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शुक्रवार, 31 मार्च 2023

धन के लिए कृतज्ञता – अभ्यास 7

 






यदि आपके जीवन में धन की कमी है, तो यह बात अच्छी तरह गाँठ बाँध लें कि धन को लेकर चिंतित, ईर्ष्यालु, निराश, हताश, शंकालु या भयभीत होने से आपके पास कभी अधिक धन नहीं आएगा, क्योंकि ये भावनाएँ इस बात से उत्पन्न होती हैं कि आप अपने पास मौजूद धन के लिए कृतज्ञ नहीं हैं। धन को लेकर शिकवा-शिकायत करना, विवाद करना, कुंठित होना, किसी चीज़ की कीमत के बारे में आलोचना करना या पैसे के बारे में किसी दूसरे को बुरा महसूस कराना कृतज्ञता के काम नहीं हैं। इससे आपका आर्थिक जीवन कभी बेहतर नहीं होगा, बल्कि बदतर होता जाएगा।


चाहे आपकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो, यह सोचना कि आपके पास पर्याप्त धन नहीं है, अपने पास मौजूद धन के बारे में कृतघ्न होना है। अपने जीवन में धन को चमत्कारिक ढंग से बढ़ाने के लिए आपको अपनी वर्तमान स्थिति को दिमाग से बाहर निकालना होगा और जो भी पैसा आपके पास है, उसके प्रति कृतज्ञता महसूस करनी होगी।


"जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके भी पास कृतज्ञता (धन के लिए) नहीं है, उसके पास जो है, वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"


जब आपके पास बहुत कम पैसा हो, तो उसे लेकर कृतज्ञता महसूस करना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि आपको यह बात पता हो कि जब तक आप कृतज्ञ नहीं होंगे, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा, तो आप यह काम करने के लिए प्रेरित हो जाएँगे।


धन का विषय कई लोगों के लिए पेचीदा हो सकता है, खास तौर पर तब, जब उनके पास यह पर्याप्त न हो, इसलिए रहस्यमय धन के अभ्यास के दो क़दम हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप दिन के शुरू में ही चमत्कारिक धन का पूरा अभ्यास पढ़ लें, क्योंकि तब आप धन के अभ्यास को दिन भर जारी रख पाएँगे।


बैठकर कुछ मिनट अपने बचपन के बारे में सोचें, जब आपके पास पैसा या तो था ही नहीं 

फिर बहुत कम था। जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जब आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और पूरे ह्रदय से महसूस करें। क्या आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन था ?


क्या आप किसी मकान में रहते थे?


क्या आपको कई सालों तक शिक्षा मिली थी?


आप हर दिन स्कूल कैसे जाते थे? क्या आपके पास स्कूल की पुस्तकें, लंच और अन्य सभी आवश्यक चीजें थीं? बचपन में क्या आप कभी छुट्टियाँ मनाने किसी हिल स्टेशन या समुद्र तट पर गए थे?


बचपन में आपको जन्मदिन के सबसे रोमांचक उपहार कौन से मिले थे? क्या आपके पास साइकल, खिलौने या पालतू जानवर थे?


क्या आपके पास कपड़े थे, जब आपका क़द तेज़ी से बढ़ जाता था और कपड़े छोटे हो जाते थे?


क्या आप कोई फ़िल्म या मैच देखने गए थे, कोई वाद्ययंत्र सीखने गए थे या आपने अपने किसी शौक को पूरा किया था?


क्या आप स्वास्थ्य ठीक न होने पर कभी डॉक्टर के पास गए थे और दवाएँ ली थीं?


क्या आप दंतचिकित्सक के पास गए थे?


क्या आपके पास अनिवार्य सामान थे, जिनका इस्तेमाल आप हर दिन करते थे, जैसे आपका टूथब्रश, टूथपेस्ट, साबुन और शैम्पू ? क्या आप कार में यात्रा करते थे? क्या आप टेलीविज़न देखते थे, फ़ोन करते थे, बिजली और पानी का इस्तेमाल करते थे?


इन सारी चीज़ों के लिए धन की ज़रूरत थी और आपको ये सब मुफ़्त मिली थीं। बचपन और किशोरावस्था के दिनों को याद करने पर आपको अहसास होगा कि आपको कितनी सारी चीजें मिली थीं, जो मेहनत से कमाए गए पैसे से खरीदी गई थीं। हर उदाहरण और याद के लिए कृतज्ञ हों, क्योंकि जब आप अतीत में मिले धन के लिए सच्ची कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो भविष्य में आपका धन रहस्यमय तरीके से बढ़ेगा! कृतज्ञता का नियम इसकी गारंटी देता है।


चमत्कारिक धन के अभ्यास को जारी रखने के लिए एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और उस पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर यह लिखें :


उस सारे धन के लिए भगवान कृष्ण(विष्णु जी) और माता राधा जी(माता लक्ष्मी जी) को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है। जिसके कारण मेरे कई सारे काम आसान हो गए।


इसे वाक्य को कम से कम तीन बार लिखें और गहराई से माता लक्ष्मी (माता राधा जी) और भगवान विष्णु जी (भगवान कृष्ण)के प्रति कृतज्ञता (एहसानमंद) महसूस करे।


आज ही इस रहस्यमय नोट को अपने पर्स या जेब में रख लें। कम से कम एक बार सुबह और एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, इस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथों में थामें अपने लिखे हुए शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ हों। आप जितने ज्यादा ईमानदार होते हैं और इसे जितना अधिक महसूस करते हैं, आपको अपनी आर्थिक परिस्थितियों में उतना ही तीव्र चमत्कारिक परिवर्तन नज़र आएगा।


आप समय से पहले कभी नहीं जान पाएँगे कि आपका धन कैसे बढ़ेगा, लेकिन संभावना इस बात की है कि आप इस दौरान अधिक धन पाने के लिए कई परिस्थितियों में भारी बदलाव देखेंगे। आप वह धन पा सकते हैं, जिसके बारे में आपको अहसास ही नहीं था कि वह आपका था। आपको अप्रत्याशित नकद राशि या चेक मिल सकते हैं। आपको कोई चीज़ डिस्काउंट, रिबेट या कम लागत में मिल सकती है आपको सभी प्रकार की भौतिक चीजें उपहार में मिल सकती हैं, जिन्हें खरीदने में आपका पैसा खर्च होता।


आज के बाद अपना रहस्यमय नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ उस पर हर दिन आपकी नज़र पड़े, ताकि आपको जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद आती रहे। यह कभी न भूलें कि आप जितनी अधिक बार इस रहस्यमय नोट की ओर देखते हैं और मिलने वाले धन के लिए कृतज्ञता महसूस करते हैं, आप अपने आर्थिक जीवन में उतने ही अधिक चमत्कार को सक्रिय कर देते हैं। धन के लिए कृतज्ञता की प्रचुरता का अर्थ है धन की प्रचुरता !


यदि आप खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं, जहाँ आप धन संबंधी किसी चीज़ के बारे में शिकायत करने वाले हैं, चाहे यह शब्दों में हो या विचारों में, तो स्वयं से पूछें “क्या मैं इस शिकायत की कीमत चुकाना चाहता हूँ?" यह सवाल आपको इसलिए पूछना चाहिए, क्योंकि आपकी एक शिकायत भी धन के प्रवाह को धीमा कर देगी या आपके पास आने से रोक देगी।


आज ही खुद से वादा करें कि जब भी आपको कहीं से पैसा मिलेगा, चाहे यह नौकरी की तनख्वाह हो, टैक्स रिफंड या डिस्काउंट हो या किसी से उपहार में मिली चीज़ हो, जिसे खरीदने में पैसा खर्च होता, तो आप उसके लिए वाक़ई कृतज्ञ होंगे। इनमें से हर परिस्थिति का अर्थ है कि आपको धन मिला है और ऐसा हर प्रसंग आपको यह अवसर देता है कि आप हाल में मिले धन के लिए कृतज्ञ बनकर अपने धन को बढ़ाने और कई गुना करने की कृतज्ञता की रहस्यमय शक्ति का इस्तेमाल करें!


1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ और एक से तीन तक के क़दम दोहराएँ लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।


 2. बैठकर कुछ मिनट तक अपने बचपन के बारे में सोचें कि आपको कितनी सारी चीजें बिना पैसे चुकाए ही मिल गई थीं।


3. जब आप हर याद को ताज़ा करते हैं, जहाँ आपके लिए पैसे का भुगतान किया गया था, तो तहेदिल से शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद कहें और महसूस करें।


4. एक 10 रूपए या किसी भी संख्या का नोट लें और नोट पर एक स्टिकर चिपका दें। स्टिकर पर लिखें : उस सारे धन के लिए माता राधेकृष्ण जी को धन्यवाद, जो मुझे जीवन भर दिया गया है।


5. अपने रहस्यमय नोट को अपने साथ रखें और कम से कम एक बार सुबह तथा एक बार दोपहर में या जितनी अधिक बार आप चाहें, उस नोट को बाहर निकालें और अपने हाथ में थामें अपने लिखे शब्द पढ़ें और जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए सचमुच कृतज्ञ होइए।


*6. आज के बाद अपना नोट किसी ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ यह आपको हर दिन दिखता रहे, ताकि आपको अपने जीवन में मिली आर्थिक समृद्धि के लिए कृतज्ञ होने की याद रहे।*


*7. आज रात सोने से ठीक पहले अपने चाहे गए भगवान के रूपो की फ़ोटो एक हाथ में थामें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए शाक्तिशाली शब्द धन्यवाद नमस्कार या नमस्ते कहें।*

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

पुत्र राहुल को बुद्ध क्यों मानते थे अपने रास्ते का कांटा ?

पुत्र राहुल को बुद्ध क्यों मानते थे अपने रास्ते का कांटा?

महत्मा बुद्ध का जन्म 500 ईशा पूर्व हिंदू माता पिता के यहां हुआ था। महत्मा को ज्ञान प्राप्ति वट वृक्ष के नीचे श्री हरि विष्णु मंदिर के समीप हुआ था उनके माता पिता एक वैष्णव थे अर्थात ईश्वरों के ईश्वर श्री हरि विष्णु के पूजक थे। मध्यकालीन समय में सम्राट अशोक और उनके पुत्र राहुल द्वारा सत्य ज्ञान का प्रचार किया। जो हिंदू धर्म का अपमान कर रहा है वो बौद्ध नही है। सन्यासी जैसा भेस बनाकर कम्युनिस्ट हमलावार देश में अशांति फैलाना चाहते हैं ।  
आज भी जापान से लेकर मंगोलिया , चीन अफगानिस्तान कश्मीर श्रीलंका , भारत आदि देशों में मध्यकालीन सभ्यता की छाप ।

यूं तो आपने त्याग और बलिदान के किस्से-कहानियां बहुत सुने होंगे, लेकिन उन सभी में बुद्ध के बेटे की कहानी कहीं आगे है.

जी हां! राहुल की कहानी!

ये कहानी तब की है, जब बुद्ध सिद्धार्थ हुआ करते थे. उस समय उनके पुत्र ने अपने पिता के मार्ग पर चलने के लिए धन संपत्ति और सभी तरह की मोह माया का परित्याग कर दिया था.

दिलचस्प बात तो यह है कि जिस पुत्र राहुल का चेहरा देखने से पहले ही बुद्ध ने उसे अपने रास्ते का कांटा समझ लिया था, वह आगे चलकर उन्हीं के रास्ते पर चला.

तो चलिए जानते हैं कि आखिर बुद्ध अपने पुत्र राहुल को क्यों रास्ते का कांटा समझते थे –

*जन्म के साथ ही पिता ने छोड़ दिया*

जब सिद्धार्थ गौतम 16 साल के थे, तभी उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा से करा दिया था. हालांकि सिद्धार्थ एक संन्यासी जीवन का पालन करना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक जीवन में बंधने के कारण वह ऐसा नहीं कर पाए.

विवाह के कुछ समय के पश्चात उन्हें पुत्री हुई और उसके कुछ साल बाद 534 ईसा पूर्व में उन्हें एक पुत्र रत्न हुआ. पुत्र होने की खुशी दाई मां ने सिद्धार्थ के सामने जाहिर की, तो उन्होंने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा-ओह!

असल में पुत्र राहुल के जन्म से पहले सिद्धार्थ किसी खास मार्ग पर निकलने वाले थे. ऐसे में राहुल का जन्म उनके लिए अवरोध बन सकता था. माना जाता है कि यदि सिद्धार्थ गौतम अपने पुत्र का चेहरा देख लेते, तो वह मोह माया के बंधन में जकड़ जाते और फिर आगे नहीं बढ़ पाते. लिहाजा, वह राहुल के जन्म की अगली रात ही घर से निकल गए.

कहते हैं कि बुद्ध सत्य की खोज में इतने लालायित थे कि उन्होंने पिता धर्म का पालन करना तक उचित नहीं समझा.

*9 साल बाद पिता और पुत्र हुए आमने-सामने*

9 साल बाद सिद्धार्थ गौतम ज्ञान प्राप्त कर अपने परिवार से मिलने राजमहल पहुंचे. उनके आने की खबर जैसे ही यशोधरा को मिली, वह खुश होने की जगह क्रोध से भर उठीं. 

उन्होंने बुद्ध को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि आपको हमारी बिल्कुल भी फिक्र नहीं. आप हमें उस समय छोड़कर कैसे जा सकते हैं, जिस समय हमें आपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. 

बुद्ध कुछ कह पाते, इससे पहले ही यशोधरा ने 9 साल के राहुल को हाथ खींचकर उनके सामने खड़ा कर दिया. साथ ही बुद्ध पर कटाक्ष करते हुए बोलीं, राहुल यही तुम्हारे पिता हैं! 

बुद्ध के पास यशोधरा के इन प्रश्नों के जवाब नहीं थे.

दूसरी तरफ राहुल की नन्हीं आंखें बुद्ध की खामोशी में कुछ ढूढ़ रही थीं. बुद्ध ज्यादा देर तक यह देख नहीं सके और बोले, मैं तो एक संन्यासी हूं. मैं तुम्हें क्या दे सकता हूं. राहुल अभी भी खामोश था...

यह देखकर बुद्ध ने अपने शिष्य आंनद से अपना भिक्षापात्र मंगवाते हुए राहुल से कहा, पुत्र मेरे पास इसके अलावा तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, जो मैं तुम्हें दे सकूं. इस पर राहुल ने उन्हें नमन करते हुए कहा, आप मेरे पिता हैं. आप जो देना चाहें, वह मेरे लिए संपत्ति है.

आगे बुद्ध ने राहुल को त्याग और बलिदान का ज्ञान देते हुए सन्यास का वरदान दिया और वापस चले गए.

*बुद्ध जैसा चमत्कारी दृष्टिकोण नहीं था, फिर भी...*

यूं तो 9 साल की उम्र में ही राहुल ने अपने पिता से दान में सन्यासी जीवन का वरदान ले लिया था. साथ ही पिता बुद्ध के दिखाए गए मार्ग पर चलना शुरू कर दिया था. उन तमाम सुख-सुविधाओं से वंचित हो गया, जो एक साधारण बालक को मिला करती थीं.


कुछ वर्ष बीतने के बाद जब राहुल 20 साल का हुआ, तो उसने निश्चय किया कि वह अपने पिता से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर सदैव के लिए बौद्ध भिक्षु बन जाएगा. जबकि, राहुल का व्यक्तित्व बुद्ध के बिल्कुल उलट था.

वह बेहद ही चंचल और राजनीति कौशल से परिपूर्ण था. उसके अंदर अपने पिता जैसा दृढ़ निश्चय और चमत्कारी दृष्टिकोण व्यक्तित्व नहीं था.

बावजूद इसके बौद्ध भिक्षु बनने के लिए वह बुद्ध के पास पहुंच ही गया. वहां उसने बुद्ध से मुक्ति मार्ग और इन्द्रियों पर नियंत्रण का प्रशिक्षण देने का आग्रह किया.

बुद्ध ने राहुल के आग्रह को स्वीकार कर लिया और उसे प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया.

*बुद्ध का शिष्य बनकर प्राप्त किया मोक्ष ज्ञान*

मुक्ति का मार्ग तलाशने निकला राहुल अब भगवान बुद्ध का शिष्य बन चुका था.

मज्झिम निकाय एक बौद्ध धर्म ग्रंथ है. इस निकाय में बुद्ध द्वारा राहुल को आध्यात्मिक दीक्षा का ज़िक्र किया गया है. इसके मुताबिक, जब राहुल की दीक्षा शुरू हुई, तब महात्मा बुद्ध राहुल को एक पेड़ के नीचे ले गए. वह पेड़ उसी बट वृक्ष के समान था, जहां बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.

आगे पिता के निर्देश पर राहुल अपनी दोनों आंखों को मूंदकर ज्ञान की प्राप्त करने लगा... अब वह ध्यान में मग्न हो गया था. बुद्ध ने पूछा, राहुल, आंखों में चेतना स्थायी है या अस्थायी? राहुल ने जवाब दिया अस्थायी. बुद्ध ने फिर पूछा, राहुल, इंद्रियां और चेतना स्थाई है या अस्थाई.

राहुल ने पहले की तरह जवाब दिया, अस्थायी! तीसरा सवाल पूछते हुए बुद्ध ने राहुल से पूछा, जो अस्थाई है, उसमें पीड़ा है या आनंद.

*राहुल ने जवाब दिया, पीड़ा, प्रभु!*

इसी प्रकार से बुद्ध ने एक और प्रश्न पूछा, क्या ऐसी अस्थाई पीड़ादायक वस्तु के बारे में यह सोचना सही है कि यह मेरा है, यह मैं हूं, यह मेरा 'स्व' है? जबकि वह चीज परिवर्तनशील है.

राहुल ने उत्तर दिया, नहीं प्रभु! ऐसी वस्तु हमारी नहीं हो सकती.

आगे महात्मा बुद्ध ने राहुल को सत्य के ज्ञान से परिचित कराया. ज्ञान प्राप्ति के बाद वह अपने आपको बेहद हल्का महसूस कर रहा था. उसकी जागृति चेतना बढ़ चुकी थी. अब वह सांसारिक मोह माया के बंधनों से मुक्त था.

पिता द्वारा दिए गए ज्ञान से वह अनंत प्रकार की लालसाओं से मुक्त था. उसके मन से चिंता और कष्टों के बादल छट चुके थे!

आगे वह बौद्ध भिक्षु बनकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने में जुट गया.

*और राहुल ने त्याग दिए प्राण*

पूर्ण रूप से बौद्ध भिक्षु बनने के बाद राहुल की मुलाकात उसके कुछ पुराने दोस्तों से हुई. राहुल को भिक्षु के रूप में देखकर उसके दोस्तों ने कहा, तुम दो बड़े कारणों से बहुत सौभाग्यशाली हो.

पहला यह कि तुम बुद्ध के पुत्र हो और दूसरा, इसलिए क्योंकि तुम्हें बुद्ध से शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला.


हालांकि बताया यह भी जाता है कि राहुल के त्याग ने अपनी माता का जीवन पूरी तरह से बदल कर रखा दिया था. यशोधरा, राहुल से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई थीं.

इधर, राहुल बौध धर्म के प्रचार-प्रसार में लगा रहा. एक दिन जब बुद्ध जंगल के मार्ग में थक कर विश्राम कर रहे थे, तभी किसी ने बुद्ध को सूचना दी कि आपका पुत्र अब नहीं रहा.

हर प्रकार से बंधनों से मुक्त राहुल अब शारीरिक बंधन से भी मुक्त हो चुके थे.

बताया जाता है कि बाद में महान सम्राट अशोक ने राहुल के सम्मान में एक स्तूप बनाया था.

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

संबंध के लिए कृतज्ञता


*संबंध के लिए कृतज्ञता अभ्यास 6*




कल्पना करें कि आप इस पृथ्वी पर रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। ऐसे में आपके मन में कोई चीज़ करने की कोई इच्छा ही नहीं होगी। कोई पेंटिंग बनाने में क्या तुक है, अगर उसे कोई भी न देख सके ? किसी भी तरह के संगीत का सृजन करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसे न सुन सके? किसी भी चीज़ का आविष्कार करने में क्या तुक है, अगर कोई भी उसका इस्तेमाल न कर सके? एक जगह से दूसरी जगह तक जाने का कोई कारण नहीं होगा, क्योंकि आप जिस भी नई जगह जाएँगे, वह पुरानी जगह जैसी ही होगी यानी वहाँ कोई नहीं होगा। आपके जीवन में कोई खुशी या आनंद नहीं होगा।


दूसरे लोगों के साथ संपर्क और अनुभवों से आपको जीवन में ख़ुशी, अर्थ व उद्देश्य मिलता है।


इसी वजह से आपके संबंध आपके जीवन पर किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा असर डालते हैं। अपने सपनों के जीवन को साकार करने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि आपके संबंध इस वक़्त आपके जीवन पर कैसा असर डाल रहे हैं और वे कैसे कृतज्ञता के सबसे शक्तिशाली साधन बन सकते हैं तथा आपके जीवन को जादुई ढंग से बदल सकते हैं। विज्ञान अब अतीत के महान मनीषियों के ज्ञान की पुष्टि कर रहा है। शोध अध्ययन दर्शा रहे हैं कि जो लोग कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं, वे दूसरों के अधिक निकट होते हैं, परिवार तथा मित्रों से अधिक जुड़े होते हैं और दूसरे लोगों के मन में उनकी बेहतर छवि होती है। लेकिन शोध अध्ययनों में सामने आने वाला संभवतः सबसे आश्चर्यजनक आँकड़ा यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में प्रत्येक शिकायत, चाहे वह वैचारिक हो या शाब्दिक के साथ-साथ उसके बारे में दस नियामतें भी महसूस होनी चाहिए, तभी संबंध समृद्ध हो सकता हैं। हर शिकायत के बदले अगर नियामतों की संख्या दस से कम है, तो संबंध का ह्रास होने लगेगा और यदि यह वैवाहिक संबंध है, तो तलाक की नौबत भी आ सकती है।


कृतज्ञता से संबंध समृद्ध होते हैं। जब आप किसी संबंध के लिए अपनी कृतज्ञता बढ़ाते हैं, तो चाटाकारिक ढंग से आप उसमें ख़ुशी और अच्छी चीजों की प्रचुरता पाएँगे। ध्यान रहे, संबंधों के प्रति कृतज्ञता केवल आपके संबंधों को ही नहीं बदलती है; यह आपको भी बदल देती है। आपका स्वभाव इस वक़्त चाहे जैसा हो, कृतज्ञता आपको अधिक धैर्य, समझ, करुणा और दयालुता प्रदान करेगी और एक वक़्त ऐसा आएगा, जब आप खुद को पहचान भी नहीं पाएँगे। छोटी छोटी बातों पर जो चिढ़ आपने कभी महसूस की थी, वह ग़ायब हो जाएगी। संबंधों को लेकर आपके मन में जो शिकायतें थीं, वे ओझल हो जाएँगी। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि जब आप किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सचमुच कृतज्ञ होते हैं, तो आपके मन में उसकी किसी चीज़ में बदलाव करने की इच्छा नहीं होती। आप उसकी आलोचना नहीं करेंगे, उसके बारे में शिकायत नहीं करेंगे और उसे दोष नहीं देंगे, क्योंकि आप तो उसके अच्छे गुणों के बारे में कृतज्ञता महसूस करने में व्यस्त होंगे। दरअसल, आप उन चीज़ों को देख ही नहीं पाएँगे, जिनके बारे में आप

अक्सर शिकायत किया करते थे।


"हमें केवल उन्हीं पलों में जीवित कहा जा सकता है, जब हमारा हृदय हमारे खजानों के बारे में चेतन होता है।"


थॉर्नटन वाइल्डर (1897-1975) लेखक और नाटककार


शब्द बहुत शक्तिशाली होते हैं, इसलिए जब भी आप किसी व्यक्ति के बारे में शिकायत करते हैं, तो आप दरअसल अपने ही जीवन को नुक़सान पहुँचा रहे होते हैं। यह आपका ही जीवन है, जिसमें परेशानी आएगी। वैज्ञानिक के नियम के अनुसार आप किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में जो भी सोचते या कहते हैं, उसे अपने स्वयं के जीवन में ले आते हैं। यही वजह है कि संसार के महानतम लोगों और शिक्षकों ने हमें कृतज्ञ होने की सलाह दी है। वे जानते थे कि आपको अधिकतम तभी मिल सकता है, आपके जीवन में अच्छी प्रगति तभी हो सकती है, जब आप दूसरों के लिए उतने ही कृतज्ञ हों, जितने कि वे स्वयं हैं। यदि आपका हर क़रीबी व्यक्ति आपसे कहे, "मैं आपसे प्रेम करता हूँ आपके वर्तमान स्वरूप से, जैसे भी आप हैं उससे," तब आप कैसा महसूस करेंगे?


किसी की शिकयत करने से उसके अवगुण हमारे भीतर आ जाते है इसलिए हमें भगवान के गुणों की चर्चा ही सुनने चहिए सोचना चहिए या वर्णन करना चाहीए।


– श्रीमद्भागवत महापुराण 


आज का शक्तिशाली अभ्यास लोगों के वर्तमान स्वरूप के लिए कृतज्ञ होना है! फ़िलहाल भले ही आपके सभी संबंध अच्छे हों, लेकिन इस अभ्यास के बाद वे कहीं अधिक मधुर हो जाएँगे और जब आप कृतज्ञ होने के लिए हर व्यक्ति में अच्छी चीजें खोजते हैं, तो उसके बाद आप कृतज्ञता को अचूक सफल होते देखेंगे तब आपके संबंध इतने अधिक मजबूत, इतने अधिक संतुष्टिदायक और इतने अधिक समृद्ध हो जाएँगे, जितना आपने कभी सोचा भी नहीं था। कृतज्ञ होने के लिए अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें। आप अपनी पत्नी, बेटे और पिता को चुन सकते हैं या फिर अपने कारोबारी साझेदार और बहन को चुन सकते हैं। आप अपने सबसे अच्छे मित्र, दादी और चाचा को चुन सकते हैं। आप कोई भी तीन संबंध चुन सकते हैं, जिन्हें आप महत्वपूर्ण मानते हैं। बस ज़रूरी यह है कि आपके पास हर संबंधित व्यक्ति की तस्वीर हो वह तस्वीर अकेले उस व्यक्ति की भी हो सकती है या उसमें आप भी उस व्यक्ति के साथ मौजूद हो सकते हैं।


एक बार जब आप अपने तीन संबंध और तस्वीर चुन लेते हैं, तो आप जादू को गति देने के लिए तैयार हो जाते हैं। सुकून से बैठकर उन चीज़ों के बारे में सोचें, जिनके लिए आप हर व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं। उस व्यक्ति में ऐसी कौन सी खूबियाँ हैं, जिनसे आप सर्वाधिक प्रेम करते हैं? उसके सर्वश्रेष्ठ गुण कौन से हैं? आप उसके धैर्य, सुनने की योग्यता, काबिलियत, शक्ति, विवेक, बुद्धिमानी, हँसी, हास्यबोध, आँखों, मुस्कान या दयालु हृदय के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं। आप उन चीज़ों के लिए कृतज्ञ हो सकते हैं, जिन्हें उस व्यक्ति के साथ करने में आपको सबसे अधिक आनंद आता है या आप वह समय याद कर सकते हैं, जब उस व्यक्ति ने आपका साथ दिया, आपकी परवाह की या आपको सहारा दिया। उस  व्यक्ति के बारे में किन चीज़ों के लिए आप कृतज्ञ हैं, इस बारे में कुछ देर सोचें। इसके बाद उसकी तस्वीर अपने सामने रखें और पेन-नोटबुक लेकर या कंप्यूटर के सामने बैठकर उसकी पाँच खूबियाँ चुनें, जिनके लिए आप सर्वाधिक कृतज्ञ हैं। जब आप पाँच खूबियों की सूची बनाएँ, तो उस व्यक्ति की तस्वीर की ओर देखें। हर वाक्य को जादुई शब्दों धन्यवाद से शुरू करते हुए उसका नाम लिखें। साथ ही यह भी लिखें कि आप किस चीज़ के लिए कृतज्ञ हैं। धन्यवाद, उसका नाम क्योंकि क्या ?


मिसाल के तौर पर, "धन्यवाद, गोविन्द, क्योंकि आप मुझे हमेशा हँसाते हो।" या, "धन्यवाद, मेरी मां, क्योंकि आपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने में मेरी मदद की।"


जब आप तीनों लोगों की सूचियाँ बना लें, तो इस जादुई अभ्यास को जारी रखते हुए उनकी तस्वीरें किसी ऐसी जगह रख दें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकें। आज जब भी आप उनकी तस्वीरें देखें, उस व्यक्ति को धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और फिर उस व्यक्ति का नाम लें:

धन्यवाद, माधव ।


यदि आप ज्यादा समय घर से बाहर रहते हैं, तो उन तस्वीरों को अपने बैग या जेब में साथ ले जाएँ और दिन में तीन बार इसी तरीके का इस्तेमाल करते हुए उन्हें देखने की कोशिश करें।


अब आप जान चुके हैं कि अपने संबंधों को अच्छे और मजबूत बनाने के लिए आपको कृतज्ञता की शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करना है। यदि आप अपने हर संबंध को शानदार बनाना चाहें, तो इस अद्भुत अभ्यास का प्रयोग प्रत्येक दिन कर सकते हैं। आप इसका प्रयोग एक ही संबंध पर जितनी बार चाहें, कर सकते हैं। आप अपने संबंधों में अच्छी चीज़ों के लिए जितने अधिक कृतज्ञ होंगे, आपके जीवन का हर संबंध उतनी ही चमत्कारिक और तीव्र गति से बदल जाएगा।



1. अपनी नियामतें गिनें दस नियामतों की सूची बनाएँ। लिखें कि आप क्यों कृतज्ञ हैं। अपनी सूची को दोबारा पढ़ें और हर नियामत के अंत में कहें धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद और उस नियामत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करें।


2. अपने तीन सबसे करीबी संबंधों को चुनें और हर व्यक्ति की एक तस्वीर भी चुन लें। 3. तस्वीर को अपने सामने रखते हुए अपने जर्नल में या कंप्यूटर पर पाँच बातें लिखें, जिनके लिए आप उस व्यक्ति के प्रति सबसे अधिक कृतज्ञ हैं।


4. हर वाक्य को शक्ती शाली शब्द धन्यवाद से शुरू करें, फिर उसका नाम लिखें और यह भी कि आप निश्चित रूप से किस ख़ासियत या ख़ूबी के लिए कृतज्ञ हैं।


*5. आज ही तीन तस्वीरें अपने साथ या किसी ऐसी जगह पर रखें, जहाँ आप उन्हें अक्सर देख सकते हों उन तस्वीरों को दिन में कम से कम तीन बार देखें, तस्वीर में व्यक्ति की ओर देखते हुए बोलें और उसे धन्यवाद देते हुए जादुई शब्द धन्यवाद कहें और इसके बाद उसका नाम लें। धन्यवाद, मोहन ।*


*6. आज रात सोने जाने से पहले अपने चाहे गए भगवान की फ़ोटो एक हाथ में लें और दिन भर में हुई सबसे अच्छी चीज़ के लिए उन्हें धन्यवाद कहें।*


कृतज्ञता का महत्व


कृतज्ञता का महत्व 2


हमें सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत क्यों मिलता हैं?2


शंका का त्याग क्यों आवश्यक हैं ?


चिन्तन का विषय:– चिन्तन करे और अपने सपने को पूरा करे ।


विचार की शक्ति जिससे बदल सकती है आपकी जिंदगी


स्वास्थ्य के लिए कृतज्ञता




रविवार, 2 अक्टूबर 2022

जो स्वयं को कट्टर हिन्दू समझता है सिर्फ वही पढ़े अन्यथा आगे बढ़े।

 



महादेव 

. 🕉️

. 🙏🕉️🌷श्रीहरि 🌷🕉️🙏

. 🙏🚩हर हर महादेव 🚩🙏

. 🙏🏹⚔️जय परशुराम 🏹⚔️




हे पार्थ तू जाग जा नपुसकता को त्याग दे. देख रण में तुझे दुर्योधन ललकार रहा, अगर तू युद्ध नहीं करेगा तो पूरी दुनिया के लोग तेरी आवादी पर हेसेंगे.


तू वही अर्जुन है जिसका सारथी श्री कृष्ण था तू वही अर्जुन है जिसने अकेले यवन को जीता था तू वही परशुराम है जिसने अकेले पूरी पृथ्वी को विधर्मियों से 21 वार विरक्त किया.तू वही महकाल है जिसने त्रिपुरासूर का वध किया था वही माता महाकाली है जिसने अकेले 7 अरब राक्षसों को जिन्दा चबा गयी थी.तू वही माता दुर्गा है जिसने अकेले ही यूरोप और पाताल से आए हुए महिषासूर को उसके 8 अरब सेना सहित क्षण भर में नाश कर दिया.तू वही काली दास है जिसने मुहम्मद को भस्म किया था, तू वही पोरस,चाणक्य और चन्द्रगुप्त है जिसने इसी कलयुग में बिखड़े हुए भारत को फिर से अखंड भारत का निर्माण किया.. तू गुरु गोविन्द और 40 सरदार है जिसने चंडी की तलवार से 10 लाख भेरियो को गाजर मूली की भांति काटा था तू वही छत्र पति शिवा जी महराज और पेशवा बाजीराव है जिसने एक ही झटके में भारत को आसुरी शक्तियों का नाश कर बचाया था. 


हे पार्थ क्यों डरते हो मरने से... तुम वैसे भी जन्म से पहले और मरने के बाद अमर ही हो धर्म युद्ध लड़ने का सौभाग्य हर युगो के लोगो को प्राप्त नहीं होता. तुम शरीर नहीं हो तुम प्रत्यक्ष ब्रम्ह के अंश अर्थात ब्रम्ह हो तुम जो चाहो अपने विश्वास के बदौलत पा सकते हो. तुम्हारे पिछले विचारों का परिणाम तुम्हारा शरीर रूप रंग परिवार समाज और संसार है जिसका कभी तुम भूल वश या जान बुझ कर चिंतन किए थे .. तू नहीं भी लड़ेगा तो तेरा स्वभाव युद्ध में लगा देगा.. क्योंकि ये सब विधर्मी महकाल के द्वारा पहले ही मारा जा चूका है तू नहीं भी चाहेगा तो भी तुझे निमित्त मात्र बनना ही होगा, इनकी आसामनी किताब देख इनका अंत तेरे ही हाथों लिखा है, तुझे ही बनना है इनके अल्लाह का कहर ।

तू प्रति दिन महकाली को ध्यान कर, तू प्रतिदिन महकाल का ध्यान कर, तू इस वक़्त विधर्मियों का नाश करने के लिए अमर लोक से आया है, तुझे कोई क्षलिया भेद नहीं सकता क्योंकि तू ही सतरंज का जन्म दाता है, ये पृथ्वी तो तेरे लिए ही बनी है असुरो का स्थान तो पताल है. तू निर्दोष पशु को मार कर उसका मांस मत खाया कर। तू तामसी भोजन त्याग दे। तू शराब का सेवन मत किया कर , तेरी बुद्धि नष्ट हो जाएगी जिससे तू पाप को प्राप्त होगा। 


ज़ो स्वयं को शिव से ऊँचा कहे ज़ो राम को मुहम्मद से तुलना करें, ज़ो सनातन धर्म का अपमान करें, उसका सर धर से अलग कर दे, आज तू सनातन धर्म की आत्म रक्षा के लिए यहाँ लड़ेगा, कल तेरा राम तेरे लिए सनातन मुक्ति का द्वार खोलेगा, तेरे सैकड़ो पितृ का उद्धार हो जायेगा। आज तू अपने देश के लिए लड़ेगा, आने वाली पीढ़ियां तेरे वीरता की कथा सुन कर देश को विश्वगुरु और सोने की चिडया नहीं सोने का शेर बनाएगा .... तू युद्ध के लिए तैयार हो जा... अगर आज युद्ध नहीं लड़ेगा तो वैसे भी तू या तेरी पीढ़ी दुर्योधन का गुलाम बनेगा, लाखों द्रोपदी के कपड़े नोचे जायेंगे, तेरी पीढ़ियां तुझे कोसेगी..... जीवन के के हर क्षण मेरा स्मरण कर मुझ में मन स्थिर कर, तू बिजली की भांति मेरी भक्ति और शक्ति अपने भीतर प्रवाह होने दे.. मै स्वयं तेरे भीतर अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ, मै स्वयं तुम्हारे भीतर स्थित होकर ज्ञान दीप जला कर अज्ञानता रूपी अन्धकार को मिटा दूंगा. जिससे तू मुझ सनातन ईश्वर को ही प्राप्त होगा फिर तेरा पुनर्जन्म नहीं होगा। यदि तू अपने मन को मुझ में स्थित नहीं करेगा.. तो फिर मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी... यदि युद्ध के के क्षण मेरी भक्ति और शक्ति तेरे भीतर प्रवाह नहीं होगी तो तू कलयुगी रूपी दुर्योधन को जितने में असमर्थ हो जायेगा. तू हर क्षण मेरा ध्यान कर, मेरा नाम जपा कर.. तू प्रहलाद की तरह मुझे सर्वयाप्त हर स्थान को मेरे भीतर है ऐसा विश्वास कर 


मै ही जल अग्नि पृथ्वी वायु और अनंत ब्रह्माण्ड रूप में स्थित हूँ.

मै जितने वालों का विजय हूँ, मै तेजस्वी का तेज और शक्तिशाली पुरुषो की शक्ति हूँ, मै धर्मों में सनातन और मनुष्यो में तू स्वयं सनातनी हिन्दू हूँ। मै बलशालियो का बल और बुद्धिमानो की बुद्धि, शाशन करने में नितिवान शाशक प्रभु श्री राम हूँ मै पंच तत्व हूँ और ज्ञानी विज्ञानी पुरुषो का ज्ञान हूँ, मै विद्यायो में अध्यात्म विद्या हूँ, मै ही पृथ्वी पर लुप्त हुए ज्ञान को फिर से स्थापित करने वाला गौतम बुद्ध, गुरुनाक और महावीर हूँ,पृथ्वी पर अपने प्रिय पुत्र ईसा मसीह को मै ने ही ज्ञान दीप जलाने के लिए भेजा था.मै क्षल करने वालों में जुवा और मित्रता निभाने में सुदामा का विश्वासी मित्र द्वारिकाधीश श्री कृष्ण हूँ. मै स्वयं तुम्हारे साथ हूँ, पूरी दुनिया की सत्ता देख, अपने राष्ट्र की शान देख. तू 2014 के बाद अपने देश का भाग्य देख, काशी विश्वनाथ अयोध्याधाम देख, कश्मीर में तू अपनी ललकार देख, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का हाल देख.., श्री लंका को फिर से जलता देख अयोध्या को फिर सबरता देख....


हे पार्थ जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है मै तब तब हर युग के एक ही समय में अपने कई रूप को रचता हूँ और धर्म की स्थपना करता हूँ साधु पुरुषो की रक्षा करता हूँ अधर्म का नाश करता हूँ.. दुष्टो का संहार करता हूँ पंडित जनो को धर्म कार्य के लिए नियुक्त करता हूँ। 


सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त्त वचन को तू फिर भी सुन । तू मेरा अतिशय प्रिय हैं, इससे यह परम हित कारक वचन मैं तुमसे कहूँगा.हे अर्जुन ! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भक्त्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर । ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है.सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्व शक्त्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त्त कर दूंगा, तू शोक मत कर ।तुझे यह गीता रूप रहस्य मय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्त्ति रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये ; तथा जो मुझ में दोष दृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये.


जो पुरुष मुझ में परम प्रेम करके इस परम रहस्य युक्त्त गीता शास्त्र को मेरे भक्त्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा —– इसमे कोई संदेह नहीं.


उससे बढ़ कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है ; तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़ कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं.


जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीता शास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊँगा


हे पार्थ ! क्या इस ( गीता शास्त्र ) को तूने एकाग्रचित से श्रवण किया ? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया.

काशी बम बम बोल रहा है

अयोध्या जय श्री राम दहाड़ रहा है 

- श्री कृष्णा


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मंगलवार, 27 सितंबर 2022

कृतज्ञता का महत्व 2

{ह्रीं}
*🙏🌺⚔️❤️ ॐ श्रीं दुर्गाये नमः ❤️🔱🌺🙏*

*माता दुर्गा की दया कृपा से उनके द्वारा प्रेरित होने पर मैं दुर्गा पाठ सपस्ती का सार बताना चाहूंगा। जब आप इस सार को समझ जायेंगे। तब इस के लिए मैया को गहराई से धन्यवाद करे क्योंकि उन्ही की कृपा दृष्टि से इस पाठ के विज्ञान का रहस्य समझ पाया हूं। उन्ही की दी हुई बुद्धि से समझ पाया हूं। नही तो हजार बार पढ़ कर भी कोई इस सपस्ती को समझने में असमर्थ हो जाता है। उन्ही की दी शक्ती से मैं राहुल झा ये सार लिख रहा हूं।* 

*दुर्गा सपस्ती का पाठ करने से पहले उसे समझना अवस्यक है। तभी हमारे मोह का नाश और उसका फल संभव है।*

*प्राचीन समय में पूरी पृथ्वी पर सनातन धर्म ही था। उसी सनातनी में एक राजा सुरथ नामक एक राजा थे वो पूरी पृथ्वी के राजा थे। जब उन्हे परमात्मा के प्रति कृतज्ञ होने का ज्ञान नही था तब उनके शत्रु धीरे धीरे उनके राज्य को हड़पने लगे और शत्रु राजा से हारने लगे फिर एक समय ऐसा आया पूरी पृथ्वी से सिर्फ अपने छोटे राज्य का राजा बनकर रह गए। उसमे भी उनके मंत्री महामंत्री आदि उनके शत्रुओं के प्रभाव में आकर पीठ पीछे उनके विरुद्ध षडयंत्र रचने लगे ये सब देख राजा स्वयं की रक्षा के लिए अपना राज्य त्याग कर घना वन की ओर चल दिए। चलते चलते उन्हें एक नदी और ऋषि की कुटिया मिली। राजा ऋषि के शरणागत होकर वही अपना डेरा बना लिया और रहने लगे। एक दिन राजा सूरथ एक वैश्य को देखा वो काफ़ी उदास होकर शोक में डूबा था। राजा सुरथ उसके समीप जाकर उसके दुःख का कारण पूछने लगे। तभी उस वैश्य ने कहा मेरे द्वारा अर्जित किए धन समाप्ति के लालच में आकर मेरी पत्नी बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया फिर भी मेरा मोह उससे से नही हटता जबकि जानता हूं उन्हे हम से संबंध नही था अपितु उनका सम्बन्ध मेरे धन संपत्ति से था ये सब जानकर कर भी उसके प्रति मेरा मोह नही हटता।*

*वैश्य का ये कारण जानकर धर्मात्मा राजा को स्वयं के राज्य की याद आ गई और वो भी मोह में पड़ गए और आश्चर्य में पड़कर वो अपने प्यारे प्रजा की हाल के बाड़े में सोच कर चिंतित हो गए।*

*उन्होंने वैश्य को अपने साथ ऋषि के समीप लाया और अपनी और उस वैश्य की व्यथा सुनाई और अपने मोह को लेकर प्रश्न किया – हे प्रभु जो राज मेरे हाथ निकल चुका है अब वो वास्तव में हमारा नही है ये जानकर भी मैं क्यो अपने प्यारे प्रजा के बारे में चिंतित हूं। उन्हे दुष्ट राजा न जाने किस किस प्रकार से प्रताड़ना करते होंगे। मेरे हाथी घोड़े को परतंत्र होकर न जाने किन किन कष्टों को शाहना परता होगा। ये सब सोच मैं अपने प्रजा के लिए बहुत दुःख को प्राप्त हुआ हुआ हूं प्रभू मेरे मोह के नाश का मार्ग हो तो बताए।*

*तभी ऋषि बोले: हे राजन ये पूरी सृष्टि महामाया का ही स्वरूप है उसी ने इस जगत को धारण कर रखा है वहीं इस अनंत ब्रह्मांड को धारण कर स्थित है उसी ने जगत को मोह में डाल रखा है ।वो जब चाहती तब राजा बना देती है जब चाहती है तब राजा को रंक बना देती है। वो जब चाहती है भिक्षुक को दुनियां का सम्राट बना देती और वो जब चाहती है तब सम्राट को भिक्षुक बना देती है। ये भगवती आदिशक्ति महाज्ञानियों के चित्त को भी बल पूर्वक खीच कर मोह डाल देती है। ये श्री हरि विष्णु के चित्त को भी बल पूर्वक खीच कर मोह रूपी नींद में सुला देती है। पूर्व काल में विष्णु जी के कान से दो दानव उत्पन्न हुए। और ब्रम्हा जी को खाने के लिए दौर पड़े तभी ब्रम्हा जी स्वयं की रक्षा के लिए श्री हरि विष्णु जी को जगाने बहुत प्रयत्न किया किंतु श्री विष्णु जी को जगाने में असमर्थ रहे। फिर उन्होंने उनके योगनिद्रा रुपी भगवती महामाया का ध्यान किया। कृतज्ञता पूर्वक उनके गुणों के साथ उनकी स्तुति करना सुरू किया। फिर माता भगवती विष्णु जी के योगनिंद्र रूपी से निकल कर आकाश में स्थित हो गई और विष्णु जी जाग गए। तभी उन्होंने ने ब्रम्हा और उस मधु कैटभ नामक दो दानव को देखा । फिर विष्णु जी ने ब्रम्हा जी को बचाने के उद्देश्य से मधु – कैटभ से कई हजार वर्षों तक युद्ध किया अंत में माता भगवती ने दोनो दानव को मोह में दाल दिया। दोनो मोहित दानव विष्णु जी के पराक्रम से प्रसन्न होकर कहने लगा मैं तुम्हारी युद्ध कौशल से प्रसन्न हूं तुम वर मांगो क्या चाहते हो तभी भगवान विष्णु ने कहा यदि तुम वर देना ही चाहते हो तो अभी मेरे हाथों से मारा जाओ तभी दोनों असुरों ने कहा जहां पृथ्वी सुखी हो हमारी मृत्यु वहीं पर होगी तभी भगवान विष्णु ने उस दोनों को पकड़ कर अपने जांघ पर रखा और अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया इसी के साथ ब्रह्मा जी स्वयं को रक्षा करने में सफल हुए ।*

*इसी तरह पूर्व काल देवताओं ने भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञ न होकर अपना स्वर्ग और अपने अपने अधिकार को खो बैठे महिषासुर को मारने में ब्रह्मा विष्णु महेश भी असमर्थ हो चुके थे क्योंकि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों लिखी थी भगवती के द्वारा ब्रह्मा जी की बुद्धि मोहित होकर उनके मुख से महिषासुर को वरदान दे रखा था तभी सभी देवताओं ने भगवती महामाया को याद करने लगे महामाया प्रकट होकर महिषासुर को नाश किया इसी तरह चंड मुंड रक्तबीज आदि का विनाश हुआ देवता जब-जब अभिमान के वशीभूत होकर परमात्मा के प्रति कृतज्ञ ना हुए तब तब उनके स्वर्ग आदि पर से अधिकार हट गया फिर जब जब परमात्मा के प्रति अर्थात माता दुर्गा के प्रति भगवती मूल प्राकृतिक के प्रति कृतज्ञ होने लगे तब तब प्रकट होकर उनके शत्रुओं का नाश करती और उनके अधिकार को दोबारा देकर उन्हें वरदान दिया करती। हे राजा सूरत आप उसी भगवती की शरण में जाओ पूर्ण रूप से स्वयं को समर्पित कर दो उनके प्रति कृतज्ञ हो जाओ वह जो देती है उसके लिए उसका स्तुति करते रहो भक्ति करते रहो वह स्वयं प्रसन्न होकर आपको मोह से मुक्त कर देगी आपके अधिकार को दोबारा देकर वरदान देगी तभी उस राजा और व्यस्य ने नवरात्रि के समय में 9 दिन व्रत पूरी जीवन में जो कुछ मिला उसके लिए भगवती महामाया को गहराई से धन्यवाद रूपी पूजा-पाठ स्तुति किया वह अपने अभिमान को त्याग अपनी माता सर्व स्वरूप में अपनी माता दुर्गा को ही देखने लगे तभी माता ने प्रकट होकर उन दोनों को इक्षित वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गई।*

*पूरे सप्तशती पाठ में हमने यही सीखा मनुष्य जीवन या देवता जीवन मैं कभी भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञता को नहीं त्यागना चाहिए ना ही कभी अभिमान करना चाहिए हमें जो कुछ मिला उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद करते रहना चाहिए भगवती माता को धन्यवाद करते रहना चाहिए हमारे शरीर आदि के लिए माता को धन्यवाद करते रहना चाहिए छोटी छोटी चीजों पर हमें धन्यवाद करते रहना चाहिए हम जितना प्रेम पूर्वक माता को कृतज्ञ भाव देंगे उतनी ही तीव्र गति से वह हमें अपने अधिकार को प्राप्त करेगी । ये सृष्टि का विज्ञान है। आप जब भी पाठ करे प्रार्थना करे तो 3,6,9 बार करें। ये सृष्टि का वैज्ञानिक सिक्योरिटी कोड है। सपस्ति पाठ के हर एक शब्दों में रहस्यमय जादू है। आप जब भी मैया से प्रार्थना करे तो पूरी भावना के साथ देवताओं की भांति, ब्रम्हा जी की भांति प्रार्थना करें । मैया के गुणों का बखान करें। आपका कृतज्ञ भाव ईधन की भांति है , आपका विचार किसी यान की भांति है। यदि ईंधन न हो तो यान एक पग भी आगे नही जा पाएगा। आप जो कुछ मैया से मागना चाहते हो उसके लिए पहले मैया के प्रति कृतज्ञ होना परेगा। इस संसार में आपको अभिमान का त्याग कर अपने को प्रभु का निमित्त मात्र बनकर जीना सीखना होगा।*

*आप जब भी प्रार्थना करें तो तो अपने साथ अन्य भक्तो के लिए प्रार्थना करें जैसे अर्गला स्त्रोत में अन्य भक्तो के लिए प्रार्थना किया गया है , जैसे 4 अध्याय के अंत में देवता गण मनुष्य के लिए मैया से वरदान मागते है। इनमे जीतना भी क्रिया करने को बताया हूं इसमें एक भी नहीं छुटना चाहिए सभी महत्त्वपूर्ण क्रिया है।*

🙏 *ॐ नमो माता दुर्गे* 🙏

    *🌺जय माता दी 🌺*
                 🪷
बागेश्वर धाम सरकार 

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गुरुवार, 22 सितंबर 2022

कृष्ण रासलीला कोई कामुक भोग नही अपितु एक रहस्य है।


6 वर्ष 9 माह की आयु में कालिया नाग का घमंड चूर करना।

राजा परीक्षित ने यहां प्रश्न कर दिया- शुकदेवजी से पूछते हैं गुरुदेव! मेरी समझ में नहीं आया, सज्जनों! बहुत बहुत ध्यान से पढ़े, परीक्षित कहते हैं- श्रीकृष्ण ने परायी स्त्रियों के साथ रास किया, परायी स्त्रियों के गले में गलबहियाँ डालकर कृष्ण नाचे, ये कहां का धर्म है? मेरी समझ में नहीं आया?


परीक्षित के समय में कलयुग आ गया था, परीक्षित कहते हैं- कलयुग आगे आ रहा है, शुकदेवजी बोले- अब तो घोर कलियुग आने वाला है और कलयुग के लोगों को तो जरा सी बात चाहिये, फिर देखों, शास्त्रार्थ पर उतर आते हैं- ऐसा क्यों लिखा? ऐसा क्यों किया? मनुस्मृति में लिखा है कि धर्म का तत्व गुफा में छुपा हुआ है, इसलिये बड़े जिस रास्ते से जायें, छोटों को उसी रास्ते से जाना चाहिये।


ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

चेतन अमल सहज सुखराशी।।


हम लोग ईश्वर के अंश हैं, जीव ईश्वर का दश है तो कलयुग के लोगों को लीक प्वाइंट मिल गया, ऐसे ही जो ईश्वर कोटि के पुरूष होते हैं, यदि धर्म के विपरीत भी वो कोई काम करे, उन्हें कोई दोष नहीं लगता, क्योंकि वे ईश्वर है, कर्तु, अकर्तु अन्यथा "कर्तु समर्थ ईश्वरः" ईश्वर वो है जो नहीं करने पर भी सब कुछ करे और करने के बाद भी कुछ नहीं करे।


नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्रानीश्वरः।

विनश्यत्याचरन् मौढयाधथा रूद्रोऽब्धिजं विषम्।।


दूसरी बात- तुमने कहां, जो ईश्वर ने किया वो हम करेंगे, मैं इसका विरोध करता हूँ, शुकदेवजी कहते हैं- जो ईश्वर होता है उनका अनुकरण हमें कभी नहीं करना चाहिये, तुम ये बताओ शंकरजी कौन है? परीक्षित ने कहा शंकरजी ईश्वर है, तुम कहते हो- ईश्वर ने जो किया वो हम करेंगे तो समुद्र में से जितना जहर निकला था, पूरे जहर को शंकरजी पी गये।


शंकरजी ईश्वर है इसलिये दस-बीस हजार टन जहर पी गये, तुम उनके अंश हो तो तुम तौले-दो तौले ही पीकर देखो, शिवजी ने विष पी लिया, उन्हें बुखार भी नहीं आया और हम एक बूंद भी विषपान करेंगे तो डेढ़ मिनट में ही हमारा राम नाम सत् हो जायेगा, जो कार्य ईश्वर ने किया वो हम कैसे कर सकते हैं।


ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित्।

तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्।।


ईश्वर के वचन को मानो, ईश्वर के वचन सत्य है, देखो सज्जनों! रामजी और कृष्णजी के चरित्र में अन्तर क्या है? जो रामजी ने किया है वो हम कर सकते हैं और कृष्णजी ने जो कहा वो हम कर सकते हैं, रामजी के किये हुए को करो और कृष्णजी के कहे हुए को करो।


कृष्णजी के किये हुए को हम नहीं कर सकते, क्योंकि राम का जो चरित्र है वो विशुद्ध मानव का चरित्र है और कृष्णजी का जो चरित्र है वो विशुद्ध ईश्वरी योगेश्वर का चरित्र है, दोनों ही भगवान् हैं, लेकिन रामजी के चरित्र में मानवता का प्रदर्शन ज्यादा है और कृष्णजी के चरित्र योगेश्वरता का प्रदर्शन है।


प्रातः काल उठ के रघुनाथा।

मात-पिता गुरु नावहिं माथा।।


रघुवर प्रातः उठकर माता-पिता गुरुजनों को प्रणाम करते हैं, ये तो काम हम कर सकते हैं कि नहीं? हम भी कर सकते हैं और सब को करना ही चाहिये, लेकिन सात दिन के कृष्ण ने पूतना को मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, छः महीना के कृष्ण ने शकटासुर मार दिया, ये तो हम नहीं कर सकते, पूरे ब्रजमंडल में आग लग गयी और ब्रजवासीयों के देखते-देखते कृष्ण ने उस दावाग्नि का पान कर लिया, ये हम कर सकते हैं क्या? 


कृष्ण ने लाखों गोपियों के साथ रास किया, उसे हम नहीं कर सकते, शुकदेवजी कहते हैं- यह कोई स्त्री-पुरुष का मिलन नहीं था, जीव और ईश्वर का मिलन था, यह रासलीला छः महीनों तक चली थी, क्या छः-छः महीनों तक ब्रज गोपियाँ अपने घर से बाहर रह सकती थी, इसी बात से सिद्ध होता है कि यह तो जीव का प्रभु से मिलन था।


हम कहते हैं कि हम ईश्वर के अंश हैं, इस पर भी मैं यह कहना चाहता हूं, हम जानते हैं अंश का अर्थ होता है थोड़ा यानी छोटा जैसे हम लोग गंगाजी में नहाते हैं, गंगा स्नान करते वक्त हमारे मुंह से निकलता है हर-हर गंगे, हर-हर गंगे, यह जानते हुए भी कि भारत के जितने भी महानगर है, उन ज्यादातर महानगरों की सारी गंदगी गंगाजी में ही जाती है।


चाहे वो रूद्रप्रयाग हो या उत्तरकाशी हो, हरिद्वार हो या देवप्रयाग, ऋषिकेश हो या प्रयाग, सारा गंदा पानी गंगाजी में जाता है फिर भी हम गंगा स्नान करते हैं और बोलते हैं हर-हर गंगे•• क्यों? क्योंकि हम जानते हैं, इन सारे नगरों की गंदगी मिलकर भी गंगा को गंदा नहीं कर सकती, गंगा विशाल है, गंगा महान् है।


लेकिन आपने कहा- मोतीभाई गंगा स्नान करने चलिये, हमने गंगा स्नान करते-करते सोचा कि शालिग्रामजी की सेवा के लिए गंगाजल ले चलूं, सो मैंने एक चांदी की कटोरी में अढ़ाई सौ ग्राम गंगाजल भी लिया, स्नान करके लौटे तो धर्मशाला के कमरे का ताला खोलने के लिये मैंने गंगाजल की कटोरी नीचे रख दी, पीछे से गंदे मुँह वाला सूअर उस गंगाजल की कटोरी में मुंह लगाकर आधा गंगाजल तो पी गया।


मैंने देखा तो मन खिन्न हो गया, तो सज्जनों! अब बताओ कि क्या उस बचे हुए गंगाजल से मैं अपने शालिग्रामजी भगवान् को स्नान कराऊँ या नहीं? नहीं कराऊँगा, क्योंकि सूअर का मुंह लग जाने से वो गंगाजल गंदा हो गया, और बहती हुई गंगा में तो पूरा सूअर ही डूब जाये तो कोई असर नहीं होता, इसी कटोरी से मुंह लगाया तो असर क्यों हुआ? क्योंकि बहती हुई गंगा विशाल है और कटोरी का गंगाजल अंश है, तो जो ताकत उस विशाल गंगा में है वो अंश में नहीं रही।


इसलिये ईश्वर जो विशाल है और हम ईश्वर के अंश हैं, अंश होने के नाते जो कार्य ईश्वर करता है वो हम कैसे कर सकते हैं? इसलिये ईश्वर के चरित्र को प्रणाम करो, ईश्वर के चरित्र का वंदन करो, दूसरी बात- कुछ नास्तिक लोगों को ये कामी पुरुष की सी लीला लगती है, नहीं-नहीं कृष्ण ने जो गोपियों के साथ जो रास किया ये काम लीला नहीं- "का विजय प्रख्यापनार्थ सेयं रासलीला" काम को जीतने के लिये प्रभु ने रासलीला की।


कोई कहता है हम हलवा नहीं खाते, अरे, खाओगे कहाँ से तुम्हें मिलता ही नहीं है, नहीं खाना तो वो है जो मिलने पर भी इच्छा नहीं रहे, कहते हो कि हम तो ब्रह्मचारी है, जब शादी किसी ने करवाई नहीं, अपनी बेटी किसी ने दी ही नहीं, सगाई वाला कोई आया ही नहीं तो ब्रह्मचारी तो अपने आप हो गये।


नैष्ठिक ब्रह्मचारी सिवाय कृष्ण के किसी और के चरित्र में नहीं है, कृष्ण ने कामदेव से कहा- कोपीन पहन कर जंगल में समाधि लगाकर तो काम को सभी जीतते है, लेकिन असंख्य सुंदरी नारियों के गले में हाथ डालकर रासविहार करके भी मैं तुम पर विजय प्राप्त करूँगा, ये तो काम को जीतने की है रासलीला, इसलिये तो प्रभु ने काम को उल्टा लटका दिया आकाश में।


गोपियाँ कृष्ण के संग रास कर रही थी, वे तो वेद के मंत्र थे साक्षात्, जीव है गोपी और ईश्वर है स्वयं श्रीकृष्ण, तो जीव और ईश्वर का जो विशुद्ध मिलन है उसी को हम रास कहते हैं, ये काम लीला नहीं, काम को जीतने वाली लीला है, काम के मन में अभिमान था कि मैंने सबको जीत लिया, ब्रह्मा को जीत लिया, वरूण को जीत लिया, कुबेर को जीत लिया, यम को जीत लिया, वो योगेश्वर कृष्ण को जीतना चाहता था।


प्रभु ने असंख्य सुंदरी गोपियों के बीच रहकर भी काम को जीता, मन और इन्द्रियों पर जिसका नियंत्रण है उसे कोई विचलित नहीं कर सकता, इस रास लीला के प्रसंग को सुनने का मतलब क्या है? रास के मंगलमय् प्रसंग को जो व्यक्ति सुनते है, पढ़ते है और पढ़कर और चिन्तन के द्वारा इस काम विजय को जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं उन व्यक्तियों के ह्रदय में भक्ति प्रगट हो जाती है, और अंत में गोविन्द के चरणों में प्रीति हो जाती है, और ह्रदय का सबसे बड़ा रोग जो काम है वो काम हमेशा के लिये निकल जाता है।


बताओं, जिस रासलीला को सुनने से या पढ़ने से मन का काम निकल जाये, वो स्वयं कामलीला कैसे हो सकती है? परीक्षित के मन का संदेह दूर हो गया, गोविन्द ब्रजवासीयों के वश में है, इनका प्रेम इतना अगाध सागर है कि ब्रजवासीयों के प्रेम के सागर में ब्रह्मा भी गोता लगाये तो थाह नहीं पा सकते, विधाता में सामर्थ्य नहीं है थाह पाने की, एक अलौकिक बात- यहाॅ गोविन्द से मिलना भी है, गोविन्द से मिलन की आकांक्षा भी है तो गोविन्द के प्रति आशीर्वाद का भाव भी है।

 *8 वर्ष की आयु में काम देवता का अभिमान तोड़ दिया । काम देवता ने अपने पांच शक्तिशाली वाणो से पूरी शक्ति लगा दी किंतु भगवान कृष्ण को काम भाव से प्रभावित न कर सके। वहां अलग ही दृश्य दिखने को मिला.. कोई गोपियां कृष्ण का रूप हो जाती और दूसरी गोपियां के संग नृत्य संगीत करने लगती, कोई गोपियां स्वयं को कृष्ण रूप देखकर आश्चर्य से अपनी सखी को कहती ये देखो मैं श्याम सुंदर कृष्ण हूं। ये सब देखते हुऐ काम देवता अचंभित हो गए। वो पहचान ही नही पा रहे थे इसमें असली कृष्ण कौन है। तब उन्हे ज्ञान हुआ। कृष्ण में तो सम्पूर्ण चराचर जगत है। ये लाखों गोपियां कृष्ण का ही रूप है। जो गोपियां वहां मौजूद थीं उसका शरीर उसी समय उसके घर पर भी था क्योंकि उस समय कोई माता पिता अपने बच्चे को रात्रि में नही निकलने देते । उसकी आत्मा परमात्मा के साथ स्थिर था। वो सब गोपियां पिछले जन्म में ऋषियों मुनि ही थे जो अपनी योग भक्ति के बौदौलत भगवान कृष्ण को प्राप्त हो चुके थे। जब भगवान अवतार लेते हैं तो उनके साथ उनके प्रेमी भक्त भी


अवतरित होते है। जैसे त्रेता युग में प्रभु श्री राम के साथ वानर के रूप में देव सेना अवतरित हुए थे। 






4 वर्ष 4 माह की आयु में अघाशुर वध।

7 वर्ष 2 माह की आयु में गोवर्धन पर्वत को अपने अंगूली पर धारण करना।

3 वर्ष की आयु में अग्निपान कर बृजवासियों की अग्नि से रक्षा करना।

11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस के कुश्ती मैदान में भगवान कृष्ण द्वारा कालरीपट्टू ( मार्सल आर्ट) का जन्म ।

11 वर्ष 1 माह की आयु में कंस को उसके घर में घुस कर उसका वध करना ।

6 दिन पूर्ण होने बाद 7 वे दिन की आयु में पूतना वध अर्थात पूतना पर कृपा उसे स्वर्ग लोक भेजना।

कृष्ण गोपियों के कपड़े क्यों छुपाए ?

 



एक समय कुछ गोपियां स्नान करने के लिए यमुना नदी पहुंची । स्नान से पूर्व नदी के तट पर भागवती जगत जननी माता की मूरत बना कर प्रार्थना में उनसे कृष्ण जैसा पति मागने लगी। फिर वहां 5 वर्षीय कृष्ण सीघ्र ही पहुंचे और माता भागवती की मूर्ति और गोपियां के बीच खड़े होकर गोपियां से नटखटता पूर्वक पूछने लगे " क्यों री वानरी क्या मांग रही थीं माता से " अभी तो प्रार्थना कर रही, फिर मेरे घर जाके मैया से शिकायत करेगी "कान्हिया मुझे परेशान करता है।" रूक आज तुझे मज़ा चखाता हूं। इतना सुनते ही सभी गोपियां वहां से भाग निकली और नदी में जाकर स्नान करने लगीं, नदी या कहीं भी नग्न होकर स्नान करना वेद विरुद्ध महापाप है। शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। और जल भगवान कृष्ण का ही एक तत्व स्वरूप है जिस प्रकार अग्नि वायु पृथ्वी आकाश कृष्ण का ही पंच तत्व स्वरूप होता है उसी तरह ये नदी सागर और जल भी श्री कृष्ण का रूप है। वो सर्व्यपत है जब नदी में गोपियां स्नान करने गई थीं तब किशोर अवस्था होने के कारण उसे ज्ञान नही था नग्न होकर नदी जल में स्नान करना महापाप है। चाहे वो छोटा बच्चा ही क्यों न हों। भगवान कृष्ण ढूढते हुए नदी के किनारे पहुंचे गोपियों के कपड़े देखे उस कपड़े को छुपा दिया। स्वयं अंतर्ध्यान हो गए। जब गोपियां स्नान कर बाहर निकली तो उसके कपडे गायब थे अब वो शर्म के मारे नदी में फिर प्रवेश हो गई और जगत जननी माता से प्रार्थना करने लगी। क्योंकि कृष्ण सिर्फ विष्णु अवतार ही नही थे वो माता पार्वती का भी अवतार था । अर्थात परमात्मा तत्व एक ही है अनेक नही। जब गोपियां प्रार्थना कर थक गई कुछ भी संकेत न मिला तब उसे कृष्ण कभी जल में दिखते तो कभी पेड़ की टहनियों पर कभी नदी के तट पर दिखते और उनके साथ उसके कपडे।  


अब वो कृष्ण से क्षमा मागने लगी की अब से वो दुबारा ऐसा अपराध नही करेगी। शास्त्रविरुद्ध कर्म का त्याग करेगी । क्षमा का भाव आते ही उसके कपडे जहां वो रखी उसी स्थान पर फिर से पड़ा हुआ मिला। 


गोपियों को ज्ञान हो गया की परमात्मा चरण को वो तभी प्राप्त कर सकेगी जब वो शास्त्र विरुद्ध कर्म का त्याग करेगी। अन्यथा जन्म जन्मांतर तरह तरह के अंजाने में पाप के बंधन के कारण संसार बंधन भी बना रहेगा शास्त्र विरुद्ध कर्म करते हुए जीव कभी पाप से मुक्त नही हो सकता। उसे एक दिन परमात्मा की शरण जाना ही होगा।

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

कृतज्ञता का महत्व

 🌷 *जय श्री कृष्णा* 🌷



*नीचे दिया गया वाक्य-समूह न्यू टेस्टामेंट में वर्णित गॉस्पेल ऑफ़ मैथ्यूज़ से लिया गया है। और बहुत से लोग सदियों से इसे ग़लत समझते आए हैं, जिस वजह से यह उन्हें बहुत दुविधापूर्ण तथा अबूझ लगता रहा है।*


*"जिसके भी पास है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा। जिसके पास नहीं है, उसके पास जो है वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"*


*आपको मानना होगा कि जब आप इन वाक्यों को पढ़ते हैं, तो ये अन्यायपूर्ण लगते हैं। यह एक तरह से ऐसा कहने जैसा लगता है कि अमीर लोग ज़्यादा अमीर बनेंगे और ग़रीब लोग ज़्यादा ग़रीब। लेकिन इस वाक्य-समूह में एक पहेली है, एक रहस्य है। जब आप इसे सुलझा लेते हैं और इसका सही अर्थ जान लेते हैं, तो आपके सामने एक नया संसार खुलने लगेगा।*


*इस गुत्थी का जवाब सदियों तक बहुत से लोगों के लिए अबूझ रहा है, और इसका जवाब एक शब्द में छिपा हुआ है : कृतज्ञता ।*


*" जिसके भी पास कृतज्ञता है, उसे अधिक दिया जाएगा और वह समृद्ध होगा।*


*कृतज्ञता नहीं है, उसके पास जो है वह सब भी उससे ले लिया जाएगा।"*


*छिपे हुए शब्द को उजागर करते ही जटिल वाक्य समूह आईने की तरह एकदम साफ़ हो जाता है । जब ये शब्द लिखे गए थे, तब से दो हज़ार साल का समय बीत चुका है, लेकिन ये आज भी उतने ही सच हैं, जितने कि वे तब थे : दुर्भाग्य से, यदि आप कृतज्ञ होने का समय नहीं निकाल पाते हैं, तो आपको कभी अधिक नहीं मिलेगा और आपके पास जो है, उसे भी आप खो देंगे। कृतज्ञ होने पर जो जादू हो सकता है, उसका वादा इन शब्दों में है : यदि आप कृतज्ञ हैं, तो आपको अधिक दिया जाएगा और आप समृद्ध होंगे!*


*सनातन धर्म के हर एक मंत्र में कृतज्ञता भी इतनी ही प्रबलता से किया गया है। वेदों के मंत्र और पुराणों के स्त्रोत में कृतज्ञता प्रचुर मात्रा से दिया गया है। कृतज्ञता अर्थात इश्वर के प्रति एहसानमंद होना,उनके गुणों का चिन्तन करना तथा उनके द्वारा निःस्वार्थ भाव से किया गया उपकार के बदले प्रार्थना स्त्रोत और मंत्र के द्वारा उनके प्रति एहसानमंद महसूस या अनुभव करना । जब हम कृतज्ञता महसूस करने लगते है तब हमारे भीतर द्वेष, ईर्ष्या और दुखो का नाश होने लगता है। हमारे जिवन में चमत्कार की बाढ़ सी आने लगती है। आप चाहे किसी भी रूप में इश्वर के प्रति कृतज्ञता महसूस करे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप किस धर्म के अनुयायी हैं या आप धार्मिक हैं भी या नहीं। ये विज्ञान और सृष्टि के एक मूलभूत नियम को बता रहे हैं। यदि आप पूजा पाठ भजन कीर्तन यज्ञ आदि में कृतज्ञता श्रद्धा महसूस नही करते तो वो पूजा पाठ यज्ञ आदि व्यर्थ हो जायेगी । भारत में अनेकों ऐसे संत ऋषि मुनि या स्वयं इश्वर अवतार लिए इन सभी ने अपने समय के लोगों की समझ के अनुसार कृतज्ञता होना सिखाया था संत कबीर, गुरु नानक, संत रविदास, भक्त प्रह्लाद इन सभी ने कृतज्ञतापूर्वक भक्ति के बदौलत ऊंचे शिखर को प्राप्त हुए हैं जब आप प्रार्थना करते हैं तब आपका ध्यान या श्रद्धा ईश्वर के प्रति न हो तब वो प्रार्थना व्यर्थ हो जाती है।*


*भगवद्गीता में अर्जुन की कृतज्ञता पूर्वक भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हे गीता ज्ञान दिया और असंभव कार्य को संभव कर दिए। ब्रम्हा जी ने पहले आदि शक्ति भगवती माता के प्रति कृतज्ञता पूर्वक ध्यान किया तभी उन्होने सृष्टि रचना करने की शक्ति मिली और वो सृष्टि रचना करने में सफल हुए। सच्ची श्रद्धा से स्तुति भक्ति ईश्वर के प्रति माता पिता वाली भाव रखना ये सब कृतज्ञता का ही स्वरूप है। कृतज्ञता भी उतना सटीकता से कार्य करती है जितना गुरुत्वाकर्षण का नियम सटीकता से कार्य करता है।*


"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"


"सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।"


इन्हीं मंगलकामनओं के साथ आपका दिन मंगलमय हो


*आप देख सकते है मंत्र में पूरी दुनियां के लोगों के लिए कृतज्ञता व्यक्त की गई है। आप जितना दूसरो के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे। उतना ही दूसरे के साथ आपको दुगुनी रूप में आरोग्य, सुख समृद्धि और सुंदर भाग्य मिलता है।*


*यह सृष्टि का नियम है*


*कृतज्ञता सृष्टि के एक नियम के ज़रिए कार्य करती है, जो आपके समूचे जीवन को संचालित करता है। कृतज्ञता का नियम हमारी सृष्टि में एक अणु से लेकर ग्रहों की गतियों तक सारी ऊर्जा को शासित करता है और इस नियम के अनुसार, "समान ही समान को आकर्षित करता है। " यह सृष्टि का नियम ही है, जिसकी बदौलत हर जीवित प्राणी की कोशिकाएँ एक साथ जुड़ी रहती हैं, जिसकी बदौलत हर भौतिक वस्तु का रूप कायम है। आपके जीवन में यह नियम आपके विचारों और भावनाओं पर कार्य करता है, क्योंकि आप भी ऊर्जा ही हैं और आप जैसा भी सोचते हैं, जैसा भी महसूस करते हैं, वैसा ही परिस्थितियों घटनाओं को अपनी ओर खींचते हैं।*


*यदि आप सोचते हैं, "मैं अपनी नौकरी को पसंद नहीं करता," "मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है,*


*"मुझे आदर्श जीवनसाथी नहीं मिल सकता," "मैं अपने बिल नहीं चुका सकता," "मैं सोचता हूँ*


*कि मुझे कोई रोग हो रहा है," "वह मेरी क़द्र नहीं करती," "मेरी अपने माता-पिता के साथ पटरी*


*नहीं बैठती," "मेरा बच्चा बहुत बड़ी समस्या है," "मेरा जीवन अस्तव्यस्त हो गया है, " या "मेरा*


*वैवाहिक जीवन संकट में है, " तो आप अपनी ओर ऐसे ही अधिक अनुभवों को आकर्षित करेंगे।*


*लेकिन यदि आप उन चीज़ों के बारे में सोचते हैं, जिनके लिए आप कृतज्ञ हैं, जैसे "में अपनी नौकरी से प्रेम करता हूँ," "मेरा परिवार बहुत मददगार है," "मेरी छुट्टियाँ बेहतरीन रहीं," "मैं आज गज़ब का अनुभव कर रहा हूँ" "मुझे अब तक का सबसे बड़ा टैक्स रिफंड मिला है, " या " बेटे के साथ कैंपिंग करने में मेरा वीकएंड बेहतरीन गुज़रा," और आप सचमुच कृतज्ञता महसूस करते हैं, तो का नियम कहता है कि आपको जीवन में ऐसी ही अधिक चीजें मिलेंगी। यह कुछ उसी तरह काम करता है, जिस तरह धातु चुंबक की ओर खिंचती है; आपकी कृतज्ञता चुंबकीय है, और आपके पास जितनी अधिक कृतज्ञता होती है, आप चुंबक की तरह उतनी ही अधिक समृद्धि को अपनी ओर आने की संभावना को बढ़ा लेते हैं। यह सृष्टि का नियम है!*


*आपने इस तरह की कहावतें सुनी होंगी, “जो भी जाता है, लौटकर आता है," "आप जो बोते हैं, वही काटते हैं, " और "आप जो देते हैं, वही पाते हैं।" देखिए, ये सारी कहावतें उसी नियम का वर्णन कर रही हैं। ये सृष्टि के उस सिद्धांत का वर्णन भी कर रही हैं, जिसे महान वैज्ञानिक सर आइज़ैक न्यूटन ने खोजा था।*


*न्यूटन की वैज्ञानिक खोजों में सृष्टि में गति के मूलभूत नियम शामिल थे, जिनमें से एक यह है : हर क्रिया की हमेशा विपरीत और समान प्रतिक्रिया होती है।*


*जब आप कृतज्ञता के विचार को न्यूटन के नियम पर लागू करते हैं, तो यह इस प्रकार होता है। धन्यवाद देने की हर क्रिया हमेशा पाने की विपरीत प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, यानी कि आप पाते हैं। और आप जो पाते हैं, वह हमेशा आपके द्वारा दी गई कृतज्ञता की मात्रा के समान होगा। इसका अर्थ है कि कृतज्ञता की क्रिया पाने की प्रतिक्रिया को शुरू कर देती है! और आप जितनी ईमानदारी और गहराई से कृतज्ञता महसूस करते हैं (दूसरे शब्दों में, जितनी अधिक कृतज्ञता देते हैं), आप उतना ही अधिक पाएँगे।*


प्रति दिन कृतज्ञता के महत्व को आवश्य पढ़े इसमें ऐसी शक्ति छुपी है जिसका अनुसरण करने पर आप चौक जायेंगे आपके भीतर इतनी बड़ी शक्ति है। जिसका उपयोग आप अपने विरुद्ध भी करते हैं और अपने कल्याण के लिए करते हैं इसलिए भगवान कृष्ण भगवद्गीता अ०6 श्लोक 5 में कहते हैं  


" अपने द्वारा अपना संसार समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।।5।।


इस श्लोक का अर्थ अनंत है संसार भर के विद्वान अपने अपने समझ के अनुसार इस श्लोक का अर्थ समझते हैं। फिर भी मुझ जैसा तुच्छ बालक जो कुछ समझा आप से साझा किया


परमात्मा हमे हर प्राकृतिक वस्तु मुफ्त प्रदान करते हैं । इसलिए हमारा कर्त्तव्य है उनके प्रति हर छोटी से छोटी चीजों के लिए प्रेम पूर्वक श्रद्धा पूर्वक धन्यवाद करें। शिकायत कभी न करें। तभी हम अपनें शक्तियों का सही उपयोग कर पाएंगे। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 22 में खुद आप से वादा कर रहें है जो उनके चिन्तन में प्रेम पूर्वक कृतज्ञता पूर्वक डूबा रहता है उनका योगक्षेम वो स्वयं वहन करते हैं । 


*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते ।*

*तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।22।।*


जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का योग क्षेम में स्वयं प्राप्त कर देता हूँ ।।22।।


ये शरीर जहाज है इस जहाज का चालक हमारा मन है । जब हमारा मन भगवान कृष्ण के प्रति कृतज्ञता महसुश करने लगता है तब इस शरीर रुपी जहाज के चालक स्वयं श्री कृष्ण से मार्गदर्शन पा कर इस भवसागर रुपी संसार से पार कर जाता है। इस दुनिया में आप और आपका परमात्मा है। तीसरा कोई नही है। आप जितना ज्यादा परमात्मा के प्रति कृतज्ञता होंगे उतनी ही तेजी से अपने जीवन में चमत्कार पाएंगे आप चौक जायेंगे। 


आप बिना कृतज्ञता के अपने अभिमान , द्वेष, ईर्ष्या, प्रमाद, आलस्य आदि को नाश नही कर सकते आप बिना कृतज्ञता के कुछ पा नही सकते। बिना कृतज्ञता का कोई पूजा पाठ यज्ञ भजन कीर्तन सफल नही होता। 



– राहुल झा 

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

श्रीमद्भगवद्गीता : अथ प्रथमोऽध्याय


 *🕉श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक स्वाध्याय 🕉*

         *🌹!श्री हरि!🌹*


  *🙏ॐ परमात्मने नमः🙏*


अथ प्रथमोऽध्यायः-


अर्जुनविषादयोग

दोनों सेनाओं के प्रधान शूरवीरों और अन्य महान वीरों का वर्णन


धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1-1॥


dhṛtarāṣṭra uvāca

dharmakṣētrē kurukṣētrē samavētā yuyutsavaḥ.

māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya৷৷1.1৷৷


समवेता: = इकट्ठे हुए; युयुत्सव: = युद्ध की इच्छा रखने वाले; मामका: = मेरे; च = और; पाण्डवा: = पाण्डु के पुत्रों ने; किम् = क्या; अकुर्वत = किया


धृतराष्ट्र[1]बोले-


हे संजय[2] ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र[3] में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु[4] के पुत्रों ने क्या किया ? ।।1:1।।


Dhratrastra said:


Sanjaya, gathered on the sacred soil of kuruksetra, eager to fight, what did my children and the children of pandu do?(1:1)


संजय उवाच

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥1-2।।


sañjaya uvāca

dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṅ vyūḍhaṅ duryōdhanastadā.

ācāryamupasaṅgamya rājā vacanamabravīt৷৷1.2৷৷


तदा = उस समय; दुर्योंधन: = दुर्योधन ने; व्यूढम् = व्यूहरचनायुक्त; पाण्डवानीकम् = पाण्डवों की सेना को; द्रष्टा= देखकर; तु = और; आचार्यम् = द्रोणाचार्य के; उपसंगम्य = पास जाकर (यह); अब्रवीत् = कहा;


उस समय राजा दुर्योधन[3] ने व्यूह रचनायुक्त पांडवों [4] की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य[5]के पास जाकर यह वचन कहा ।।2।।


Sanjaya said:


O King, after looking over the army gathered by the sons of Pandu, King Duryodhana went to his teacher and began to speak the following words: (2)


पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥


paśyaitāṅ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṅ camūm.

vyūḍhāṅ drupadaputrēṇa tava śiṣyēṇa dhīmatā৷৷1.3৷৷


तब = आपके; धीमता= बुद्धिमान्; शिष्येण = शिष्य; द्रुपदपुत्रेण = द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा; व्यूढाम् = व्यूहाकार खड़ी की हुई; पाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डुपुत्रों की; एताम् = इस; महतीत् = बड़ी भारी; चमूम् = सेना को; पश्य = देखिये


हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद[3] पुत्र धृष्टद्युम्न[4] द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डु[5]पुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये ।।3।।


Behold, master, the mighty army of the sons of Pandu arrayed for battle by your talented pupil, Dhristadyumna, son of Drupada.(3)


अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: ।।4।।

धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् ।

पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगव: ।।5।।

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: ।।6।।


atra śūrā mahēṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi.

yuyudhānō virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ৷৷1.4৷৷

dhṛṣṭakētuścēkitānaḥ kāśirājaśca vīryavān.

purujitkuntibhōjaśca śaibyaśca narapuṅgavaḥ৷৷1.5৷৷

yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān.

saubhadrō draupadēyāśca sarva ēva mahārathāḥ৷৷1.6৷৷


अत्र = इस (सेना) में; महेष्वासा: = बड़े बड़े धनुषों वाले; युधि = युद्ध में; भीमार्जुनसमा: = भीम और अर्जुन के समान; शूरा: = बहुत से शूरवीर; (सन्ति) = हैं (जैसे); युयुधान: = सात्यकि; द्रुपद: = राजा द्रुपद; (4) धृष्टकेतु: = धृष्टकेतु; चेकितान: = चेकितान; वीर्यवान् = बलवान्; कशिराज: = काशिराज; पुरूजित् =पुरूजित्; कुन्तिभोज: = कुन्तिभोज; च = और; नरपुड़व = मनुष्यों में श्रेष्ठ; शैब्य: = शैब्य;(5) विक्रान्त: = पराक्रमी; युधामन्यु: = युधामन्यु; वीर्यवान् = बलवान्; उत्तमौजा: = उत्तमौजा; सौभद्र: = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु; द्रौपदेया: = द्रौपदी के पांचो पुत्र (यह); सर्वे =सब; महारथा: = महारथी हैं;(6)


इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम[4] और अर्जुन[5] के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद[6], धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रा[7] पुत्र अभिमन्यु[8] एवं द्रौपदी[9] के पाँचों पुत्र महारथी हैं ।।4-5-6।।


There are in this army heroes wielding mighty bows and equal in military prowess to Bhima and Arjuna-Satyaki and Virat and the maharathi(warrior chief) Drupada; Dhrstaketu,Chekitana and the valiant king of Kasi, and Purujit, Kuntibhoja, and Saivya, the best of men and mighty Yudhamanyu, and valiant Uttamauja, Abhimanyu, the son of Subhadra, and the five sons of Draupadi,-all of them maharathis (warrior chiefs). (4,5,6)


*【शेष क्रमशः कल】*


अधिकांश हिन्दू तथाकथित व्यस्तता और

समयाभाव के कारण हम सब सनातनियों

के लिए परम पूज्यनीय 

श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय करना छोड़

चुके हैं, इसलिए प्रतिदिन *गीता* जी के कुछ 

*श्लोकों को* उनके *हिंदी*/इंग्लिश अर्थ सहित पोस्ट

कर 

सम्पूर्ण *गीता* जी का स्वाध्याय कराने का

यह प्रण लिया गया है . आप सभी भी गीता जी के 

 श्लोको को प्रतिदिन* पढ़ने व *पढ़वाने* और अर्जुन की भांति ज्ञान का अनुशरण करने का

*संकल्प लें lllll*


🛕🕉⚜️🌷🗡️🚩🔱🐚⚔🇮🇳


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नाम जप किस प्रकार होना चाहिए ।

प्रश्न . नाम किस प्रकार जप होना चाहिए ? जिससे हमे लाभ हो ? उत्तर:– सबसे पहले नाम जप जैसे भी हो लाभ होता ही है ... फिर भी आप जानने के इक्ष...