हैं। धन के लिए कृतज्ञता की प्रचुरता का अर्थ है धन की प्रचुरता !
यदि आप खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं, जहाँ आप धन संबंधी किसी चीज़ के बारे में शिकायत करने वाले हैं, चाहे यह शब्दों में हो या विचारों में, तो स्वयं से पूछें “क्या मैं इस शिकायत की कीमत चुकाना चाहता हूँ?" यह सवाल आपको इसलिए पूछना चाहिए, क्योंकि आपकी एक शिकायत भी धन के प्रवाह को धीमा कर देगी या आपके पास आने से रोक देगी।
आज ही खुद से वादा करें कि जब भी आपको कहीं से पैसा मिलेगा, चाहे यह नौकरी की तनख्वाह हो, टैक्स रिफंड या डिस्काउंट हो या किसी से उपहार में मिली चीज़ हो, जिसे खरीदने में पैसा खर्च होता, तो आप उसके लिए वाक़ई कृतज्ञ होंगे। इनमें से हर परिस्थिति का अर्थ है कि आपको धन मिला है और ऐसा हर प्रसंग आपको यह अवसर देता है कि आप हाल में मिले धन के लिए कृतज्ञ बनकर अपने धन को बढ़ाने और कई गुना करने की कृतज्ञता की रहस्यमय शक्ति का इस्तेमाल करें!
1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ और एक से तीन तक के क़दम दोहराएँ लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।
2. बैठकर कुछ मिनट तक अपने बचपन के बारे में सोचें कि आपको कितनी सारी चीजें बिना पैसे चुकाए ही मिल गई थीं।
3. जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जहाँ आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो तहेदिल से शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और महसूस करें।
4. एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और नोट पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर लिखें : उस सारे धन के लिए माता राधेकृष्ण जी को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है।
5. अपने रहस्यमय नोट को अपने साथ रखें और कम से कम एक बार सुबह तथा एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, उस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथ में थामें अपने लिखे शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ होइए।
*6. आज के बाद अपना नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ यह आपको हर दिन दिखता रहे, ताकि आपको अपने जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद रहे।*
*7. आज रात सोने से ठीक पहले अपने चाहे गए भगवान के रूपो की फ़ोटो एक हाथ में थामें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद नमस्कार या नमस्ते कहें।*
शनिवार, 15 अक्टूबर 2022
पुत्र राहुल को बुद्ध क्यों मानते थे अपने रास्ते का कांटा ?
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022
संबंध के लिए कृतज्ञता
*संबंध के लिए कृतज्ञता अभ्यास 6*
कल्पना करें कि आप इस पृथ्वी पर रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। ऐसे में आपके मन में कोई चीज़ करने की कोई इच्छा ही नहीं होगी। कोई पेंटिंग बनाने में क्या तुक है, अगर उसे कोई भी न देख सके ? किसी भी तरह के संगीत का सृजन करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसे न सुन सके? किसी भी चीज़ का आविष्कार करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसका इस्तेमाल न कर सके? एक जगह से दूसरी जगह तक जाने का कोई कारण नहीं होगा, क्योंकि आप जिस भी नई जगह जाएँगे, वह पुरानी जगह जैसी ही होगी यानी वहाँ कोई नहीं होगा। आपके जीवन में कोई खुशी या आनंद नहीं होगा।
दूसरे लोगों के साथ संपर्क और अनुभवों से आपको जीवन में ख़ुशी, अर्थ व उद्देश्य मिलता है।
इसी वजह से आपके संबंध आपके जीवन पर किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा असर डालते हैं। अपने सपनों के जीवन को साकार करने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि आपके संबंध इस वक़्त आपके जीवन पर कैसा असर डाल रहे हैं और वे कैसे कृतज्ञता के सबसे शक्तिशाली साधन बन सकते हैं तथा आपके जीवन को जादुई ढंग से बदल सकते हैं। विज्ञान अब अतीत के महान मनीषियों के ज्ञान की पुष्टि कर रहा है। शोध अध्ययन दर्शा रहे हैं कि जो लोग कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं, वे दूसरों के अधिक निकट होते हैं, परिवार तथा मित्रों से अधिक जुड़े होते हैं और दूसरे लोगों के मन में उनकी बेहतर छवि होती है। लेकिन शोध अध्ययनों में सामने आने वाला संभवतः सबसे आश्चर्यजनक आँकड़ा यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में प्रत्येक शिकायत, चाहे वह वैचारिक हो या शाब्दिक के साथ-साथ उसके बारे में दस नियामतें भी महसूस होनी चाहिए, तभी संबंध समृद्ध हो सकता हैं। हर शिकायत के बदले अगर नियामतों की संख्या दस से कम है, तो संबंध का ह्रास होने लगेगा और यदि यह वैवाहिक संबंध है, तो तलाक की नौबत भी आ सकती है।
कृतज्ञता से संबंध समृद्ध होते हैं। जब आप किसी संबंध के लिए अपनी कृतज्ञता बढ़ाते हैं, तो चाटाकारिक ढंग से आप उसमें ख़ुशी और अच्छी चीजों की प्रचुरता पाएँगे। ध्यान रहे, संबंधों के प्रति कृतज्ञता केवल आपके संबंधों को ही नहीं बदलती है; यह आपको भी बदल देती है। आपका स्वभाव इस वक़्त चाहे जैसा हो, कृतज्ञता आपको अधिक धैर्य, समझ, करुणा और दयालुता प्रदान करेगी और एक वक़्त ऐसा आएगा, जब आप खुद को पहचान भी नहीं पाएँगे। छोटी छोटी बातों पर जो चिढ़ आपने कभी महसूस की थी, वह ग़ायब हो जाएगी। संबंधों को लेकर आपके मन में जो शिकायतें थीं, वे ओझल हो जाएँगी। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि जब आप किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सचमुच कृतज्ञ होते हैं, तो आपके मन में उसकी किसी चीज़ में बदलाव करने की इच्छा नहीं होती। आप उसकी आलोचना नहीं करेंगे, उसके बारे में शिकायत नहीं करेंगे और उसे दोष नहीं देंगे, क्योंकि आप तो उसके अच्छे गुणों के बारे में कृतज्ञता महसूस करने में व्यस्त होंगे। दरअसल, आप उन चीज़ों को देख ही नहीं पाएँगे, जिनके बारे में आप
अक्सर शिकायत किया करते थे।
"हमें केवल उन्हीं पलों में जीवित कहा जा सकता है, जब हमारा हृदय हमारे खजानों के बारे में चेतन होता है।"
थॉर्नटन वाइल्डर (1897-1975) लेखक और नाटककार
शब्द बहुत शक्तिशाली होते हैं, इसलिए जब भी आप किसी व्यक्ति के बारे में शिकायत करते हैं, तो आप दरअसल अपने ही जीवन को नुक़सान पहुँचा रहे होते हैं। यह आपका ही जीवन है, जिसमें परेशानी आएगी। वैज्ञानिक के नियम के अनुसार आप किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में जो भी सोचते या कहते हैं, उसे अपने स्वयं के जीवन में ले आते हैं। यही वजह है कि संसार के महानतम लोगों और शिक्षकों ने हमें कृतज्ञ होने की सलाह दी है। वे जानते थे कि आपको अधिकतम तभी मिल सकता है, आपके जीवन में अच्छी प्रगति तभी हो सकती है, जब आप दूसरों के लिए उतने ही कृतज्ञ हों, जितने कि वे स्वयं हैं। यदि आपका हर क़रीबी व्यक्ति आपसे कहे, "मैं आपसे प्रेम करता हूँ आपके वर्तमान स्वरूप से, जैसे भी आप हैं उससे," तब आप कैसा महसूस करेंगे?
किसी की शिकयत करने से उसके अवगुण हमारे भीतर आ जाते है इसलिए हमें भगवान के गुणों की चर्चा ही सुनने चहिए सोचना चहिए या वर्णन करना चाहीए।
– श्रीमद्भागवत महापुराण
आज का शक्तिशाली अभ्यास लोगों के वर्तमान स्वरूप के लिए कृतज्ञ होना है! फ़िलहाल भले ही आपके सभी संबंध अच्छे हों, लेकिन इस अभ्यास के बाद वे कहीं अधिक मधुर हो जाएँगे और जब आप कृतज्ञ होने के लिए हर व्यक्ति में अच्छी चीजें खोजते हैं, तो उसके बाद आप कृतज्ञता को अचूक सफल होते देखेंगे तब आपके संबंध इतने अधिक मजबूत, इतने अधिक संतुष्टिदायक और इतने अधिक समृद्ध हो जाएँगे, जितना आपने कभी सोचा भी नहीं था। कृतज्ञ होने के लिए अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें। आप अपनी पत्नी, बेटे और पिता को चुन सकते हैं या फिर अपने कारोबारी साझेदार और बहन को चुन सकते हैं। आप अपने सबसे अच्छे मित्र, दादी और चाचा को चुन सकते हैं। आप कोई भी तीन संबंध चुन सकते हैं, जिन्हें आप महत्वपूर्ण मानते हैं। बस ज़रूरी यह है कि आपके पास हर संबंधित व्यक्ति की तस्वीर हो वह तस्वीर अकेले उस व्यक्ति की भी हो सकती है या उसमें आप भी उस व्यक्ति के साथ मौजूद हो सकते हैं।
एक बार जब आप अपने तीन संबंध और तस्वीर चुन लेते हैं, तो आप जादू को गति देने के लिए तैयार हो जाते हैं। सुकून से बैठकर उन चीज़ों के बारे में सोचें, जिनके लिए आप हर व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं। उस व्यक्ति में ऐसी कौन सी खूबियाँ हैं, जिनसे आप सर्वाधिक प्रेम करते हैं? उसके सर्वश्रेष्ठ गुण कौन से हैं? आप उसके धैर्य, सुनने की योग्यता, काबिलियत, शक्ति, विवेक, बुद्धिमानी, हँसी, हास्यबोध, आँखों, मुस्कान या दयालु हृदय के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं। आप उन चीज़ों के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं, जिन्हें उस व्यक्ति के साथ करने में आपको सबसे अधिक आनंद आता है या आप वह समय याद कर सकते हैं, जब उस व्यक्ति ने आपका साथ दिया, आपकी परवाह की या आपको सहारा दिया। उस व्यक्ति के बारे में किन चीज़ों के लिए आप कृतज्ञ हैं, इस बारे में कुछ देर सोचें। इसके बाद उसकी तस्वीर अपने सामने रखें और पेन-नोटबुक लेकर या कंप्यूटर के सामने बैठकर उसकी पाँच खूबियाँ चुनें, जिनके लिए आप सर्वाधिक कृतज्ञ हैं। जब आप पाँच खूबियों की सूची बनाएँ, तो उस व्यक्ति की तस्वीर की ओर देखें। हर वाक्य को जादुई शब्दों धन्यवाद से शुरू करते हुए उसका नाम लिखें। साथ ही यह भी लिखें कि आप किस चीज़ के लिए कृतज्ञ हैं। धन्यवाद, उसका नाम क्योंकि क्या ?
मिसाल के तौर पर, "धन्यवाद, गोविन्द, क्योंकि आप मुझे हमेशा हँसाते हो।" या, "धन्यवाद, मेरी मां, क्योंकि आपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने में मेरी मदद की।"
जब आप तीनों लोगों की सूचियाँ बना लें, तो इस जादुई अभ्यास को जारी रखते हुए उनकी तस्वीरें किसी ऐसी जगह रख दें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकें। आज जब भी आप उनकी तस्वीरें देखें, उस व्यक्ति को धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और फिर उस व्यक्ति का नाम लें:
धन्यवाद, माधव ।
यदि आप ज्यादा समय घर से बाहर रहते हैं, तो उन तस्वीरों को अपने बैग या जेब में साथ ले जाएँ और दिन में तीन बार इसी तरीके का इस्तेमाल करते हुए उन्हें देखने की कोशिश करें।
अब आप जान चुके हैं कि अपने संबंधों को अच्छे और मजबूत बनाने के लिए आपको कृतज्ञता की शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करना है। यदि आप अपने हर संबंध को शानदार बनाना चाहें, तो इस अद्भुत अभ्यास का प्रयोग प्रत्येक दिन कर सकते हैं। आप इसका प्रयोग एक ही संबंध पर जितनी बार चाहें, कर सकते हैं। आप अपने संबंधों में अच्छी चीज़ों के लिए जितने अधिक कृतज्ञ होंगे, आपके जीवन का हर संबंध उतनी ही चमत्कारिक और तीव्र गति से बदल जाएगा।
1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ। लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची को दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद और उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।
2. अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें और हर व्यक्ति की एक तस्वीर भी चुन लें। 3. तस्वीर को अपने सामने रखते हुए अपने जर्नल में या कंप्यूटर पर पाँच बातें लिखें, जिनके लिए आप उस व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं।
4. हर वाक्य को शक्ती शाली शब्द धन्यवाद से शुरू करें, फिर उसका नाम लिखें और यह भी कि आप निश्चित रूप से किस ख़ासियत या ख़ूबी के लिए कृतज्ञ हैं।
*5. आज ही तीन तस्वीरें अपने साथ या किसी ऐसी जगह पर रखें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकते हों उन तस्वीरों को दिन में कम से कम तीन बार देखें, तस्वीर में व्यक्ति की ओर देखते हुए बोलें और उसे धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और इसके बाद उसका नाम लें। धन्यवाद, मोहन ।*
*6. आज रात सोने जाने से पहले अपने चाहे गए भगवान की फ़ोटो एक हाथ में लें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए उन्हें धन्यवाद कहें।*
हमें सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत क्यों मिलता हैं?2
शंका का त्याग क्यों आवश्यक हैं ?
चिन्तन का विषय:– चिन्तन करे और अपने सपने को पूरा करे ।
विचार की शक्ति जिससे बदल सकती है आपकी जिंदगी
रविवार, 2 अक्टूबर 2022
जो स्वयं को कट्टर हिन्दू समझता है सिर्फ वही पढ़े अन्यथा आगे बढ़े।
महादेव
. 🕉️
. 🙏🕉️🌷श्रीहरि 🌷🕉️🙏
. 🙏🚩हर हर महादेव 🚩🙏
. 🙏🏹⚔️जय परशुराम 🏹⚔️
हे पार्थ तू जाग जा नपुसकता को त्याग दे. देख रण में तुझे दुर्योधन ललकार रहा, अगर तू युद्ध नहीं करेगा तो पूरी दुनिया के लोग तेरी आवादी पर हेसेंगे.
तू वही अर्जुन है जिसका सारथी श्री कृष्ण था तू वही अर्जुन है जिसने अकेले यवन को जीता था तू वही परशुराम है जिसने अकेले पूरी पृथ्वी को विधर्मियों से 21 वार विरक्त किया.तू वही महकाल है जिसने त्रिपुरासूर का वध किया था वही माता महाकाली है जिसने अकेले 7 अरब राक्षसों को जिन्दा चबा गयी थी.तू वही माता दुर्गा है जिसने अकेले ही यूरोप और पाताल से आए हुए महिषासूर को उसके 8 अरब सेना सहित क्षण भर में नाश कर दिया.तू वही काली दास है जिसने मुहम्मद को भस्म किया था, तू वही पोरस,चाणक्य और चन्द्रगुप्त है जिसने इसी कलयुग में बिखड़े हुए भारत को फिर से अखंड भारत का निर्माण किया.. तू गुरु गोविन्द और 40 सरदार है जिसने चंडी की तलवार से 10 लाख भेरियो को गाजर मूली की भांति काटा था तू वही छत्र पति शिवा जी महराज और पेशवा बाजीराव है जिसने एक ही झटके में भारत को आसुरी शक्तियों का नाश कर बचाया था.
हे पार्थ क्यों डरते हो मरने से... तुम वैसे भी जन्म से पहले और मरने के बाद अमर ही हो धर्म युद्ध लड़ने का सौभाग्य हर युगो के लोगो को प्राप्त नहीं होता. तुम शरीर नहीं हो तुम प्रत्यक्ष ब्रम्ह के अंश अर्थात ब्रम्ह हो तुम जो चाहो अपने विश्वास के बदौलत पा सकते हो. तुम्हारे पिछले विचारों का परिणाम तुम्हारा शरीर रूप रंग परिवार समाज और संसार है जिसका कभी तुम भूल वश या जान बुझ कर चिंतन किए थे .. तू नहीं भी लड़ेगा तो तेरा स्वभाव युद्ध में लगा देगा.. क्योंकि ये सब विधर्मी महकाल के द्वारा पहले ही मारा जा चूका है तू नहीं भी चाहेगा तो भी तुझे निमित्त मात्र बनना ही होगा, इनकी आसामनी किताब देख इनका अंत तेरे ही हाथों लिखा है, तुझे ही बनना है इनके अल्लाह का कहर ।
तू प्रति दिन महकाली को ध्यान कर, तू प्रतिदिन महकाल का ध्यान कर, तू इस वक़्त विधर्मियों का नाश करने के लिए अमर लोक से आया है, तुझे कोई क्षलिया भेद नहीं सकता क्योंकि तू ही सतरंज का जन्म दाता है, ये पृथ्वी तो तेरे लिए ही बनी है असुरो का स्थान तो पताल है. तू निर्दोष पशु को मार कर उसका मांस मत खाया कर। तू तामसी भोजन त्याग दे। तू शराब का सेवन मत किया कर , तेरी बुद्धि नष्ट हो जाएगी जिससे तू पाप को प्राप्त होगा।
ज़ो स्वयं को शिव से ऊँचा कहे ज़ो राम को मुहम्मद से तुलना करें, ज़ो सनातन धर्म का अपमान करें, उसका सर धर से अलग कर दे, आज तू सनातन धर्म की आत्म रक्षा के लिए यहाँ लड़ेगा, कल तेरा राम तेरे लिए सनातन मुक्ति का द्वार खोलेगा, तेरे सैकड़ो पितृ का उद्धार हो जायेगा। आज तू अपने देश के लिए लड़ेगा, आने वाली पीढ़ियां तेरे वीरता की कथा सुन कर देश को विश्वगुरु और सोने की चिडया नहीं सोने का शेर बनाएगा .... तू युद्ध के लिए तैयार हो जा... अगर आज युद्ध नहीं लड़ेगा तो वैसे भी तू या तेरी पीढ़ी दुर्योधन का गुलाम बनेगा, लाखों द्रोपदी के कपड़े नोचे जायेंगे, तेरी पीढ़ियां तुझे कोसेगी..... जीवन के के हर क्षण मेरा स्मरण कर मुझ में मन स्थिर कर, तू बिजली की भांति मेरी भक्ति और शक्ति अपने भीतर प्रवाह होने दे.. मै स्वयं तेरे भीतर अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ, मै स्वयं तुम्हारे भीतर स्थित होकर ज्ञान दीप जला कर अज्ञानता रूपी अन्धकार को मिटा दूंगा. जिससे तू मुझ सनातन ईश्वर को ही प्राप्त होगा फिर तेरा पुनर्जन्म नहीं होगा। यदि तू अपने मन को मुझ में स्थित नहीं करेगा.. तो फिर मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी... यदि युद्ध के के क्षण मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी तो तू कलयुगी रूपी दुर्योधन को जितने में असमर्थ हो जायेगा. तू हर क्षण मेरा ध्यान कर, मेरा नाम जपा कर.. तू प्रहलाद की तरह मुझे सर्वयाप्त हर स्थान को मेरे भीतर है ऐसा विश्वास कर
मै ही जल अग्नि पृथ्वी वायु और अनंत ब्रह्माण्ड रूप में स्थित हूँ.
मै जितने वालों का विजय हूँ, मै तेजस्वी का तेज और शक्तिशाली पुरुषो की शक्ति हूँ, मै धर्मों में सनातन और मनुष्यो में तू स्वयं सनातनी हिन्दू हूँ। मै बलशालियो का बल और बुद्धिमानो की बुद्धि, शाशन करने में नितिवान शाशक प्रभु श्री राम हूँ मै पंच तत्व हूँ और ज्ञानी विज्ञानी पुरुषो का ज्ञान हूँ, मै विद्यायो में अध्यात्म विद्या हूँ, मै ही पृथ्वी पर लुप्त हुए ज्ञान को फिर से स्थापित करने वाला गौतम बुद्ध, गुरुनाक और महावीर हूँ,पृथ्वी पर अपने प्रिय पुत्र ईसा मसीह को मै ने ही ज्ञान दीप जलाने के लिए भेजा था.मै क्षल करने वालों में जुवा और मित्रता निभाने में सुदामा का विश्वासी मित्र द्वारिकाधीश श्री कृष्ण हूँ. मै स्वयं तुम्हारे साथ हूँ, पूरी दुनिया की सत्ता देख, अपने राष्ट्र की शान देख. तू 2014 के बाद अपने देश का भाग्य देख, काशी विश्वनाथ अयोध्याधाम देख, कश्मीर में तू अपनी ललकार देख, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का हाल देख.., श्री लंका को फिर से जलता देख अयोध्या को फिर सबरता देख....
हे पार्थ जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है मै तब तब हर युग के एक ही समय में अपने कई रूप को रचता हूँ और धर्म की स्थपना करता हूँ साधु पुरुषो की रक्षा करता हूँ अधर्म का नाश करता हूँ.. दुष्टो का संहार करता हूँ पंडित जनो को धर्म कार्य के लिए नियुक्त करता हूँ।
सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त्त वचन को तू फिर भी सुन । तू मेरा अतिशय प्रिय हैं, इससे यह परम हित कारक वचन मैं तुमसे कहूँगा.हे अर्जुन ! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भक्त्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर । ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है.सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्व शक्त्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त्त कर दूंगा, तू शोक मत कर ।तुझे यह गीता रूप रहस्य मय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्त्ति रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये ; तथा जो मुझ में दोष दृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये.
जो पुरुष मुझ में परम प्रेम करके इस परम रहस्य युक्त्त गीता शास्त्र को मेरे भक्त्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा —– इसमे कोई संदेह नहीं.
उससे बढ़ कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है ; तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़ कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं.
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीता शास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा
हे पार्थ ! क्या इस ( गीता शास्त्र ) को तूने एकाग्रचित से श्रवण किया ? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया.
काशी बम बम बोल रहा है
अयोध्या जय श्री राम दहाड़ रहा है
- श्री कृष्णा
मंगलवार, 27 सितंबर 2022
कृतज्ञता का महत्व 2
गुरुवार, 22 सितंबर 2022
कृष्ण रासलीला कोई कामुक भोग नही अपितु एक रहस्य है।
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| 6 वर्ष 9 माह की आयु में कालिया नाग का घमंड चूर करना। |
राजा परीक्षित ने यहां प्रश्न कर दिया- शुकदेवजी से पूछते हैं गुरुदेव! मेरी समझ में नहीं आया, सज्जनों! बहुत बहुत ध्यान से पढ़े, परीक्षित कहते हैं- श्रीकृष्ण ने परायी स्त्रियों के साथ रास किया, परायी स्त्रियों के गले में गलबहियाँ डालकर कृष्ण नाचे, ये कहां का धर्म है? मेरी समझ में नहीं आया?
परीक्षित के समय में कलयुग आ गया था, परीक्षित कहते हैं- कलयुग आगे आ रहा है, शुकदेवजी बोले- अब तो घोर कलियुग आने वाला है और कलयुग के लोगों को तो जरा सी बात चाहिये, फिर देखों, शास्त्रार्थ पर उतर आते हैं- ऐसा क्यों लिखा? ऐसा क्यों किया? मनुस्मृति में लिखा है कि धर्म का तत्व गुफा में छुपा हुआ है, इसलिये बड़े जिस रास्ते से जायें, छोटों को उसी रास्ते से जाना चाहिये।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी।।
हम लोग ईश्वर के अंश हैं, जीव ईश्वर का दश है तो कलयुग के लोगों को लीक प्वाइंट मिल गया, ऐसे ही जो ईश्वर कोटि के पुरूष होते हैं, यदि धर्म के विपरीत भी वो कोई काम करे, उन्हें कोई दोष नहीं लगता, क्योंकि वे ईश्वर है, कर्तु, अकर्तु अन्यथा "कर्तु समर्थ ईश्वरः" ईश्वर वो है जो नहीं करने पर भी सब कुछ करे और करने के बाद भी कुछ नहीं करे।
नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्रानीश्वरः।
विनश्यत्याचरन् मौढयाधथा रूद्रोऽब्धिजं विषम्।।
दूसरी बात- तुमने कहां, जो ईश्वर ने किया वो हम करेंगे, मैं इसका विरोध करता हूँ, शुकदेवजी कहते हैं- जो ईश्वर होता है उनका अनुकरण हमें कभी नहीं करना चाहिये, तुम ये बताओ शंकरजी कौन है? परीक्षित ने कहा शंकरजी ईश्वर है, तुम कहते हो- ईश्वर ने जो किया वो हम करेंगे तो समुद्र में से जितना जहर निकला था, पूरे जहर को शंकरजी पी गये।
शंकरजी ईश्वर है इसलिये दस-बीस हजार टन जहर पी गये, तुम उनके अंश हो तो तुम तौले-दो तौले ही पीकर देखो, शिवजी ने विष पी लिया, उन्हें बुखार भी नहीं आया और हम एक बूंद भी विषपान करेंगे तो डेढ़ मिनट में ही हमारा राम नाम सत् हो जायेगा, जो कार्य ईश्वर ने किया वो हम कैसे कर सकते हैं।
ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित्।
तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्।।
ईश्वर के वचन को मानो, ईश्वर के वचन सत्य है, देखो सज्जनों! रामजी और कृष्णजी के चरित्र में अन्तर क्या है? जो रामजी ने किया है वो हम कर सकते हैं और कृष्णजी ने जो कहा वो हम कर सकते हैं, रामजी के किये हुए को करो और कृष्णजी के कहे हुए को करो।
कृष्णजी के किये हुए को हम नहीं कर सकते, क्योंकि राम का जो चरित्र है वो विशुद्ध मानव का चरित्र है और कृष्णजी का जो चरित्र है वो विशुद्ध ईश्वरी योगेश्वर का चरित्र है, दोनों ही भगवान् हैं, लेकिन रामजी के चरित्र में मानवता का प्रदर्शन ज्यादा है और कृष्णजी के चरित्र योगेश्वरता का प्रदर्शन है।
प्रातः काल उठ के रघुनाथा।
मात-पिता गुरु नावहिं माथा।।
रघुवर प्रातः उठकर माता-पिता गुरुजनों को प्रणाम करते हैं, ये तो काम हम कर सकते हैं कि नहीं? हम भी कर सकते हैं और सब को करना ही चाहिये, लेकिन सात दिन के कृष्ण ने पूतना को मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, छः महीना के कृष्ण ने शकटासुर मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, पूरे ब्रजमंडल में आग लग गयी और ब्रजवासीयों के देखते-देखते कृष्ण ने उस दावाग्नि का पान कर लिया, ये हम कर सकते हैं क्या?
कृष्ण ने लाखों गोपियों के साथ रास किया, उसे हम नहीं कर सकते, शुकदेवजी कहते हैं- यह कोई स्त्री-पुरुष का मिलन नहीं था, जीव और ईश्वर का मिलन था, यह रासलीला छः महीनों तक चली थी, क्या छः-छः महीनों तक ब्रज गोपियाँ अपने घर से बाहर रह सकती थी, इसी बात से सिद्ध होता है कि यह तो जीव का प्रभु से मिलन था।
हम कहते हैं कि हम ईश्वर के अंश हैं, इस पर भी मैं यह कहना चाहता हूं, हम जानते हैं अंश का अर्थ होता है थोड़ा यानी छोटा जैसे हम लोग गंगाजी में नहाते हैं, गंगा स्नान करते वक्त हमारे मुंह से निकलता है हर-हर गंगे, हर-हर गंगे, यह जानते हुए भी कि भारत के जितने भी महानगर है, उन ज्यादातर महानगरों की सारी गंदगी गंगाजी में ही जाती है।
चाहे वो रूद्रप्रयाग हो या उत्तरकाशी हो, हरिद्वार हो या देवप्रयाग, ऋषिकेश हो या प्रयाग, सारा गंदा पानी गंगाजी में जाता है फिर भी हम गंगा स्नान करते हैं और बोलते हैं हर-हर गंगे•• क्यों? क्योंकि हम जानते हैं, इन सारे नगरों की गंदगी मिलकर भी गंगा को गंदा नहीं कर सकती, गंगा विशाल है, गंगा महान् है।
लेकिन आपने कहा- मोतीभाई गंगा स्नान करने चलिये, हमने गंगा स्नान करते-करते सोचा कि शालिग्रामजी की सेवा के लिए गंगाजल ले चलूं, सो मैंने एक चांदी की कटोरी में अढ़ाई सौ ग्राम गंगाजल भी लिया, स्नान करके लौटे तो धर्मशाला के कमरे का ताला खोलने के लिये मैंने गंगाजल की कटोरी नीचे रख दी, पीछे से गंदे मुँह वाला सूअर उस गंगाजल की कटोरी में मुंह लगाकर आधा गंगाजल तो पी गया।
मैंने देखा तो मन खिन्न हो गया, तो सज्जनों! अब बताओ कि क्या उस बचे हुए गंगाजल से मैं अपने शालिग्रामजी भगवान् को स्नान कराऊँ या नहीं? नहीं कराऊँगा, क्योंकि सूअर का मुंह लग जाने से वो गंगाजल गंदा हो गया, और बहती हुई गंगा में तो पूरा सूअर ही डूब जाये तो कोई असर नहीं होता, इसी कटोरी से मुंह लगाया तो असर क्यों हुआ? क्योंकि बहती हुई गंगा विशाल है और कटोरी का गंगाजल अंश है, तो जो ताकत उस विशाल गंगा में है वो अंश में नहीं रही।
इसलिये ईश्वर जो विशाल है और हम ईश्वर के अंश हैं, अंश होने के नाते जो कार्य ईश्वर करता है वो हम कैसे कर सकते हैं? इसलिये ईश्वर के चरित्र को प्रणाम करो, ईश्वर के चरित्र का वंदन करो, दूसरी बात- कुछ नास्तिक लोगों को ये कामी पुरुष की सी लीला लगती है, नहीं-नहीं कृष्ण ने जो गोपियों के साथ जो रास किया ये काम लीला नहीं- "का विजय प्रख्यापनार्थ सेयं रासलीला" काम को जीतने के लिये प्रभु ने रासलीला की।
कोई कहता है हम हलवा नहीं खाते, अरे, खाओगे कहाँ से तुम्हें मिलता ही नहीं है, नहीं खाना तो वो है जो मिलने पर भी इच्छा नहीं रहे, कहते हो कि हम तो ब्रह्मचारी है, जब शादी किसी ने करवाई नहीं, अपनी बेटी किसी ने दी ही नहीं, सगाई वाला कोई आया ही नहीं तो ब्रह्मचारी तो अपने आप हो गये।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी सिवाय कृष्ण के किसी और के चरित्र में नहीं है, कृष्ण ने कामदेव से कहा- कोपीन पहन कर जंगल में समाधि लगाकर तो काम को सभी जीतते है, लेकिन असंख्य सुंदरी नारियों के गले में हाथ डालकर रासविहार करके भी मैं तुम पर विजय प्राप्त करूँगा, ये तो काम को जीतने की है रासलीला, इसलिये तो प्रभु ने काम को उल्टा लटका दिया आकाश में।
गोपियाँ कृष्ण के संग रास कर रही थी, वे तो वेद के मंत्र थे साक्षात्, जीव है गोपी और ईश्वर है स्वयं श्रीकृष्ण, तो जीव और ईश्वर का जो विशुद्ध मिलन है उसी को हम रास कहते हैं, ये काम लीला नहीं, काम को जीतने वाली लीला है, काम के मन में अभिमान था कि मैंने सबको जीत लिया, ब्रह्मा को जीत लिया, वरूण को जीत लिया, कुबेर को जीत लिया, यम को जीत लिया, वो योगेश्वर कृष्ण को जीतना चाहता था।
प्रभु ने असंख्य सुंदरी गोपियों के बीच रहकर भी काम को जीता, मन और इन्द्रियों पर जिसका नियंत्रण है उसे कोई विचलित नहीं कर सकता, इस रास लीला के प्रसंग को सुनने का मतलब क्या है? रास के मंगलमय् प्रसंग को जो व्यक्ति सुनते है, पढ़ते है और पढ़कर और चिन्तन के द्वारा इस काम विजय को जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं उन व्यक्तियों के ह्रदय में भक्ति प्रगट हो जाती है, और अंत में गोविन्द के चरणों में प्रीति हो जाती है, और ह्रदय का सबसे बड़ा रोग जो काम है वो काम हमेशा के लिये निकल जाता है।
बताओं, जिस रासलीला को सुनने से या पढ़ने से मन का काम निकल जाये, वो स्वयं कामलीला कैसे हो सकती है? परीक्षित के मन का संदेह दूर हो गया, गोविन्द ब्रजवासीयों के वश में है, इनका प्रेम इतना अगाध सागर है कि ब्रजवासीयों के प्रेम के सागर में ब्रह्मा भी गोता लगाये तो थाह नहीं पा सकते, विधाता में सामर्थ्य नहीं है थाह पाने की, एक अलौकिक बात- यहाॅ गोविन्द से मिलना भी है, गोविन्द से मिलन की आकांक्षा भी है तो गोविन्द के प्रति आशीर्वाद का भाव भी है।
*8 वर्ष की आयु में काम देवता का अभिमान तोड़ दिया । काम देवता ने अपने पांच शक्तिशाली वाणो से पूरी शक्ति लगा दी किंतु भगवान कृष्ण को काम भाव से प्रभावित न कर सके। वहां अलग ही दृश्य दिखने को मिला.. कोई गोपियां कृष्ण का रूप हो जाती और दूसरी गोपियां के संग नृत्य संगीत करने लगती, कोई गोपियां स्वयं को कृष्ण रूप देखकर आश्चर्य से अपनी सखी को कहती ये देखो मैं श्याम सुंदर कृष्ण हूं। ये सब देखते हुऐ काम देवता अचंभित हो गए। वो पहचान ही नही पा रहे थे इसमें असली कृष्ण कौन है। तब उन्हे ज्ञान हुआ। कृष्ण में तो सम्पूर्ण चराचर जगत है। ये लाखों गोपियां कृष्ण का ही रूप है। जो गोपियां वहां मौजूद थीं उसका शरीर उसी समय उसके घर पर भी था क्योंकि उस समय कोई माता पिता अपने बच्चे को रात्रि में नही निकलने देते । उसकी आत्मा परमात्मा के साथ स्थिर था। वो सब गोपियां पिछले जन्म में ऋषियों मुनि ही थे जो अपनी योग भक्ति के बौदौलत भगवान कृष्ण को प्राप्त हो चुके थे। जब भगवान अवतार लेते हैं तो उनके साथ उनके प्रेमी भक्त भी
अवतरित होते है। जैसे त्रेता युग में प्रभु श्री राम के साथ वानर के रूप में देव सेना अवतरित हुए थे।
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| 4 वर्ष 4 माह की आयु में अघाशुर वध। |
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| 7 वर्ष 2 माह की आयु में गोवर्धन पर्वत को अपने अंगूली पर धारण करना। |
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| 3 वर्ष की आयु में अग्निपान कर बृजवासियों की अग्नि से रक्षा करना। |
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| 11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस के कुश्ती मैदान में भगवान कृष्ण द्वारा कालरीपट्टू ( मार्सल आर्ट) का जन्म । |
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| 11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस को उसके घर में घुस कर उसका वध करना । |
कृष्ण गोपियों के कपड़े क्यों छुपाए ?
एक समय कुछ गोपियां स्नान करने के लिए यमुना नदी पहुंची । स्नान से पूर्व नदी के तट पर भागवती जगत जननी माता की मूरत बना कर प्रार्थना में उनसे कृष्ण जैसा पति मागने लगी। फिर वहां 5 वर्षीय कृष्ण सीघ्र ही पहुंचे और माता भागवती की मूर्ति और गोपियां के बीच खड़े होकर गोपियां से नटखटता पूर्वक पूछने लगे " क्यों री वानरी क्या मांग रही थीं माता से " अभी तो प्रार्थना कर रही, फिर मेरे घर जाके मैया से शिकायत करेगी "कान्हिया मुझे परेशान करता है।" रूक आज तुझे मज़ा चखाता हूं। इतना सुनते ही सभी गोपियां वहां से भाग निकली और नदी में जाकर स्नान करने लगीं, नदी या कहीं भी नग्न होकर स्नान करना वेद विरुद्ध महापाप है। शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। और जल भगवान कृष्ण का ही एक तत्व स्वरूप है जिस प्रकार अग्नि वायु पृथ्वी आकाश कृष्ण का ही पंच तत्व स्वरूप होता है उसी तरह ये नदी सागर और जल भी श्री कृष्ण का रूप है। वो सर्व्यपत है जब नदी में गोपियां स्नान करने गई थीं तब किशोर अवस्था होने के कारण उसे ज्ञान नही था नग्न होकर नदी जल में स्नान करना महापाप है। चाहे वो छोटा बच्चा ही क्यों न हों। भगवान कृष्ण ढूढते हुए नदी के किनारे पहुंचे गोपियों के कपड़े देखे उस कपड़े को छुपा दिया। स्वयं अंतर्ध्यान हो गए। जब गोपियां स्नान कर बाहर निकली तो उसके कपडे गायब थे अब वो शर्म के मारे नदी में फिर प्रवेश हो गई और जगत जननी माता से प्रार्थना करने लगी। क्योंकि कृष्ण सिर्फ विष्णु अवतार ही नही थे वो माता पार्वती का भी अवतार था । अर्थात परमात्मा तत्व एक ही है अनेक नही। जब गोपियां प्रार्थना कर थक गई कुछ भी संकेत न मिला तब उसे कृष्ण कभी जल में दिखते तो कभी पेड़ की टहनियों पर कभी नदी के तट पर दिखते और उनके साथ उसके कपडे।
अब वो कृष्ण से क्षमा मागने लगी की अब से वो दुबारा ऐसा अपराध नही करेगी। शास्त्रविरुद्ध कर्म का त्याग करेगी । क्षमा का भाव आते ही उसके कपडे जहां वो रखी उसी स्थान पर फिर से पड़ा हुआ मिला।
गोपियों को ज्ञान हो गया की परमात्मा चरण को वो तभी प्राप्त कर सकेगी जब वो शास्त्र विरुद्ध कर्म का त्याग करेगी। अन्यथा जन्म जन्मांतर तरह तरह के अंजाने में पाप के बंधन के कारण संसार बंधन भी बना रहेगा शास्त्र विरुद्ध कर्म करते हुए जीव कभी पाप से मुक्त नही हो सकता। उसे एक दिन परमात्मा की शरण जाना ही होगा।
नाम जप किस प्रकार होना चाहिए ।
प्रश्न . नाम किस प्रकार जप होना चाहिए ? जिससे हमे लाभ हो ? उत्तर:– सबसे पहले नाम जप जैसे भी हो लाभ होता ही है ... फिर भी आप जानने के इक्ष...






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