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शनिवार, 3 सितंबर 2022

चिन्तन का विषय:– चिन्तन करे और अपने सपने को पूरा करे ।

🌷श्री हरि 🌷 🔱 ॐ नमः शिवाय 🔱🚩 जय श्री राम🚩

 जो जिस जिस भाव का चिंतन ( स्मरण) करता है वो उस उस फल को प्राप्त होता है। एक भगवदभक्त इसलिए श्री भगवान को प्राप्त होता है। क्योंकि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा भगवान का स्मरण किया। एक ईश्वर (शिव)भक्त ईश्वर को इसलिए प्राप्त होता है क्योंकि उसने शिव को याद किया। एक गरीब लड़का बड़ा होकर समाज का सबसे सफल व्यक्ति बनता है क्योंकि उसने जीवन में सबसे ज्यादा सफल होने के दृश्य का चिंतन किया । एक रोगी इसलिए स्वस्थ हुआ क्योंकि उसने स्वस्थ होने के दृश्य का चिंतन किया। एक सीधा बालक आगे जाकर अपराधी बन गया क्योंकि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा अपराधी विचार या अपराधियों का चिंतन किया। हम हमेसा चिंतन करते है चाहे वो किसी भी मामले में हो हमारा पहला कर्म चिंतन करने से सुरु होता है उसके फल स्वरूप हम वैसे फल को प्राप्त करते हैं। इसलिए हमे विपरित परिस्थितियों में भी अपने मनचाही सपने के दृश्य का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे ऐसे मनचाही सपने का चिन्तन करना चाहिए जिससे किसी का नुकसान न हो नही तो सबसे पहले हमे नुकसान होगा । हमे हमेशा प्रभु के चरण का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा प्रभु के नाम का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा प्रभु से मिलने वाले दृश्य का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा शान्ति, आनंद,सुख –समृद्धि और प्रभु भक्ति का चिन्तन करते रहना चाहिए। हमे हमेशा सफलता का चिन्तन करते रहना चाहिए। 

 — राहुल झा 

 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। 
 कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। 

 अर्थ: कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है। 

 बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। 

 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 
 मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।। 

 अर्थ: हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। 

 इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

 य यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
 तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।।6।। 

 हे कुन्ती[1] पुत्र अर्जुन[2] ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता हैं; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।।8.6।।

 यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः। 
 भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।9.25।। देवताओं को पूजने वाले देवताओ को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।इसीलिये मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता ।।25।। 
 
– श्रीमद्भागवतगीता

गुरुवार, 23 जून 2022

किसी भी दुःख विपत्ती से मुक्ति कैसे पाए.

भगवाद्गीता 

*तातपर्य*

*श्लोक ५-१०*


आपकी दृष्टि जहाँ तक जा रही है या जहाँ तक नहीं भी जा रही है वहाँ तक परमत्मा ही परमत्मा है उसके शिवाय यहाँ कुछ नहीं है जिस प्रकार एक सूर्य की प्रकाश से अनेको रंग दीखते है उसी प्रकार से यहाँ परमत्मा भिन्न भिन्न रूपों में विराजमान है जिस प्रकार दूध से घी दही मिठाई छाछ लस्सी बनते है इन सभी में दूध का ही अंश होता है उसी प्रकार से परमत्मा से ही ये समस्त जगत बना है अर्थात परमत्मा अपने एक अंश मात्र में धारण किए हुए है जिस प्रकार मकड़ी से उसके जाल निकलते है फिर वही जाल को मकड़ी अपने भीतर समा लेती है उसी प्रकार भगवती मूल प्राकर्तिक अर्थात परमत्मा से ये समस्त जगत प्रकट होते है और फिर उसी में विलीन हो जाते हैं


*हम यहाँ क्यों आते है*

हम जीव शरीर धारण क्यों करते हैं


जिस प्रकार बच्चे अपने उम्र के अनुसार विद्यालय शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं उसी प्रकार हम अज्ञानी जीव यहाँ स्वयं और परमात्मा के विषय में अध्यात्म ज्ञान प्राप्ति के लिए आते हैं अगर इस जन्म में ज्ञान की प्राप्ति या परमत्मा की भक्ति नहीं हुई तों ये जीवन व्यर्थ हैं अनुभव के आधार पर और कुछ नहीं कहूंगा आप सिर्फ इतना विश्वास रखो यहाँ वहाँ दाया बाया ऊपर निचे जहाँ देखो वहाँ परमत्मा ही परमत्मा हैं उसके शिवाय कुछ नहीं हैं यहाँ हमें अज्ञानता की माया ने हमें अंधा बना दिया हैं जिसके कारण परमत्मा को नहीं देख पाते हैं जिस प्रकार एक वृक्ष का अस्तित्व जड़ से पत्ती तक होता हैं उसी प्रकार परमत्मा का अस्तित्व अनंत ब्रह्माण्ड में हैं उसके शिवाय और कुछ नहीं हैं।


जिस प्रकार एक गुलाब के पौधे से कांटे  और फूल उतपन्न होते हैं उसी प्रकार एक परमत्मा से देव- असुर, अच्छे -बुरे लोग उतपन्न होते हैं उसी प्रकार एक माँ से असुर और देव प्रकृति के संतान उतपन्न होते हैं। इन दोनों में परमत्मा का ही अंश हैं माया के द्वारा जिसका ज्ञान नेत्र अंधा हो गया वो स्वयं को या परमत्मा को नहीं जानता हैं इसलिए वो अच्छे बुरे कर्मो में भेद नहीं कर पाते हैं


इन्द्रियों के विषय में आप कितना ही विषयी हो आप उस पर ध्यान मत दो आप सिर्फ अपने आस पास परमत्मा के अनंत रूपों पर ध्यान दो आप अपने हृदय सिर्फ  इतना ही धारण कर लो " मैं परम् ब्रम्ह परमत्मा माँ काली -दुर्गे, माँ राधेकृष्ण माँ गौरीशंकर माँ सीताराम, माँ सरस्वती - ब्रम्हा जी का प्रिय संतान हूँ और ये सब मुझ पवित्र आत्मा के माता पिता जी हैं 

आप कितना ही इन्द्रियों के विषयी हो आपका नाश नहीं हो सकता हैं।


हम करोड़ो जन्मों से भटक रहे हैं अज्ञानता के कारण....

हमारी इन्द्रियों ने यहाँ फसा रखा हैं हमारी व्यर्थ इक्षाओं ने यहाँ फसा रखा हैं जबकि आप स्वयं सब कुछ से परिपूर्ण आत्मा हो आप सब कुछ पा सकते हो


बस आवश्यकता हैं तों सिर्फ इतना की आप दुःख सुख नाकारत्मक ऊंच नीच गरीब अमीर को समान समझने की... समझने की आवशयकता इतनी हैं की आपके किसी विषय पर केंद्रित ध्यान से प्रवाह होने वाली ऊर्जा का सही उपयोग करने की... अगर आप दुःख पर ध्यान देते हैं तों वो और बढ़ेगा जिससे आप स्वयं परेशान होकर सुखी होने के लिए वहाँ से ध्यान हटा कर मन बहलाने की कोसिस करते हो, अगर आप सुख पर सिर्फ ध्यान देते हो तों वो और बढ़ता जाता हैं उसमे आपके केंद्रित ध्यान से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा ही हैं ज़ो सुख दुःख वाली घटना को निर्माण करता हैं


अब आप सुख दुख धन दौलत शांति अशांति पर ध्यान देते कैसे हो 

अगला व्यख्यान इस लिंक पर है


https://rahuljha014797.blogspot.com/2022/06/blog-post.html?m=1

 तब तक के लिए आज आपको अपने ऊर्जा का सही उपयोग करने का मार्ग बताने का प्रयास करूंगा।


जैसा की आप जानते हैं परमत्मा सर्व व्याप्त हैं और आपके भीतर आत्मा उन्ही का अंश है 


आँख बंद करें हाथ पाव मोड़ कर बैठ जाए पीठ सीधी या ढीली कर ले हाथ पाँव भी ढीली कर ले घरी का समय देख ले ५ -१० मिनट सिर्फ अपने साँसो पर ध्यान केंद्रित कीजिये , सांस को अपने अनुसार चलने दीजिये आप सिर्फ अपने सांस पर ध्यान केंद्रित कीजिए और उस प्राण वायु को परमत्मा का स्वरुप समझ कर ग्रहण करें। किसी विचारो पर ध्यान मत दीजिए आपनी ऊर्जा व्यर्थ के विचारो पर बर्बाद न करें आप सिर्फ चल रहे शांसे पर ध्यान दे शांति महसूस कीजिए


१० मिनट के बाद आप कहने के साथ दिमाग़ में तस्वीर देखिए " मैं परमत्मा का प्रिय पुत्र हूँ मुझ में परमत्मा का प्रेम भक्ति और प्रेम शक्ति समा रही हैं मैं आत्म शांति को इसी समय प्राप्त कर रहा हूँ मैं परमत्मा के चरणों में मस्तक झुक कर प्रणाम और धन्यवाद करता हूँ अपनी प्रेम भावनाओ को बढ़ने दे।


मेरे और भगवत भक्तो के सभी विघ्न को भगवान गणेश नाश कर रहे हैं मैं उनके चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ


मेरे और भगवत भक्त के भीतर माँ दुर्गा और माँ काली सभी दुर्गनो का नाश कर धर्म की स्थापना कर रही हैं मेरे और भगवत भक्तो के दुष्ट शत्रु को नाश कर रही हैं मैं माता दुर्गा और माता काली के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद कर रहा हूँ।


मुझे और सृस्टि के सभी ज्ञानियों को माता सरस्वती के कृपा से ज्ञान प्राप्त हो रहा हैं मैं माता सरस्वती और ब्रम्हा जी के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ 


मुझे और भगवत भक्तो को माता लक्ष्मी धन सम्पदा सुख समृद्धि शांति इसी समय प्रदान कर रही हैं मैं माता लक्ष्मी और श्री हरि के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद अर्पण करता हूँ।


मुझे और भगवत भक्तो को माता पार्वती इसी समय जन्म मृत्यु से मुक्त कर रही हैं मैं माता पार्वती और महादेव के चरणों में हृदय से प्रणाम और धन्यवाद करता हूँ।


इस व्यख्यान को ध्यान में 9 बार दोहराए। रात्रि को शीघ्र सोए ब्रम्ह मुहूर्त तीन बजे जागकर शौच आदि होकर मुँह पर पानी मारे हो सके तों स्नान कर ले फिर ध्यान में बैठे। 

आप ध्यान कभी भी कर सकते हैं कही भी कर सकते हैं किसी समय में कर सकते हैं किन्तु अपने शरीर और मन को किसी मंदिर  की भांति पवित्रता बनाए रखे। ध्यान करने से पहले मुँह हाथ पाँव अवश्य धोए ।


ये ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण हैं आप इसे अपने हृदय में धारण कर ले


ऊर्जा के सही उपयोग के विषय में आपको ध्यान के दौरान ज़ो कहने के लिए बताया हूँ वो आप प्रत्येक दिन नियमित रूप से प्रातः काल और रात्रि में सोते समय अवश्य कहे।


जिस प्रकार एक मरीज को दवा नियमित रूप से दिया जाता हैं और वो नियमित रूप से दवा लेने के बाद स्वस्थ हो जाता हैं उसी प्रकार नियमित रूप से अपने ऊर्जा का सही उपयोग करने के लिए ध्यान के दौरान कहे।


जिस प्रकार मरीज को सही समय पर इलाज नहीं मिलता और बहुत देर हो जाती हैं फिर दवा मिल भी जाए तों असर नहीं करता उसी प्रकार देर न करें मानव शरीर बहुत दुर्लभ हैं उसमे भी ब्रह्मण शरीर बहुत दुर्लभ हैं इसलिए अपने जीवन को व्यर्थ के दुःख में न कटने दे अपने आप को दुःख भरी संसार में फिर से न गिड़ने दे ।


आप सभी भगवत भक्तो और आपके भीतर आत्मा राम के चरणों में प्रणाम 🙏❤️


🚩धर्म की जय हो🚩

🚩अधर्म का नाश हो🚩

🚩गौ माता की रक्षा हो🚩

🚩विश्व का कल्याण🚩


🙏❤️जय श्री सीता राम ❤️🙏


🚩जय श्री राम 🚩


- rahul jha

बुधवार, 8 जून 2022

हमें सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत क्यों मिलता हैं?

जय श्री राम 🚩🙏श्रीराम भक्त 🙏🚩

  आप सुख - दुःख, शांति - अशांति, धन दौलत पर ध्यान कैसे दे रहे हो*

आप आज ज़ो कुछ हैं वो पिछले विचारो का परिणाम है - महत्मा बुद्ध किसी भी कर्म की शुरुआत एक *विचार* से सुरु होती है आधुनिक विज्ञान के अनुसार हमारे दिमाग़ मे प्रत्येक दिन अधिकतम 72000 विचार आते हैं दिमाग़ मे विचार आना तभी बंद होता है जब आप नींद की गोद मे चले जाते हैं 72000 विचारो मे से हम कुछ ही विचारो पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिससे प्रेरित होकर दैनिक कार्य या कोई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं.... आप भोजन करने से पहले भोजन के बारे मे सोचते हैं, सुबह मे आप जब न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं तब आप समाचार को पढ़ने के साथ समाचार से संबंधित मानसिक चित्र देख रहे होते हैं आप सोने से पहले सोने के बारे मे सोचते हैं आप कोई भी कार्य करने से अवश्य सोचते हैं। किसी से बात करते हैं तब आप पहले सोचते हैं फिर बोलते हैं। जागृत अवस्था मे आपके दिमाग़ मे हमेसा विचार चलता हैं आप हर पल हर क्षण नकरात्मक सोच रहे होते हैं या सकारात्मक सोच रहे होते हैं आपके इक्षा अनुसार जीवन चल रहा है तों आप सुखी होते हैं यदि आपके इक्षा के विरुद्ध जीवन चल रहा है तों दुखी होते हैं एक छोटा सा उदाहरण देकर समझाना चाहूंगा एक व्यक्ति पैसा इसलिए कामाना चाहता है क्योंकि वो जीवन मे सुख शांति चाहता है। अक्सर लोग अपने युवा अवस्था मे सोचते हैं

*"मैं असफल नहीं होना चाहता हूँ।"*

 *मुझे जीवन मे धन का आभाव न हो*

 *मैं जीवन मे दुःखी नहीं रहना चाहता हूँ*

*मैं निचे दर्जे का नौकरी नहीं करना चाहता*

वो जब ऐसा सोचते हैं तभी फिसल जाते हैं, उन्हें पता नहीं होता है वो अपनी ऊर्जा को बुरे भविष्य के रूप मे रूपत्रण कर रहे होते हैं क्योंकि उनका ध्यान सिर्फ असफलता, आभाव और दुःख पर केंद्रित है। हमारा दिमाग अच्छे बुरे मे भेद नहीं करता है इसलिए जिस विचार पर आपका ध्यान केंद्रित होता है आपकी ऊर्जा उसी रूप मे रूपत्रण हो रही होती है, उनके अंदर शंका, असफलता का डर बैठा है तभी वो असफल नहीं होना चाहते हैं। इसलिए वो जीवन अच्छी नौकरी करने के बाद भी सुखी नहीं है धन दौलत होने के बाद भी उसका भोग नहीं कर पाते है खाने के लिए अच्छे स्वादिस्ट भोजन तों है पर डॉक्टर ने परहेज से रहने को कहा है सोने के लिए सोफे तों हैं पर डॉक्टर ने पतले बिस्तर पर सोने को कहा है सफलता का अर्थ हैं सफल जीवन पूर्ण सुख शांति हमने अधिकतर लोगो को देखा हैं वो लाख पैसे कमा लेते हैं किन्तु वो अपने जीवन कही न कही अशांति, बैचेनी, तनाव महसूस करते हैं। मैं ये नहीं कहता पैसा धन दौलत बुरा हैं, धन दौलत एकमात्र अमीरी का हिस्सा हैं किन्तु वो अमीरी नहीं ज़ो सुख शांति की अमीरी होती हैं। आपका ध्यान सिर्फ सफलता होना चाहिए उदाहरण देकर समझाता हूँ
"*मैं जीवन मे भरपूर सफल होना चाहता हूँ* "

*मैं जीवन मे भरपूर धन दौलत और उसका भोग चाहता हूँ*

 *मैं उच्च पद वाली नौकरी करना चाहता हूँ।*
जब आप इन जैसे वाक्यों का प्रयोग करते हैं तों आप सही रास्ते पर हैं। आप सिर्फ इन तीन वाक्यों को सुबह शाम रात्रि को सोते समय कहे और अपने इन्द्रियों को महसूस कराये अर्थात आप महसूस करें आपकी ऊर्जा अच्छे भविष्य के रूप मे रूपत्रण होने लगेगी और आप १०१% सकारात्मक जीवन जियेंगे और एक सफल व्यक्ति के रूप मे देखे जायेंगे। अगर आप बीमार हैं तों बीमारी पर ध्यान न दे बल्कि आप सिर्फ स्वस्थ होने पर ध्यान दे जिस दिन आप स्वस्थ थे उन पलो को याद करें आप स्वयं के स्वस्थ होने का महसूस करें और कहे " मैं पहले अच्छी स्वस्थ पा रहा हूँ परमत्मा को धन्यवाद और उनके चरणों मे हृदय से प्रणाम करता हूँ आप दवा ले या न ले उससे कोई फर्क नहीं पड़ता आपके बीमारी की इलाज आपके दिमाग़ मे हैं जब लगे दवा की अवश्यकता है आपको दवा पर ही पूर्ण विस्वास है तों आपको दवा अवश्य लेना चाहिए। हमने कोरोना काल मे कई ऐसे पेसेंट को देखा है ज़ो करोना संक्रमित हो चुके थे किंतु उन्हें पता नहीं था और वो स्वस्थ भी हो गए। अगर आप किसी बात को लेकर चिंतित हैं तों आप सिर्फ समाधान पर ध्यान केंद्रित करें और कहे " मेरे अनंत बुद्धिमता मेरे दिमाग की क्षमता के पास हर परेशानी का समाधान है वो हमें समाधान का मार्ग दिखाए। जैसे आप किसी व्यक्ति से विचार विमर्श मांगते हैं वैसे अपने अंतर आत्मा से समाधान की मांग करें ऐसा तब तक करें जब तक आपको समाधान न मिल जाए। आपको परेशानी का समाधान किसी व्यक्ति के द्वारा मिल सकता है किसी बच्चो के द्वारा मिल सकता है आप स्वयं समाधान की ओर खींचे चले जायेगे आपको पता भी नहीं चलेगा क्योंकि वो परमत्मा सर्व व्याप्त है वो हर क्षण हमारी सहायता करने के लिए तैयार बैठे हैं किन्तु हम स्वयं अपनी ऊर्जा को अनजाने मे संकट बना लेते हैं अगर आपके पास धन नहीं है तों सिर्फ धन पर ध्यान केंद्रित करें और कहे मेरे पास आत्मिक खजाना है मेरे पास दूसरे को देने के लिए दुसरो की सेवा के लिए स्वयं की सहायता के लिए धन प्रवाह हो रहा है और ऐसा ५ मिनटों तक महसूस करें शंका न करें नहीं तों यही शंका आपके राह मे और शंका को उतपन्न करेगा दैनिक जीवन मे ईश्वर से प्रार्थना को सामील कीजिये प्रार्थना एक सकारात्मक प्रक्रिया है।

 इंसान जैसा सोचता है वैसा बन जाता है - श्री कृष्ण

सृस्टि मे सब कुछ पहले से निर्माण कर दिया गया है बस अवस्य्क्ता है तों केवल मनुष्य के कल्पना मात्र की है - श्री मदभगवद महापुराण
आप जीवन को जितना कठिन समझते हैं ये उतना ही आसान है जब आप अपनी ऊर्जा का उपयोग सही रूप से करना समझ जायेंगे तब। मैं अपना एक अनुभव आप से साझा करना चाहूंगा। बचपन के ४ वर्ष की आयु मे तंत्र मंन्त्र के शक्तियों और धोखे से भोजन मे विष मिलाकर अन्य लोगो द्वारा मुझे खिलाया गया था अचानक तबियत बिगड गयी मेरी हालत सीरयस हो चुकी थी मेरे पिता जी को सुचना गयी पर वो मजबूर थे उन्हें सुचना सुन कर दुःख भी हुआ किन्तु जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता तब तक वापस नहीं लौट सकते थे वो धर्मयज्ञ (महायज्ञ ) मे गए हुए थे उस यज्ञ के नियम अनुसार कुछ भी हो जाए साधक को उठना नहीं है चाहिए स्वयं के पुत्र पत्नी माता पिता की मृत्यु ही क्यों न हो जाए। किसी डॉक्टर ने रेफर कर दिया तों किसी डॉक्टर ने माँ को जवाब दे दिया अब ये जीवित नहीं रहेगा बहुत देर हो चुकी है कोई भी डॉक्टर इस बच्चे बचाने मे सक्षम नहीं है मेरी माँ अब हार चुकी थी अब कोई रास्ता नहीं बचा था अचानक उसने आँशु पोछते हुए अपने निराशा को ऐसा अटूट विस्वास मे बदल लिया जैसे मुझ पर किसी विष का प्रभाव हुआ ही नहीं उसने मुझे घर लाकर सुला दिया अब मेरी के माँ पास मुझे बचाने का एक ही उपाय था वो था प्रार्थना अब वो डॉक्टर की बातो को दिमाग से बाहर निकाल कर पूरी विश्वास के साथ अपने इष्ट से प्रार्थना करने लगी और उनका धन्यवाद करना सुरु कर दिया मानो ईश्वर ने मुझे बचा लिया। मैं वर्तमान मे जीवित हूँ आगे भी रहूंगा उसने बार बार इस विचार के साथ प्रार्थना और धन्यवाद रूपी भावना देकर अपने विश्वास की ऊर्जा क काफी बढ़ा लिया था उसने कल्पना करना सुरु किया जब तक वो जीवित रहेगी तब तक वो मुझे पूर्ण स्वस्थ रूप मे मुझे देख पाएगी। उसने ईश्वर से गहरी भावनाओ के साथ प्रार्थना करना सुरु किया. आज देखो मैं आपके सामने हूँ। इस घटना से यही सिखने को मिलता है सुख शांति धन दौलत की कमी को कभी महसूस न करें आपको इसमें से जिस चीज की अवस्य्क्ता है उस के लिए पहले ईश्वर को धन्यवाद करें। मानो आपको इसी समय मिल गया हो आपने दिमाग को विश्वास दिलाए ज़ो हम वर्तमान मे सोचते है वही हमारा भविष्य बनता है विचार वस्तु बन जाते है। परिणाम शीघ्र ही नहीं मिलते ये धीरे धीरे पेड़ पौधे की भाँती बनते है और इसमें प्रत्येक दिन धन्यवाद प्रार्थना और कृतज्ञता के खाद पानी देकर बड़ा आप ही करते हैं कर्म का फल मिलता अवश्य है। आप सोचते है तों कर्म कर रहे होते हैं आप सोते हैं तों कर्म कर रहे हैं जैसे रात को सोने का फल उत्साह स्वस्थ और नई ऊर्जा के रूप मे मिलता है वैसे ही हमारे सोचने का फल भिन्न भिन्न रूपों मे मिलता है *अगर आप अस्वस्थ है तों दूसरे के स्वस्थ को देख कर उसके स्वस्थ के लिए धन्यवाद करें* *अगर आप निर्धन हैं तों धन दौलत वाले धनी व्यक्ति के लिए ईश्वर को धन्यवाद करें* *अगर आप निःसंतान है तों दूसरे के संतान को देखकर ईश्वर को धन्यवाद करें* *आप ज़ो भी पाना चाहते है उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद करें आज भले ही आपके पास न हो जिनके पास है उस व्यक्ति के लिए धन्यवाद करें क्योंकि ईश्वर ने आपको आपकी चाही गयी वस्तु के सामान वस्तु अन्य लोगो के पास दिखाया है और बहुत जल्द आपको भी मिलेगी सिर्फ धन्यवाद ही नहीं सच्चे भवाना के साथ ध्यान को केंद्रित करने के साथ धन्यवाद करें*

*आपको किसी शिकायत से स्वयं को दूर करना है*
क्योंकि आपकी ऊर्जा आपकी कमी को निर्माण करता है जैसे - मेरे पास फ़लाने चीज नहीं है उसके पास है मैं ये नहीं कर सकता या वो मुझे करने नहीं देंगे दुःख देने वाले इन जैसे भावना से उतपन्न अपने भीतर ईर्ष्या द्वेष राग मोह आदि से मुक्त हो सकते है किन्तु आपको दूसरे के लिए धन्यवाद करना पड़ेगा दूसरे के लिए हमेसा प्रार्थना करना पड़ेगा जब आप दुसरो के लिए प्रार्थना करते तों ये हमेसा ध्यान रखे वही प्रार्थना आपकी ओर दुगुना रूप मे आशीर्वाद बनकर लौटता है
हर क्रिया की समान या विपरीत प्रतिक्रिया होती है - न्यूटन आप हमेसा आसाहयो की सहायता करें ज़ो सहायता के योग्य हो, वही निःस्वार्थ भाव से किया गया सहायता आपको दुगुनी रूप से किसी न किसी रूप मे आशीर्वाद बनकर आती है बड़ा हुआ तों क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंछी को छाया नहीं फल लागे अतिदूर - कबीर दास जिस प्रकार एक किसान अपने फ़सल तैयार होने तक धर्य रखता है उसी प्रकार आप भी अपने जीवन मे धर्य रखे धर्य खोना अर्थात अपने आप को फिर से दुःख मे धकेलना।

- राहुल झा🚩

शनिवार, 7 मई 2022

सज्जन मनुष्य को दुष्टों के साथ कैसा व्यहार करना चाहिए

🌷श्री हरि 🌷 ❤*आचार्य चाणक्य ज्ञान*❤ *अ० ७(7) श्लोक ८(8)* हस्ती अंकुशहस्तेन वाजी हस्तेन शृंगी लगुडहस्तेन खड्गहस्तेन ताड्यते । दुर्जनः || ८ || *भवार्थ* हाथी को चलाने के लिए अंकुश , घोड़े के लिए हाथ में एक चाबुक , सींग वाले बैल आदि पशु के लिए डण्डे की आवश्यकता होती है , परन्तु दृष्ट व्यक्ति सरलता से वश में नहीं आता । वह मामूली ताड़ना से भी वश में नहीं आता । उसके लिए तो हाथ में तलवार लेनी पड़ती है । चाणक्य कहते हैं कि उसे सीधे रास्ते पर लाने के लिए कभी - कभी उसकी हत्या भी कर देनी पड़ती है । यह सब कहने का अभिप्राय यह है कि दुष्ट व्यक्ति में जो बुरी आदते और स्वभाव पड़ गए हैं , उन्हें सरलता से दूर नहीं किया जा सकता । उन्हें सुधारना बहुत टेढ़ी खीर है । *अ० ७ (7)श्लोक ९(9)* तुष्यन्ति साधवः भोजने विप्रा मयूरा : परसम्पत्ती खला : घनगर्जिते । रविपत्तिषु ।। ९ ।। *भवार्थ* ब्राह्मण केवल भोजन से तृप्त हो जाते हैं और मोर बादल के गर्जने भर से सन्तुष्ट हो जाता है , संत और सज्जन व्यक्ति दूसरे की समृद्धि देखकर प्रसन्न होते हैं , परन्तु दुष्ट व्यक्ति को तो प्रसन्नता तभी होती है , जब वे किसी दूसरे को संकट में पड़ा हुआ देखते हैं । दुष्ट ब्राह्मण अपने यजमान की समृद्धि की कामना करता है । उसके बदले में केवल उसे सामान्य भोजन की इच्छा रहती है । आकाश में मेघों के घिर आने पर मयूर प्रसन्न होकर नाचने लगता है । संत लोग किसी से किसी प्रकार की अभिलाषा न करते हुए सबके लिए सुख - समृद्धि की कामना करते हैं । उसके विपरीत व्यक्ति दूसरों को संकट में पड़ा हुआ देखकर ही प्रसन्न होते हैं । अ०७(7) श्लोक १०(10) अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् । आत्मतुल्यबलं शत्रु विनयेन बलेन वा ।। १० ।। *भवार्थ* यदि शत्रु अपने से बलवान् प्रतीत होता हो तो उसे विनयपूर्वक व्यवहार करके वश में करना चाहिए । यदि दष्ट व्यक्ति से सामना पड़े तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वह स्वयं दूसरों से करता है - अर्थात् बुरे के प्रति बुरा व्यवहार उचित है । यदि उससे विनय - प्रदर्शन किया जायेगा तो उसकी उद्दण्डता और बढ़ जायेगी । वह सज्जनता को दबलता समझने लगेगा । - चाणक्य नीति ये पवित्र ज्ञान दुष्ट भावना से पीड़ित मुनष्य को कभी नही देना चाहिए । इतिहास साक्षी है मौर्य साम्राज्य के बाद जिस जिस भारतीय राजा या सम्राट दुष्टों को उसकेे भाषा के में व्यहार न करने के कारण पराजित या वीरगति को प्राप्त हुए । यहां विदेशी सम्राट का उदाहरण देता हूँ आज के मंगोलिया क्षेत्र में ..महाकाल और गोरखनाथ पन्थ का मिश्रित पन्थ को मनाने बौद्ध चंगेज खान ,हलगु खान,कुबलाई खान जैसे योद्धा ऐसे ही सिद्धान्तों अनुशरण कर पूरी दुनिया मे लगभग मुस्लिम को समाप्त कर दिए थे किन्तु उसमे एक दोष था उसने मुस्लिम महिलाओं को सही मार्ग दिखाने के बजाए उसका उपभोग कर लाखो में मुस्लिम की जनसख्या बढ़ा दिए जनसख्या बढ़ाया किन्तु उन्हीने कभी उस बच्चे को परवरिस का ख्याल नही किया जिसके कारण बचे खुचे इस्लामिक धूर्तो द्वारा मोहित कर धर्म परिवर्तन कर लिए गए ..हमारे देश मे महिलाओं को सूपनखा और माता सीता के रूप में देखा जाता है । जो सूपनखा स्वभाव की है उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए दूसरा क्षत्रपति शिवा जी महाराज पर दृष्टि डाले हारे हुए बादशाह की बेगम को लूट कर लाया गया तो उन्होंने बेगम को माता कह कर सम्बोधित किया उसे सुरक्षा के साथ हारे हुए बादशाह के पास भिजवा दिया फिर उस बेगम को लुटने वाले भोले पुरुष को डांटा ... हमे उनकी गुणों अपने अंदर उतारनी है । श्री कृष्णा ने नरकाशुर का वध किया उसके बाद नरका सुर की सभी 18000 रानियां अपने इक्षा से श्री कृष्ण की शरण मांग कर रही थी क्योकि वो सभी रानियां राम ,कृष्ण भक्त थी उसने नरकासुर से रक्षा के लिए प्रत्येक दिन श्री कृष्ण से प्रार्थना करती थी उन्होंने कभी किसी अशुरो की पत्नी पर बर्बरता नही की.. फिर चाहे 10 अवतार ही क्यो न हो । आप ऐसे गुण को अपनाएं तभी हमारे देश का भला हो पाएगा । 🙏👉Rahul Jha 🛕🐚🚩🔱⚜️⚔❤🌷🙏🏹🗡

शुक्रवार, 6 मई 2022

हिंदुस्थान का वो महान योद्धा तक्षक जिसने राजा को जिहाद से लड़ना सिखाया ।

तक्षक का दर्द और बदला तो देखो आंसू भी आएंगे और सीना चौड़ा भी हो जाएगा। सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।* एक बालक *तक्षक* के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब *तक्षक* के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। *तक्षक* और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं। *तक्षक* की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया। आठ वर्ष का बालक *तक्षक* एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया। 25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा गुर्जर प्रतिहार उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था। इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला--- *महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।* महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।" *"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"* महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। " तक्षक ने कहा- *"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"* "पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर" "राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।" महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन *तक्षक* के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा। आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक *तक्षक* के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में *तक्षक* का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था.... उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था। विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में *तक्षक* की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच *तक्षक* की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा- "आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे *तक्षक*.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।" *इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।* *तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा। पर देश का दुर्भाग्य देखो ,कोंग्रेस वामपंथीयो ने भारत भूमि के ऐसे वीर को इतिहास में जगह तक नही दी ,कैसा पाप किया इन पापियों ने।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

भगवद्गीता का विभिन्न अनुवादकों पर प्रभाव

जिस आदमी ने श्रीमदभगवद गीता का पहला उर्दू अनुवाद किया वो था मोहम्मद मेहरुल्लाह! बाद में उसने सनातन धर्म अपना लिया! पहला व्यक्ति जिसने श्रीमदभागवद गीता का अरबी अनुवाद किया वो एक फिलिस्तीनी था अल फतेह कमांडो नाम का! जिसने बाद में जर्मनी में इस्कॉन जॉइन किया और अब हिंदुत्व में है! पहला व्यक्ति जिसने इंग्लिश अनुवाद किया उसका नाम चार्ल्स विलिक्नोस था! उसने भी बाद में हिन्दू धर्म अपना लिया उसका तो ये तक कहना था कि दुनिया मे केवल हिंदुत्व बचेगा! हिब्रू में अनुवाद करने वाला व्यक्ति Bezashition le fanah नाम का इसरायली था जिसने भारत आकर बाद में हिंदुत्व अपना लिया था पहला व्यक्ति जिसने रूसी भाषा मे अनुवाद किया उसका नाम था नोविकोव जो बाद में भगवान कृष्ण का भक्त बन गया था! आज तक 283 बुद्धिमानों ने श्रीमद भगवद गीता का अनुवाद किया है अलग अलग भाषाओं में जिनमें से 58 बंगाली, 44 अंग्रेजी, 12 जर्मन, 4 रूसी, 4 फ्रेंच, 13 स्पेनिश, 5 अरबी, 3 उर्दू और अन्य कई भाषाएं थी ओर इन सब मे दिलचस्प बात यह है कि इन सभी ने बाद मैं हिन्दू धर्म को अपना लिया था। जिस व्यक्ति ने कुरान को बंगाली में अनुवाद किया उसका नाम गिरीश चंद्र सेन था! लेकिन वो इस्लाम मे नहीं गया शायद इसलिए कि वो इस अनुवाद करने से पहले श्रीमद भागवद गीता को भी पढ़ चुके थे ! "श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में- ॐ . किसको किसने सुनाई? उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई। ॐ . कब सुनाई? उ.- आज से लगभग 5110 साल पहले सुनाई। ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई? उ.- रविवार के दिन। ॐ. कोनसी तिथि को? उ.- एकादशी ॐ. कहा सुनाई? उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में। ॐ. कितनी देर में सुनाई? उ.- लगभग 45 मिनट में ॐ. क्यू सुनाई? उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए। ॐ. कितने अध्याय है? उ.- कुल 18 अध्याय ॐ. कितने श्लोक है? उ.- 700 श्लोक ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है? उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा और किन किन लोगो ने सुना? उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था? उ.- भगवान सूर्यदेव को ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है? उ.- उपनिषदों में ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....? उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है। ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है? उ.- गीतोपनिषद ॐ. गीता का सार क्या है? उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है? उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574 अर्जुन ने- 84 धृतराष्ट्र ने- 1 संजय ने- 41 अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। 33 करोड नहीँ 33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ। कोटि = प्रकार। देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता। हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं... कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :- 12 प्रकार हैँ आदित्य , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...! 8 प्रकार हे :- वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। 11 प्रकार है :- रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली। एवँ दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार। कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

सिंध इतिहास (489 ई० से 632 ई०)

सिंध पाकिस्तान ( भारत) Sindh

 489 ईस्वी से 632 ईस्वी तक सिंध पर नास्तिक साम्राज्य का शासन था .... गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद यहां नास्तिको ने कब्जा कर लिया था ।। 


लेकिन हिन्दुओ की भी बड़ी जनसंख्या सिंध में होने उनकी की भी सत्ता में पूर्ण भागीदारी थी ... राजा अगर नास्तिक था, तो उसका सेनापति ब्राह्मण था ।। जिसका नाम था चच 


632 ईस्वी में इस क्षेत्र के आसपास जब इस्लाम का प्रभाव बढ़ा, उसी समय वहां के ब्राह्मण सेनापति चच ने तख्ता पलट दिया, और सिंध में 143 वर्ष बाद पुनः हिन्दुओ का साम्राज्य स्थापित हो गया .....


हिन्दुओ के सत्ता में आते ही इस क्षेत्र को हड़पने के लिए इस्लामिक शक्तियों और हिन्दुओ में संघर्ष शुरू हो गया, और खलीफाओं के एक के बाद एक आक्रमण सिंध में होने लगे ....


80 वर्ष तक यहां हिन्दुओ का शासन रहा, लेकिन इन 80 वर्ष में , सिंध के बड़े बड़े क्षेत्र, सिंध से अलग हो गए, जैसे बलूचिस्तान , आज जो बलूचिस्तान पाकिस्तान की मार खा रहा है, यह खुद ही कभी हिन्दुओ से लड़कर अलग हुआ था । इन्हें भी पहले G'हाद का कीड़ा बहुत  बुरी तरीके से काटा था ।।


चच का बेटा था दाहिर ।। 712 ईस्वी में जब राजा दाहिर सत्ता में था, तब पूरे सेंट्रल एशिया ओर अरब के मुसलमानो ने राजा दाहिर पर आक्रमण कर दिया ।। सिंध की पूरी जनसंख्या से अधिक, मुहम्मद बिन कासिम के सैनिक थे ।। उल्टे उसे सिंध में भी बहुत सैनिक मिल गए, जो चच साम्राज्य और दाहिर से नाराज थे ।। जब अंदर ओर बाहर के शत्रू एक हो जाएं, तो क्या वह राज्य फिर बचेगा ?? 



सिंध 712 ईस्वी में ही हिन्दुओ के हाथ से निकल गया था , जो आजतक वापस नही आ पाया है ।। 


चित्रों के माध्यम से हमारे साथ आप भी सिंध देख लीजिए

 

























नाम जप किस प्रकार होना चाहिए ।

प्रश्न . नाम किस प्रकार जप होना चाहिए ? जिससे हमे लाभ हो ? उत्तर:– सबसे पहले नाम जप जैसे भी हो लाभ होता ही है ... फिर भी आप जानने के इक्ष...